अहमदाबाद के धमाके से ठीक एक दिन पहले बंगलौर में धमाके हुए और उससे दो दिन पहले भारतीय संसद में एक भयानक धमाका हुआ। विपक्षी पार्टी की एक खास नेता सुषमा स्वराज की तरफ से सोचा समझा बयान भी आया कि धमाके संसद में हुए कांड से ध्यान हटाने कोशिश हो सकते हैं। साठ बरस की आजादी के बाद हम राजनीति के ऐसे दलदल में खड़े हैं, जहां आतंकवाद, जातीय संघर्ष, भ्रष्टाचार जैसी तमाम बुराइयां वर्चस्व की लड़ाई के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं लिहाजा इनसे लड़ने के तौर तरीके और प्राथमिकताएं पिछड़ रही हैं। हम भूल चुके हैं कि हमें एक राष्ट्र के रूप में किस तरह काम करना चाहिए। गौर से देखिए तो यह निष्कर्ष आसानी से निकाले जा सकते हैं, हमारे नेताओं की पिछले साठ बरस से चल रही मूल्यहीन नौटंकी ने हमें इस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है कि हर साइकिल पर लटके टिफिन बॉक्स में बम ही नजर आता है।
बाईस जुलाई को संसद में जो कुछ हुआ, उसमें हम दिल खोलकर बीजेपी की बुराई कर सकते हैं लेकिन क्या यह सच नहीं कि कुल मिलाकर संसद में दिख रहा राजनीति का वह चेहरा हमारी जनता की सोच और नैतिक मूल्यों का एक प्रतिबिंब था। हम सब कुछ जानते हैं कि सांसद खरीदे और बेचे जा सकते हैं। हमें पता है कि सांसद सवाल पूछने के लिए भी पैसे ले लेते हैं, हम जानते हैं हमारे राजनेता जातीय, क्षेत्रीय और हर उस आधार पर राजनीति करते हैं, जो स्पष्ट तौर पर अनैतिक है। वे हर हाल में वर्चस्व के लिए लड़ते हैं और हम अपना कीमती वोट उन्हें देते हैं। हर बार लोग कहते हैं, जनता सुधार चाहती है? अपने गिरेबान में झांकिए, अपने तबादले के लिए, अपने रिश्तेदार की पोस्टिंग के लिए, मुकदमे में फंसे अपने परिचितों के लिए हम सब नेताओं के मार्फत यथासंभव सत्ता का उपभोग करने की कोशिश करते हैं। यदि हमारे पास वो जुगाड नहीं है तो हम पैसे के बल पर अपने काम निकलवाना चाहते हैं। कुछेक आबादी को छोड़ दें तो कुल मिलाकर यह मान लिया गया है कि आपके पास सत्ता है तो आप सुखी हैं, अन्यथा आपके पास सिस्टम से लड़ने का कोई ठोस उपाय नहीं है।
यह निहायत बचकाना लग सकता है कि बम धमाकों, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी के चरित्र के अंतर्सबंध क्या हैं? लेकिन मुझे अक्सर यह लगता है कि पूरे तंत्र को खोखला करने में हम सामूहिक रूप से काम कर रहे हैं और उसका सर्वाधिक फायदा अलगावादी ताकतें उठाती हैं, अन्यथा सौ करोड़ आबादी में मुट्ठी भर अलगाववादियों की बिसात नहीं कि वे एक दो महीनों और एक दो दिनों के अंतराल के बाद जहां चाहें वहां धमाके कर दें। उससे ठीक पहले उसका वीडियो भी बना लें और फिर धमकी भरा ई मेल भी भेज दें कि अभी और किन शहरों में वे धमाके करने वाले हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा खुफिया