शनिवार, मई 21, 2011

लंबी और कमजोर रोमांटिक कॉमेडी


FILM REVIEW- PYAAR  KA PUNCHNAAMA

निर्माता अभिषेक पाठक और निर्देशक लव रंजन की फिल्म प्यार का पंचनामा में सारे अभिनेता नए ही हैं। निर्देशक भी नए हैं लेकिन दुर्भाग्य से दर्शक नए नहीं है। वे फिल्में देखते रहते हैं। प्यार का पंचनामा रोमांटिक कॉमेडी है और तीन दोस्तों के लड़कियों से मिलने ओर बिछुड़ने की कहानी है। कैनवस फरहान अख्तर की दिल चाहता है से मिलता है लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं मिलता।

तीनों दोस्त साथ रहते हैं और एक दिन अचानक तीनों की जिंदगी में तीन तरह की लड़कियां आती हैं और "कुत्तागिरी" शुरू होती है। तीनों लड़कियों में ऎसी कोई खास बात नहीं है कि जिसके लिए उनके पीछे इस तरह से पड़ा जाए। तीनों नायक भी नए हैं और वे अपना काम ठीक ठाक कर गए हैं। लेकिन कहानी में लड़कियों को लेकर अनीस बज्मीवादी टिप्पणियां बहुत ज्यादा हैं जो लड़कियों को हीन दिखाने की पुरूषोचित सोच का वमन है। जहां एक पात्र विक्रांत कहता है कि कोई कितनी भी समानता और एक दूसरे को स्पेस देने की बात करे वो तब तक ही ठीक लगती है जब तक लड़की आपको मिली नहीं हो या पहली बार कंधे पर सिर रखकर रो रही हो। उसके बाद साथ रहते हुए आप एक दूसरे को स्पेस देने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

हां, इंटरवल से पहले तक कुछ कॉमिक संवाद और दृश्य अच्छे लगे हैं लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म ऊबाऊ और लंबी होती चली जाती है। लिव इन से लेकर दूसरे बॉय फे्रंड को बर्दाश्त करने और प्यार में बलिदान और तौहीन सहने जैसी कई सिचुएशन फिल्म में हैं लेकिन वे ताजा नहीं लगती और इसलिए प्यार का पंचनामा एक अच्छे विचार और कथासूत्र के बावजूद बहुत बेकार लगती है।

खासकर फिल्म की अवधि बेहतर संपादन के बाद यदि बीस से पच्चीस मिनट और कम कर दी जाती और महिलाओं और युवा लड़कियों के प्रति लेखक निर्देशक कुछ स्पष्ट और उदार नजरिए से सोचते तो शायद बात अलग होती। फिलहाल फिल्म में इतनी सी गुुंजाइश है जवान होने की दहलीज पर खड़े दर्शक टाइमपास के लिए इसे देख सकते हैं। लगातार पार्श्व में चलता गाना बंध गया पट्टा, देखो बन गया कुत्ता यह सोच बताने को काफी है कि आदमी कुत्ता होता है और औरत उसकी जिंदगी में आते ही उसे एक पट्टा डालती है, और उसे उम्र भर उसके कहे अनुसार ही चलना होता है, लिहाजा जितना उनसे बच सकें आप बचें। सुनने में यह बाद कबीर वाणी के "माया महाठगिनी हम जानी" जैसी है लेकिन अफसोस कि पर्दे पर यह फिल्म प्रभावित नहीं करती। गाने ठीक ठाक हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

गोवा के ड्रग माफिया पर कामचलाऊ थ्रिलर

Film Review- DUM MAARO DUM


निर्देशक रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम इस हफ्ते रिलीज हुई है। गोवा में ड्रग माफिया की सफाई के लिए नियुक्त किए किए एसीपी विष्णु कामथ यानी अभिषेक बच्चन और माफिया माइकल बारबोसा की तलाश की कहानी है, जिसके शिकार कई मासूम लोग हुए हैं। लोरी (प्रतीक) इनमें एक है, जो अमेरिका पढ़ने जाना चाहता है लेकिन इनके चंगुल में फंसता है।

