मंगलवार, अक्तूबर 11, 2011

घाव को फाहे से सहलाने वाला

 गजल में शाइर का खयाल महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन जगजीत सिंह ने साबित किया वे जिस गजल को गाते थे उसमें वे खयाल, रुमानियत या दर्द का एक नया रंग भर देते थे। वे हमारे बीच से गए नहीं है बल्कि और अधिक फैल गए हैं। 






दुनिया में सब मुसाफिरी पर हैं। सबको जाना है। कोई पहले कोई बाद में जाता है लेकिन जगजीत सिंह जिस तरह गए वो दुख देता है। जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था उसी शाम वे गुलाम अली के साथ मंच से गाने वाले थे।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में पैदा और पले बढ़े जगमोहन को, जो बाद में जगजीत हो गए, मुंबई जाना था और सन १९६५ के बाद कोई एक दशक तक जमकर संघर्ष करना था। वे परम्परागत संगीत घरानों से नहीं थे। उनकी आवाज पेड़ों के इर्द गिर्द नाचने वाले फिल्मी नायकों से मेल नहीं खाती थी और दूसरों की गजलें गाकर या शादी पार्टियों में गाकर आजीविका चलाते थे। उसी दौरान चित्रा दत्ता से विवाह किया और उनका बेटा विवेक उनकी दुनिया में आया तो वे बहुत अमीर नहीं थे। बस उनकी ख्वाहिशें अमीर थी। लेकिन सन १९७५ में उनका पहला एलबम अनफॉर्गेटेबल्स आया और नाम के अनुुरूप इसने कमाल कर दिया। जगजीत ने मुड़कर नहीं देखा।
असल में जगजीत सिंह ने गजल गायकी को जो असाधारण और मौलिक तरीका अपनाया था उसने उन्हें तो स्थापित किया ही। गजल जैसी एक क्लासिकल विधा को आम जनता में लोकप्रिय कर दिया। वे आज भी युवाओं में उतने ही लोकप्रिय रहे हैं जितने बुजुर्गों में। उनकी आवाज चिर युवा रही और आने वाले वर्षों में रहेगी। उनकी गायकी ऐसे काम करती है जैसे कोई गहरे घावों को रूई के फाहे से सहला रहा हो। जैसे आप चांदनी रात में एक शांत नदी में नौकायन कर रहे हों। जैसे बारिश की पहली बूंदों की खुशबू महसूस कर रहे हों।
जयपुर में कितनी ही बार वे आए और पिछले दो दशक में लगभग हर बार उनको लाइव सुनने का अवसर मिला। वो यादगार शाम कोई कैसे भूल सकता है जब जयपुर के अलबर्ट हॉल के सामने खचाखच भरे रामनिवास बाग में जगजीत सिंह अपनी माटी को नमन कर रहे थे। उसी मंच से उस दिन रेशमा और मेहदी हसन भी अपने राजस्थानी होने का गर्व कर रहे थे।
जगजीत सिंह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि गजल जैसी शास्त्रीय विधा के सांस्कृतिक संस्कार वे कई पीढियों को देकर गए हैं। आप संगीत के तकनीकी पहलुओं को समझते हैं या नहीं, इससे खास फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर आप एक बार जगजीत सिंह को सुन लेते हैं तो आपको संगीत से प्यार हो जाएगा, गजल से प्यार हो जाएगा। कई सारे संस्थान, कई सारी सरकारें पूरी पीढ़ी को संगीत से उतना संस्कारित नहीं कर सकते जितना काम अकेले जगजीत सिंह कर गए।
दरअसल गजल में शाइर का खयाल महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन जगजीत सिंह ने साबित किया वे जिस गजल को गाते थे उसमें वे खयाल, रुमानियत या दर्द का एक नया रंग भर देते थे। वे हमारे बीच से गए नहीं है बल्कि और अधिक फैल गए हैं। 

3 टिप्‍पणियां:

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा…

बेहतरीन श्रद्धांजलि!
दिल के खून में क़लम को डुबोकर लिखी हुई.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विनम्र श्रद्धांजलि।

sandeep sharma ने कहा…

श्रद्धांजलि...