तंत्र और पुलिस की विफलता की उठाया जाता है। आप पुलिस की हालत देखिए। उनके काम करने के तौर तरीके देखिए। उनके आधुनिकीकरणा की गति देखिए। सब कुछ जर्जर है। इसे जर्जर करने वाला कौन है? हमारा राजनीतिक तंत्र। आप जैड प्लस में चलेंगे। आप गुजरेंगे तो आम जनता चौराहों पर जाम में फंसी खड़ी रहेगी। उसके साथ आपकी सुरक्षा में लगी पुलिस का व्यवहार इस तरह होगा जैसे जनता ही हत्यारी है और उसने आपको मारने की सुपारी ली है। फिर पुलिस तंत्र में पोस्टिंग का मामला मलाईदार और ठंड का है। राजनीतिक मुंहलगे अफसर और पुलिसवाले मलाईदार पद पाएंगे। मलाईदार पद का अर्थ साफ है कि आप उन्हें बेशुमार रिशवत और भ्रष्टाचार से कमाने का खुला अवसर देते हैं। जिन पुलिसवालों पर रिशवत और हरामखोरी की चर्बी बुरी तरह चढ़ चुकी हो, उनसे आप क्या उममीद करेंगे कि वे बम धमाकों या दूसरे समाजकंटकों से अपने नागरिकों की रक्षा करेंगे। यही हाल आपकी खुफियागिरी का है। वे लोग इस बात की रिपोर्ट ज्यादा करते हैं कि इस बार कौनसी पार्टी चुनाव जीतेगी। सरकारी तंत्र उसे पूरी तरह अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए इस्तेमाल करता है।
फिल्मकार गुलजार ने 1975 में फिल्म बनाई थी- आंधी। राजनीतिक रूप से महत़वाकांक्षी पिता अपनी बेटी को सत्ता में देखना चाहता था और इसी वजह से उसके पति से उसके संबंध खराब हुए लेकिन जब चुनाव में लोग उस पर कीचड़ उछालने लगे तो पति नैतिकता की लड़ाई में उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हुआ। वहां सत्ता पाने की राजनीतिक उठापटक तो थी लेकिन नैतिकता के प्रति यह आग्रह उस दौर की राजनीति में लगता था। गुलजार ने ही 1995 में माचिस बनाई। आतंकवादियों को पकड़ने में पुलिस तंत्र के अत्याचार और नए बदमाश पैदा करने में पुलिस की भूमिका साफ दिखती है। 1999 में वही फिल्मकार हु तु तु बनाता है। कहानी का ताना बाना आंधी जैसा ही है लेकिन वहां वर्चस्व की लड़ाई में नैतिकता खत्म हो गई है। हत्या, भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थ केंद्र में आ गए हैं। लिहाजा यहां जब नायिका सत्ता का निणायक लड़ाई लड़ रही होती है तो उसका पति उसे छोड़कर गांव चला गया है। उसकी बेटी ही उसकी हत्या में भागीदार बनती है। हालांकि यह गुलजार का फिल्मी इंटरप्रेटेशन कमजोर था लेकिन इस रूपान्तरण के भी दस बरस बाद आज नेताओं की अगली पीढ़ी को देखिए। उनकी संतानें दलालों की तरह काम करने लगी हैं। यह हम देख ही चुके हैं कि अर्थव्यवस्था के उभरते क्षेत्रों में नेताओं की संतानें किस तरह अपने पिताओं और आकाओं की सत्ता का इस्तेमाल करते हुए एक भ्रष्ट तंत्र की जड़ें सींच रहे हैं। पेट्रोल पंप, रियल एस्टेट, शॉपिंग मॉल्स, एजेंसियां, सरकारी ठेके मुनाफे के बड़े कारोबारों में मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और उनकी संतानों या रिश्तेदारों की भागीदारी मिलेगी।