इसके समांतर जोई (बिपाशा बसु) भी है जिसे एअर होस्टेस बनने की चाह है और वह भी ड्रग माफिया की शिकार हो गई है। तीसरा संगीतकार जैकी (राना डागुटी) है, जो जोई का बॉय फे्रंड है। ये सब लोग कहीं ना बारबोसा से पीडित है और बारबोसा का सूत्रधार बिस्किट (आदित्य पंचोली) है। फिल्म असली बारबोसा को तलाशने की एक यात्रा है। कहानी प्रतीक के अमेरिका जाने के लालच में ड्रग माफिया के चंगुल में फंसने से होती है और अंत 920 करोड़ के ड्रग्स को आग लगाने से। इस बीच थ्रिलर की तरह फिल्म चलती है लेकिन इंटरवल तक ही पटकथा की पोल खुलने लगती है और इंटरवल के बाद तो वह अति साधारणीकरण का शिकार हो जाती है।

ऎसी इंस्पेक्टर वाली कहानियां बनाना जो अन्याय के खिलाफ लड़ें, हमारे फिल्मकारों का प्रिय शगल रहा है। लिहाजा इसमें कोई नयापन है तो सिर्फ यह कि कैमरा गोवा को दिखा रहा है। असल में फिल्म से स्पार्क गायब है। यूं लगता है जैसे गोवा ऎसा ही है जैसा दिखता है। यह एक बनावटी कहानी है, जहां से गोवा की असली जिंदगी और असली ड्रग समस्याएं गायब सी लगती है। यानी कहानी कहीं अति साधारण है और कहीं हद से ज्यादा काल्पनिक। समस्या चरित्रों के साथ भी है कि चारों चरित्रों में से किसी एक के साथ दर्शक को सहानुभूति रखने में जोर आता है। मसलन लौरी और जोई पैसे और महत्वाकांक्षा के चलते ड्रग वालों की मदद करते हैं, ऎसा क्यो? एसीपी विष्णु कामथ एक नंबर का भ्रष्ट अफसर रहा लेकिन दुर्घटना में पत्नी और बेटी के मरने के बाद घोर ईमानदार। ऎसा क्यों? जोई का बॉय फे्रंड ही उसे ड्रग्स के धंधे में धेकलता है और वही अब मसीहा बनके आ रहा है? ऎसा क्यों? जोई पूरी फिल्म में बिस्किट की रखैल है और अचानक पवित्र हो जाती है।

यानी दर्शक किसी एक चरित्र के साथ अपनी सहानुभूति जोड़ नहीं पाता है। पटकथा की यह खामी भारी पड़ती है फिल्म पर। उसमें कुछेक दृश्यों को छोड़कर कहीं कुछ जादुई नहीं लगता। अभिषेक ने ठीक ठाक अभिनय किया है। प्रतीक ठीक है। बिपाशा सजावटी गुडिया है, विद्या बालन की सिर्फ हाजिरी सी है। राना भाव विहीन चेहरा लिए हैं। आयटम सॉन्ग दम मारो दम में दीपिका पादुकोण हैं और ठीक लगी हैं। अभिषेक ने गाना अच्छा गाया है। जयदीप साहनी ने गाने ठीक ठाक लिखे हैं। कुल मिलाकर दम मारो दम में नया और जादुई कुछ नहीं लगता। बस टाइमपास के लिए आप जा सकते हैं।