सत्ता का दुरुपयोग कर आप एक पूरे तंत्र को खोखला करने में जुटे हैं। संस्थानों की विश्वसनीयता खत्म कर रहे हैं। आप विश्वसनीय नहीं है, आपकी पुलिस विश्वसनीय नहीं है, आपका खुफिया तंत्र भरोसे के काबिल नहीं है, आपकी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं स्वहित पोषक हैं। इन सबसे बचने की कोशिश करती हुई जनता हरेक चुनाव में संसद या विधानसभाओं में आपराधिक छवि वाले नेताओं की तादाद बढ़ा देती है। अपने मानवीय होने का सबूत देती है कि देखो, बम धमाके में लोग मरे हैं और रक्तदान करने वालों की तादाद इतनी बढ़ गई है। यह छदम राष्ट्रप्रेम बहुत दिन नहीं चलेगा। मुसीबतें देखकर आंख मूंदने से वे खत्म नहीं होती। इस देश के दर्द को महसूस कजिए। राजनेतओं को जवाबदेह बनाइए।
गुरुवार, जुलाई 31, 2008
शनिवार, अप्रैल 12, 2008
खुदा के लिए स्वागत करें

पाकिस्तानी फिल्मकार शोएब मंसूर से जब मैंने पिछले नवम्बर में फोन पर बात की थी तो उनकी दिली तमन्ना थी कि फिल्म खुदा के लिए भारत के लोग देखें। आज उनकी ख्वाहिश पूरी हो रही है। आज भारत में पाकिस्तानी फिल्म खुदा के लिए रिलीज हो रही है। जयपुर के एक सिनेमाघर में फिल्म आज से दिखाई जाएगी। क्रिकेट और सिनेमा भारत और पाकिस्तान की कमजोरी रहे हैं। भारतीय फिल्मों और संगीत की पाइरेटेड सीडी डीवीडी से पाकिस्तानी बाजार अटे पड़े हैं क्योंकि पाकिस्तान में सिनेमा इस्लामिक दबावों के चलते कमजोर हो गया। यह साधारण घटना नहीं है। शायद यह पहली पाकिस्तानी फिल्म है, जो भारत में इतने बड़े स्तर पर रिलीज हो रही है। उससे भी असाधारण बात यह है कि जो फिल्म आ रही है, वह करण जौहर, यश चौपड़ा या महेश भट्ट ब्रिगेड के लोकप्रिय सिनेमाओं से थोड़ा अलग है। यदि सिनेमेटिक लैंग्वेज की बात की जाए तो `खुदा के लिए´ एक अच्छी फिल्म है। गोवा में पिछले नवम्बर में हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह में इसकी स्क्रीनिंग हुई थी और मैं गवाह हूं कि लगभग हर स्क्रीनिंग हाउसफुल थी। हमारे यहां जेपी दत्ता की फिल्मों में भारत माता की जय और पाकिस्तान मुदाüबाद के नारे सिनेमाघरों में गूंजते हैं, वैसा कोई कॉनçफ्लक्ट शोएब मंसूर की इस फिल्म में नहीं है कि एक भारतीय होते हुए आपको यह लगे कि आप पाकिस्तान की फिल्म देख रहे हैं, बल्कि एक संवाद ऐसा है, जहां भारत की अहमियत ही दिखाई गई है। जाहिर है भारत के हिंदू मुçस्लम तनावों से अलग पाकिस्तान मुसलमानों के आपसी द्वन्द्व से ही पीडि़त है और उसी दुविधा का शिकार हमारा पूरा देश भी है। एक इस्लाम का उदार चेहरा और दूसरा मुल्ला और मौलवियों द्वारा व्याख्यायित कट्टर चेहरा। जाहिर है, आतंकवाद के बीज कहीं इसी बुनियादी सोच में हैं।