शनिवार, अप्रैल 16, 2011

हिंदी मीडिया, भाषा और कथ्‍य के सवाल


बावजूद इसके कि परंपरागत हिंदी वालों की तरह मुझे अंग्रेजी से उस तरह की
कोई दुश्‍मनी नहीं है कि मैं उसे खदेड़ने का झंडा लेकर खड़ा हो जाऊं।
लेकिन वही अंग्रजी जब आम पाठक तक हिंदी के अखबार से पहुंचती है तो
तकलीफदेह है। हमारे समय की सबसे कड़वी सच्‍चाई यह है कि हमारे पूरे
मीडिया पर विज्ञापन, बाजार और उसके दबाव काम कर रहे हैं लेकिन मुझे यह
एजंडा कतई समझ नहीं आता कि हिंदी के अखबार में शाब्दिक ढंग से तो
अंग्रेजी घुस ही रही थी, अब उसकी लिपि भी घुस रही है। दुर्भाग्‍य की बात
यह है कि भाषा को इस समय रीजनल मीडिया में गंभीरता से लिया ही नहीं जा
रहा। आप देख सकते हैं कि एक ही अखबार एक ही शब्‍द को कई तरह से छापता है।

जैसे हिंदी नवभारत टाइम्‍स ने अपना मास्‍ट हैड रोमन में कर दिया था, ऐसा
करने मात्र से क्‍या युवा पीढी जिसके बारे में हमने मान लिया है कि वे
अंग्रेजी ही पढेंगे और यह सब उनके लिए किया जा रहा है। ऐसा क्‍यों हो रहा
है कि हिंदी के अखबारों की प्रसार संख्‍या लगातार बढ रही है। आई
नैक्‍स्‍ट और कॉम्‍पेक्‍ट का प्रयोग देख ही रहे हैं। दूसरे अखबारों में
बॉम्‍बे टाइम्‍स की नकल पर शुरू हुए नगरीय लाइफ स्‍टाइल परिशिष्‍टों की
भी यही हालत है। यह कितना कुतर्क है कि लिपि या शब्‍द अंग्रेजीदां या
हिंगलिश कर देने से युवा पीढी किसी अखबार से जुड़ सकती है। जबकि सच्‍चाई
यह है कि कथ्‍य और विषय वस्‍तु के लिहाज से गुणवत्‍ता का भीषण पतन हुआ
है।

असल में महानगरों में पत्रकारिता के केंद्र बने हुए हैं। हिंदी अखबारों
के केंद्र में आप दिल्‍ली को भले ही मानते रहें लेकिन सच्‍चाई यह है कि
हिंदी पत्रकारिता की बड़ी दुनिया दिल्‍ली से बाहर है। दिल्‍ली मुंबई जैसे
कॉस्‍मोपॉलिटन्‍स से इतर यह दुनिया पटना, भोपाल, जयपुर, लखनऊ और कानपुर
जैसे शहरों में बडी है। इनके सबसे बडे़ पाठक जो पढ रहे हैं वे महानगरों
से दूर देहातों और कस्‍बों के पाठक भी हैं और आश्‍चर्यजनक रूप से हमारे
मौजूदा हिंदी अखबार इस बात के अपराधी हैं कि वे पूरे हिंदी समाज की भाषा
को एक महानगरीय अहम के साथ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। आप मुझे क्‍या
समझा सकते हैं कि रविवार विशेष के स्‍थान पर SUNDAY SPECIAL लिख देने से
किसी भी हिंदी अखबार के पाठक बढते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि दूर दराज के
कस्‍बों और देहातों के बारे में हमारे पत्रकार और‍ डिजायनर समझते ही नहीं
है। मैंने तर्क किए हैं ऐसे मौकों पर कि भाई ऐसा क्‍यों लिख रहे हो, तो
तर्क आता है कि यह ‘मॉडर्न ले आउट’ है, मैं उससे कहता हूं तुम्‍हारी औकात
कंप्‍यूटर के की बोर्ड पर लिखे अक्षरों से ज्‍यादा  अंग्रेजी जानने की
नहीं है फिर तुम उन सब लोगों की भाषा क्‍यों खराब कर रहे हो, जो इतनी भी
नहीं जानते। तो अगला कुतर्क है कि नहीं जानते तो वे जानेंगे। क्‍यों
जानेंगे कि क्‍या आपने किसी समाज को वो भाषा पढाने का ठेका लिया है, जिसे
आप खुद नहीं जानते। हमारे बहुसंख्‍यक हिंदी पत्रकारों की हालत अंग्रेजी
के मामले में ऐसी ही हो गई है। या ऐसा मान लीजिए कि उन पर दबाव हैं
प्रबंधन के की भाषा बदलो। मुझे हमेशा लगता है कि आपको अंग्रेजी से इतना
ही मोह है तो अंग्रेजी अखबार नि‍कालिए। कम से कम भाषायी उदारीकरण के आधार
पर बहुसंख्‍यक समाज के गद्य को क्‍यों खराब कर रहे हैं? खासकर तब जब उस
तरह की भाषा कर देने से अखबार के पाठक नहीं बढते हैं। यह कितना बड़ा
कुप्रचार अखबार के वितरण और विपणन विभाग वाले एमबीए ब्रांड लोग करते हैं
कि ऐसा करने से चीजें बदल जाएंगी। दुर्भाग्‍य से कुछेक जगह छोड़कर हिंदी
की भाषायी पत्रकारिता में विषय वस्‍तु को लेकर चिंता ही नहीं है। अखबारों
के फीचर विभाग और विशेष आलेखों के विभाग इंटरनेट पर इतने आधारित है कि
अंग्रेजी के पिष्‍टपेषण में लगे हुए हैं। मौलिक चिंतन, फीचर और आलेखों का
नितांत अभाव है और भाषायी लिहाज से हमें एक खतरनाक भ‍विष्‍य की ओर ले
जाया जा रहा है।

एक मिनट के लिए मान लीजिए कि इससे भी समाज की भाषा खराब नहीं होती तो
मुझे उससे भी बड़ी सहानुभूति उन हिंदी के पत्रकारों के साथ है, जो इस दौर
में पत्रकारिता में आ रहे हैं। उन पर हिंगलिश लिखने का दबाव है। वे सबसे
दुर्भाग्‍शाली युवा हैं, वे पांच दस साल की कलमघिसाई के बाद ना तो अच्‍छी
हिंदी लिखने के काबिल हैं और ना ही अच्‍छी अंग्रेजी के। एक खिचड़ी पीढी
के पत्रकार इस समय पैदा हो रहे हैं और पंद्रह साल बाद जब ये लोग अलग अलग
संस्‍करणों के संपादक होंगे और अपने समाज को जो भाषा पढाएंगे उसकी
कल्‍पना मात्र से मैं कांपता हूं।
हिंदी को लेकर ये सब लोग उतने ही अपराधी हैं जिन्‍होंने हिंदी को जटिल
करने और संस्‍कृतनिष्‍ठ करने की कोशिश की। दोनों की हालत में नुकसान इसी
भाषा का है। और यह तर्क भी मत सुनिए भूलिए कि कोई समाज अखबार से अपनी
भाषा नहीं सीखता। आप कैसे मान सकते हैं कि जिस हिंदी में पढ़ने के नाम पर
सबसे ज्‍यादा हिंदी अखबार ही पढे जाते हैं तो वे किसी साक्षर समाज की
भाषा का निर्माण करने के सबसे जिम्‍मेदार माध्‍यम हैं।