गोवा में फिल्म की स्क्रीनिंग से पहले मैंने शोएब मंसूर से बात की थी। वे उस वक्त पाकिस्तान में थे। पाकिस्तान में इमरजेंसी थी और वे कोई भी टिप्पणी करने से बच रहे थे। हां, उन्होंने कहा कि फिल्म भारत और पाकिस्तान के लोगों को इस्लाम समझाने में बेहद मदद करेगी। हम लोगों के लिए सुखद बात है कि फिल्म में नसीरुद्दीन शाह भी हैं। वे आखिरी पन्द्रह मिनट फिल्म में आते हैं और याद रह जाते हैं। अमेरिका पर आतंकी हमले को लेकर हमारे यहां नसीर अपनी पहली निर्देशित फिल्म `यूं होता तो क्या होता´ बना चुके हैं लेकिन उसके केन्द्र में संयोग और इमोशन्स हैं। खुदा के लिए सीधे हमारी सोच पर हमला करती है। बल्कि तारीफ कीजिए शोएब मंसूर की। उन्होंने पाकिस्तान में होकर एक बोल्ड फिल्म बनाने की हिम्मत की है जो हमारे फिल्मकार भारत में रहते हुए बनाने से कतराते हैं। वे इस्लाम के कट्टरपंçथयों को चुनौती देते हैं और अमेरिका की भी पोल खोलते हैं कि आतंकवाद किसने पैदा किया है? दुआ कीजिए कि आ जा नच ले में गाने में एक जातिसूचक शब्द को लेकर हल्ला मचा देने वाले देश में खुदा के लिए निबाüध चले, लोग देखने जाएं। कतई इंटेलेक्चुअल और बौद्धिक लबादों से भरी फिल्म नहीं है। आम भारतीय फिल्मों की उसी तरह की कहानी है कि दो सगे भाई कुंभ में मेले में बिछुड़ गए हैं। सिर्फ ट्रीटमेंट अलग है। भाषा वही है जो हम आम बोलचाल में उदूü बोलते हैं। फिल्म देखने के बाद शायद हम यह समझ पाएं कि हमारी लाडली टेनिस प्लेयर सानिया मिर्जा अपनी ही जमीन पर टेनिस खेलने से क्यों मना कर देती है?
मंगलवार, अप्रैल 01, 2008
हम राजस्थान के लोग
आज अपनी माटी को मोहब्बत करने का वक्त है और यह भावुक क्षण है। किसान से पूçछए, जब वह खेत में खड़ा होता है तो लगता है कि उसकी वह मां की गोद है। सूरज तपे, बादल बरसे, तूफान आए, बाढ़ आ जाए लेकिन उसका खेत उसे मां की तरह पालता है। किसान की जमीन से इस मोहब्बत में वैसा स्वार्थ नहीं होता जैसा शहर के बगल में जमीन खरीदकर बिल्डर मुनाफे की कल्पना मात्र खुश हो जाता है। मेरे किसान पिता कहते हैं, वह दुनिया का सबसे बड़ा बदनसीब है, जिसे अपना खेत बेचना पड़े।जन गण मन गूंजता है, तो आंखें अनायास नम होती हैं, लगता है हम अपनी मां को याद कर रहे हैं। हम राज ठाकरे को इसलिए गलत कह सकते हैं कि वह मराठियों के बहाने अपने राजनीतिक स्वार्थ साधना चाहते हैं, लेकिन यदि अपने ही राज्य को निस्वार्थ प्यार करते हैं तो यह संविधान विरोधी नहीं है। चूरू के लक्ष्मीनिवास मित्तल अपने पैतृक गांव न भी जाएं तो उनके मुनाफे में कोई फर्क नहीं पड़ता। अमेरिका में इकॉनोमिक्स पढ़ाने वाले प्रोफेसर घासीराम लौटकर शेखावाटी ना भी आएं, वहां जान पहचान वालों, युवाओं, लेखकों की गुपचुप आर्थिक मदद ना भी करें तो उनकी तनख्वाह नहीं कटेगी। जयपुर के इरफान को साइन करते हुए कोई हॉलीवुड या बॉलीवुड का कोई प्रोड्यूसर यह शर्त नहीं रख्ाता है कि हर संक्रांति को जयपुर जाकर अपने मकान की छत से पतंग उड़ाएं और मोहल्ले के लोगों से पेच लड़ाएं। फिर भी हमारे ये लाडले यहां आते हैं। अपनी जमीन पर माथा टेकते हैं। फलों से लदे पेड़ बनकर अपनी जमीन की तरफ झुकते हैं, क्योंकि दिल कहता है, अपनी माटी, अपनी मां तो राजस्थान है।तो हमें गर्व है कि राजस्थान के हैं। क्योंकि हमारा राजस्थान जिंदगी का आईना है। दूर तक फैले मरुस्थल के बावजूद हमारी पगड़ी के रंगों का इन्द्रधनुष कमजोर नहीं पड़ता। विपरीत परिस्थितियों में लड़ने को हौसला देने वाले ये जिंदगी के रंग हैं। माना कि बारिश बीतते हुए हमारी नदियां सूखती हैं लेकिन वे कभी अगले बरस फिर कलकल बहने की उम्मीद नहीं छोड़तीं। ठीक हमारी जिंदगी की तरह। अरावली की ऊंची नीची उपत्यकाएं जिंदगी की पथरीली राहें हैं लेकिन उन्हीं की गोद में हमारे मवेशी, हमारे हिरण, हमारे बाघ, हमारी तितलियां बेखौफ विचरण करते हैं। उन्हीं के बीच हमारी खनिज सम्पदा है। हमें प्रकृति ने ही तो जीने का हौसला दिया। जहां गए, वहीं मुश्किल हालातों में भी संघर्ष करते हुए अपना मुकाम बनाया। असम में उल्फा ने सताया, बंगाल में मंत्री की जुबान फिसली, मुम्बई में भी हमारी मुखालफत करने वाले कम नहीं। हमारे सपूत अमेरिका में झंडे गाड़ रहे हैं। दुनिया में फैले हैं। यह राजस्थान के दिल का ही विस्तार है कि यहां जो आ रहे हैं, उनके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठी। लेकिन चुनौतियां खत्म नहीं होती हैं। हमारा संघर्ष रंग लाना चाहिए। यदि हम भौगोलिक लिहाज से सबसे बड़े हैं तो उदारता में भी बड़े हों। इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि हमारी अर्थशास्त्र के आंकड़ों में हमारी प्रति व्यक्ति आय सबसे ज्यादा हो, हमारे लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हों। कभी कभी बुरा लगता है, गांवों में सेलफोन का नेटवर्क तो काम कर रहा है लेकिन जिस नर्स की ड्यूटी है, वह नदारद है। काश, हमारे नेता उतने ही संवेदनशील होते जैसे हमारे लोग हैं। फिर भी उम्मीद की किरण इधर ही हैं। देखना, एक दिन हम नम्बर वन होंगे। हमारे हौसले की बूते पर। अपने गांव, अपने शहर से जिम्मदार बेटे की तरह मोहब्बत करिए, आपको राजस्थान दुआ देगा। अपने राज्य राजस्थान से मोहब्बत करिए, भारत की दुआएं आपको मिलेंगी। दिल में जमीन से जुड़ने वाले किसान बनिए। जमीन को बेचने वाले बिल्डर नहीं। इस धरती पर गर्व करें। यही जननी है।
-ये लेख राजस्थान स्थापना दिवस के मौके पर 30 मार्च 2008 को डेली न्यूज में प्रकाशित हुआ है।
-ये लेख राजस्थान स्थापना दिवस के मौके पर 30 मार्च 2008 को डेली न्यूज में प्रकाशित हुआ है।
मंगलवार, मार्च 25, 2008
राजस्थान दिवस के जश्न में मुम्बई की फौज