एक और बात जो मुझे हमेशा परेशान करती है कि कहने को आम आदमी का दावा हम
लोग करते हैं लेकिन मैं दावे से कह सकता हूं कि हमारे बहुसंख्‍यक भाषायी
मीडिया के पास उस आम आदमी के हक का एजंडा तेजी से गायब होता जा रहा है।
यह बात मैं अधिकारपूर्वक कह सकता हूं। हिंदी के ज्‍यादातर अखबारों के
नगरीय और डाक संस्‍करण के फर्क को देख लीजिए। हमारे पत्रकार ना जाने किस
फूंक में रहते हैं। महानगर में रहने वालों के लिए कस्‍बा और गांव तो खबर
ही नहीं है। यह कितनी बड़ी विडम्‍बना हमारे समय की है कि अखबारों के
स्‍थानीय संस्‍करण तेजी से बढे हैं ताकि वे स्‍थानीय खबरों को अहमियत दे
सकें लेकिन अफसोसजनक ढंग से उनकी विषय वस्‍तु उतनी ही घटिया और गैर जरूरी
हो गई है। वहां आधे से ज्‍यादा पेज इस बात से भरे रहते हैं कि किस मंदिर
में क्‍या सत्‍संग चल रहा है। कौनसे चौराहे पर जुआ खेलते लोग पकड़े गए
हैं और किस घर में क्रिकेट का सट़टा चल रहा था। अस्‍सी फीसदी स्‍थानीय
समाचार रद़दी में फेंकने लायक होते हैं लेकिन वे प्रमुखता से छपते हैं।
तो यह अपराध भी हिंदी पत्रकारिता के माध्‍यम से हो रहा है कि जिस तरह
राजनीति, समाज और अपराध या विकास को लेकिन एक समाज संवेदनशील होने की
प्रक्रिया से गुजरता है, वह खंडित हो गई है। स्‍थानीय प्रशासन को फर्क ही
नहीं पड़ता है उनको पता है कि इस अखबार को इलाके का एमएलए भी नहीं पढ रहा
क्‍योंकि इस समय विधानसभा चल रही है और वह राजधानी में है। तेजी से
गांवों को पत्रकारिता से बेदखल किया जा रहा है, जहां इस देश की
बहुसंख्‍यक आबादी रहती है।
तो इस बात का यह अर्थ ना लगाएं आप कि जो स्‍थानीय स्‍तर पर पत्रकार काम
कर रहे हैं, वह गैर जरूरी है। असल में उनको प्रशिक्षित करने का कोई एजंडा
नहीं है कि उन्‍हें किस तरह से घटनाओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाए। यही
वजह है कि हमारे भाषायी अखबारों की भारी भरकम प्रसार संख्‍या के बावजूद
पिछले कितने सालों में ऐसी कोई खबर उभरकर नहीं आई जो सत्‍ता या भ्रष्‍ट
तंत्र को हिलाए।