राजस्थान दिवस के जश्न को आप नहीं देखने जा रहे हैं तो यह आपकी गलती है। सरकार ने तो कोई कसर छोड़ी नहीं है। ये राजस्थान के ऊबाऊ स्थानीय कलाकार हैं, उनसे क्या कोई राजस्थान दिवस में रंगत लाई जा सकती है। लिहाजा सरकार ने सारी फौज मुम्बई से बुलाई है। ऐसी फौज का खर्च भी रीयल एस्टेट की तरह है। मेजबान का चेहरा देखकर मुंहमांगी कीमत मांग लो। हजार रुपये गज में बढ़ा दो। ये हमारे लोकल आटिüस्ट बयानबाजी बहुत करते हैं। इनका पत्ता साफ करो। साबरी बंधु गाते होंगे राजस्थान में कव्वाली, वे बड़े तो तभी बनेंगे, जब राजकपूर अपनी फिल्म हिना में उन्हें गाने का मौका दें। इसके बाद हिना फेम साबरी बंधु हो गए। लिखा होगा कन्हैया लाल सेठिया ने कि या तो सुरगां ने सरमावै, ई पर देव रमण न आवै, धरती धोरां री। राजस्थान की महिमा का बेहतरीन दस्तावेज है, लेकिन अब गीत लिखने के लिए आप कई लाख, कई हजार रुपये देंगे। क्योंकि यह इमोशनल मामला नहीं है। क्योंकि यह सब नेटवकिZग का मामला है। इसे यूपी या मुम्बई के जावेद अख्तर या प्रसून जोशी लिख सकते हैं।राजस्थान दिवस में अपनी प्रस्तुति को लेकर अगर आप आ रहे हैं, तो अपनी ब्रांड वैल्यू बताइए। आपके पास नहीं हैं तो आप फटीचर लोग हैं। राजस्थान सरकार ने आपकी ब्रांड वैल्यू बनाने का ठेका थोड़े ही लिया है? और ये क्या लोकल आटिüस्टों ने रट लगा रखी है कि हमें नहीं बुलाया? क्या आपको नेटवकिZग आती है? नहीं आती है तो चिल्लाते क्यों हैं? सिफारिश लाइए। आत्मसमर्पण करिए, तब जाकर कहीं आपका नम्बर मंच पर चढ़ने के लिए आएगा।खैर, जो गंभीर लोग हैं वे कह सकते हैं कि ऐसी कोई जरूरत थोड़े ही है राजस्थान दिवस समारोह हो और राजस्थानियों को ही मौका मिले। रेवडि़यां बंट रही हैं, तो देश के सभी समान नागरिक समान ढंग से बांटकर खाएं। तो फिर ऐसा क्या है, जो तकलीफदेह है।इस सरकार का कोई सांस्कृतिक चेहरा नहीं है। यूं लगता है जैसे तर्कहीन ढंग से आपने तय किया है कि पैसा बहा दो, उससे सांस्कृतिक समृद्धि आएगी। पुलों पर चित्र बनाने का बजट तय कर दो। चौराहों पर कुछ नाचती गाती मूर्तियां लगा दो। चलिए अच्छा है। एक गैर सरकारी संगठन के साथ जुड़कर सांस्कृतिक आयोजन कराओ। वो आपकी सारी सरकारी मशीनरी को इस्तेमाल करेगा और अपने प्रायोजक ढूंढ़कर कमाएगा। अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने थे तो ऐलान किया था कि राज्य की सांस्कृतिक नीति बनेगी। एक टूटा फूटा दस्तावेज भी शायद तैयार हुआ था। अब क्या स्थिति है, मेरी जानकारी में नहीं है। पांच साल उन्होंने निकाल दिए। जवाहर कला केन्द्र को ऑटोनोमस बनाने का ऐलान हुआ था। इस सरकार में अधिसूचना जारी हुई, लेकिन अब भी नौकरशाही के ही कब्जे में है। अभी तक ऑटोनोमस बॉडी के मेम्बर ओर चैयरमैन की नियुक्ति नहीं हुई। साल डेढ़ साल पहले भानु भारती लगभग तय हो गए थे लेकिन खबर लीक हो गई और सांस्कृतिक कारसेवा हो गई। मामला अटक गया। आज वहां सरकारी अफसर ही तय करते हैं कि क्या होगा, क्या नहीं? रवीन्द्र मंच की जर्जर हालत है। कुछ खबरें छपती हैं, तो बजट निकल आता है और फिर बजट भी गायब हो जाता है और हालात भी नहीं सुधरते। रवीन्द्र मंच पर एक प्रोफेशनल नाटक करने में आपको पसीना आ जाएगा। ना लाइट ठीक लगी हैं, ना साउंड ठीक है। दिलचस्प बात यह है कुछ सरकारी इमारते तो ब्याह शादियों के लिए दी जाने लगी हैं। रवीन्द्र मंच पर भी आने वाले दिनों में नाटक कम और शादियां ज्यादा हुआ करेंगी। मेरी इन बातों का यह अर्थ ना लगाया जाए कि ऐसा कोई समारोह होना ही नहीं चाहिए। बेशक होना चाहिए लेकिन आपका लक्ष्य क्या है? राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण देने का, राजस्थान दिवस के नाम पर सिर्फ जयपुर के लोगों को मनोरंजन करने का या राजस्थानी लोगों को आत्म गौरव महसूस करने का मौका देने का। जाहिर है, एआर रहमान, पलाश सेन के पास यह ताकत नहीं है कि राजस्थानी लोगों को यह समझा सकें उनका राज्य महान है। आप देखिए, नाटक वाले आएं, चाहे सिनेमा वाले, वे सब मंच से हमेशा कहेंगे, जयपुर के लोग बहुत गुणीजन हैं, देश के किसी भी शहर में उतना बेहतर महसूस नहीं करते जैसा जयपुर में करते हैं, असल में अहमदाबाद और इंदौर में भी ये लोग शहर का नाम बदलकर यही वाक्य दोहराते हैं। यह उनकी बाजारी जरूरत है। तो और नहीं तो कम से अपनी माटी के सपूतों को तो याद करिए। सेलिब्रिटी भी चाहिए तो भरे पड़े हैं, सिनेमा में, रंगमंच में, गायन में, लेखन में। सवाल क्षेत्रीयता का नहीं है, सिर्फ इमोशन्स का है। पिछली सरकार का मैं कोई हिमायती नहीं हूं, लेकिन आप तारीफ करेंगे कि राजस्थान के बाहर बसे सभी लोगों का सम्मेलन कराने की पहल की। वहीं से आए लोगों ने कहा कि दुनिया उनका लोहा मानती है, लेकिन अपने ही राज्य में उन्हें कम इज्जत मिलती है। बाद में कुछेक लोगों ने काम किया, कुछ ने सरकारी सुविधाओं का फायदा उठाया। उन्होंने गूंज किया और अपने गंगानगर के जगजीत सिंह को तो बुलाया ही, देश छोड़ पाकिस्तान बसे दो महान कलाकारों के लिए पलक पांवड़े बिछाए कि वे अपनी माटी पर लौटें। आपको याद होगा कि बुजुर्ग मेहदी हसन भी आए और अपनी माटी के लोगों की मनुहार में बीमारी के बावजूद गाते ही चले गए। रेशमा भी आईं। बुलाइए, अपने कलाकारों को बार बार बुलाइए। आप सरकार हैं, संस्कृति के बाजार में ग्लैमर की दुकान चलाने नहीं बैठे हैं, आप एक स्टेट की स्थापना के मौके को उस स्टेट के लोगों को गर्व करने का मौका दें, ना कि उन्हें मनोरंजन के नाम पर बॉलीवुड के ठुमकों की अफीम में बेहोश करके उम्मीद करें कि लोग सरकार का गुणगान करें। रही बात कलाकारों की। बार-बार की उपेक्षा और दरबार उर्फ सरकार पर आçश्रत रहने की उम्मीदों में वे एक संगठित विरोध का साहस तक नहीं रख्ाते हैं। विश्व मोहन भट्ट या इला अरुण अकेले बयान दें, उससे सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती। आप इन लोगों से आग्रह करें कि वे अगुवाई करें। संगठित विरोध सरकार तक पहुंचाएं। नौकरशाहों और इवेन्ट मैनेजरों की पोल खोलें। लेकिन दुभाüग्य से हमारे कलाकार ऐसा भी नहीं करते। बोलना पड़ेगा। इस स्टेट की कला और संस्कृति को पहचान देने का संघर्ष आपने किया है। बीज आपने बोए हैं, तो मेहरबानी कर यह फसल नेताओं और इवेन्ट मैनेजरों को ना काटने दें। इस फसल पर आपका हक है। दागिस्तानी लेखक रसूल हमजातोव का उल्लेख किया एक किस्सा याद आता है-कुछ लोगों ने पेड़ को उखाड़ दिया और उस पर बने चिडि़या के घौंसले को उजाड़ दिया।किसी ने पेड़ से पूछा- तुम्हें क्यों उखाड़ा गया?पेड़- क्योंकि मैं बेजुबान हूं। चिडि़या से पूछा-तुम्हारा घौंसला क्यों उजाड़ दिया? चिडि़या-क्योंकि मैं बहुत बोलती थी। तो कम से कम उतना तो बोलिए कि आपका वजूद बना रहे।
मंगलवार, नवंबर 13, 2007
मेरे गांव में सेलफोन
जब मैं बच्चा था मेरे पिताजी मेरी पढाई को लेकर चिंतित थे ताे वे मेरे लिए एक लैंप लेकर अाए। मुझे याद है माेहल्ले के सारे बच्चे यानी मेरे दाेस्त मेरे साथ ही पढने के िलए अाए। एक लकड़ी के तखत के बीच में हम लैंप रखते थे तथा उसी पर किताबें रखकर पढते थे। मैंने सपने में भी नहीं साेचा था कि एक दिन मेरे गांव में बिजली अाएगी। यह सन ८३-८४ की बात है। इदिरा गांधी की हत्या हाे गयी थी या हाेने वाली थी। वक्त बदलते देर नहीं लगती। अब गांव में बिजली ताे है ही लगभग सभी सेलफाेन कंपनियाे के टावर बन गए हैं या बनने वाले हैं। मेरे गांव की महिलाएं भले ही पढी लिखी नहीं हैं लेकिन विदेश मजदूरी करने वाले अपने पति से सेलफाेन पर बात करती हैं। वे मिस काल का मतलब भी जानती हैं अाैर गाहे बेगाहे मिस काल देती भी हैं् कभी अपने पति काे ताे कभाी अपनी सहेली काे। इस चमत्कार काे देखकर मैं बहुत खुशा हूं। इस दिवाली में जब मैंने पिताजी काे सेलफाेन दिया ताे मुझे उम्मीद थी कि वे मेरी तारीफ करेंगे अाेर मुझे सपूत हाेने का अाशीरवाद देंगे कि मैंने उन्हें हरदम सम्परक में रहने का यंञ दिया लेकिन एेसा नहीं हुअा। पिताजी बाेले- यार मैं ही बचा था बिना माेबाइल के। अबकी बार नहीं लाते ताे मैं खुद अपने लिए खरीद लाता। अब ताे िजसे देखाे माेबाइल लिए घूम रहा है।
रविवार, नवंबर 04, 2007
वरना हम भी आदमी थे काम के
हाल ही मैंने एक फिल्म जब वी मेट देखी और उस पर रिव्यू लिखा। फिल्म तो रद्दी ही थी।मुझे अफ़सोस था कि मैंने दो ढाई घंटे खराब किये। लेकिन ताज्जुब हुआ कि दूसरे समीक्षकों को वह पसन्द आयी और दर्शकों को भी। असल में ऍफ़ टी आई से फिल्म एप्रिशियेशन कोर्स के बाद मैं लोकप्रिय सिनेमा का खराब समीक्षक हो गया हूँ।
शुक्रवार, अक्टूबर 12, 2007
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