बाजार और‍ विज्ञापन की अघोषित सी साजिश चलती दिखती है। नरेगा मजदूरों के
मिलने वाली मजदूरी के घोटालों की खबर पर संपादकों की संवेदनाएं मरी हुई
हैं। वे कहते हैं, यह क्‍या हरदम गरीबी का रोना रोते रहते हैं। क्‍योंकि
वह मजदूर हमारा उपभोक्‍ता नहीं है। बिना नाम लिए मैं उल्‍लेख करूंगा कि
एक अखबार ने लावारिस लाशों के फोटो छापने बंद कर दिए कि इससे क्‍या फर्क
पड़ता है। संपादकीय बैठकों में यह कहा जाता है कि चूंकि गरीब आदमी तो
हमारा उपभोक्‍ता है, नहीं लिहाजा उसकी खबर क्‍यों छापी जाए। तो साब, नारा
लगाना बहुत आसान है और जब सामने पुलिस हो तो भी नारा लगाया जा सकता है,
लेकिन जब यह पता चले कि गोली चल सकती है तो पीछे हट जाने से आप
स्‍वतंत्रता सेनानी नहीं बनते। प्रॉब्‍लम हमारी यही है कि हमारे बीच से
तेजी से संवेदनशील पत्रकारों की नई जमात गायब हो रही है। वे चाटुकार
अच्‍छे हैं, वे कपड़े ब्रांडेड पहनते हैं, वे तेजी से नौकरियां बदलते हैं
क्‍योंकि इससे उनका वेतन बढता है। तो पत्रकार होने और किसी बैंक में
मैनेजर होने जैसी नौकरियां एक सी हो गई हैं। वे इस बाजार के हाथों में
खेल रहे श्रमिक हो गए हैं। दोष पत्रकारों का नहीं, प्रबंधन भी तो ऐसा ही
चाहते हैं। यह मान लिया गया है कि आपकी सबसे बड़ी योग्‍यता युवा होना ही
रह गया है। ये ऐसे युवा हैं जो गली कूचों में खुली पत्रकारिता के नाम पर
धंधा करने वाली कॉलेजों से निकलकर आए हैं और उन्‍हें लगता है कि दुनिया
को वे ही लोग चला रहे हैं। मुझे तो समझ में नहीं आता कि पत्रकारिता की
पढाई का औचित्‍य क्‍या है। आप पत्रकारिता क्‍या है, उसका इतिहास क्‍या
है, खबरें कैसे लिखी जाती हैं इस तरह की व्‍याकरण वाली बातें तो पढा सकते
हैं लेकिन एक अच्‍छा पत्रकार कैसा होता है इसका फार्मूला कोई नहीं होता।
आप किसी स्‍कूल में पढाकर गणेश शंकर विद्यार्थी, राजेंद्र माथुर या
प्रभाष जोशी पैदा नहीं कर सकते। दुर्भाग्‍य से पत्रकारिता में यह मान
लिया गया है कि जिसका वेतन ज्‍यादा है, वही बड़ा और वरिष्‍ठ पत्रकार है,
जबकि आप जानते हैं आठ महीने में तीन नौकरियां बदलने से भी वेतन बढ सकता
है। चालीस पैंतालीस साल के पार हो गए हैं तो आप किसी काम के लायक नहीं है
और आपकी नौकरी पर खतरा है, यदि आप उन सब हथकंडों को नहीं जानते जो
मैनेजमेंट स्‍कूल में पढाए जाते हैं कि बॉस गुस्‍से में हो तो कैसे
व्‍यवहार करें और बॉस की कार पंक्‍चर हो गई हो तो आप कैसे अपने नंबर
बढाएं। कभी कभी बहुत ही बुरा लगता है कि किस तरह से मीडिया पत्रकारों से
खिसककर मैनेजरों के हाथ में जा रहा है लेकिन याद रखिए मैनेजर कभी आम
लोगों की नहीं सोचता, वह अपना और अपनी कंपनी का मुनाफा देखता है। हाशिए
के लोग हमारे समय के सबसे दुर्भाग्‍यशाली लोग हैं, जिनको हमने
नक्‍सलवादी, चोर उचक्‍के, फुटपाथी या भिखारी कहकर अपराधी ही मान लिया है
जैसे इस देश की छवि उनके होने से ही खराब है, बाकी अंबानी, टाटा,
मित्‍तल, तेंदुलकर, अमिताभ बच्‍चन, शाहरुख खान आदि ने तो कोई कसर नहीं
छोडी है कि दुनिया में भारत का डंका बुलंद हो। मैंने पिछले डेढ दशक में
पत्रकारिता करते हुए यह भोगा है कि आम आदमी की जो जगह अखबार में थी, उसे
अमिताभ बच्‍चन, शाहरुख खान, अंबानी बंधु, टाटा, राडिया, मित्‍तल आदि लोग
घेरकर बैठे हैं, जैसे महानगरों और शहरों में फैलते माफियाओं ने किसानों
को अपनी जमीन से बेदखल कर दिया। और कोई क्रांतिकारी उम्‍मीद बची नहीं है।
ये लोग और घातक तरीके से हमलावर होंगे। आम लोगों को बेदखल करने के लिए।
अफसोस यही है कि हम पत्रकार भी अब हथियार डाल चुके हैं, क्‍योंकि हमें डर
है कि आम लोगों को अखबार में घुसाने से हमारे खुद के बेदखल होने का खतरा
है। क्‍योंकि बाजार सिर्फ अपने उपभोक्‍ता की परवाह करता है, और वह परवाह
ऐसी है जैसे कसाई अपने बकरे को पालता पोषता है। ममता से नहीं, बल्कि उसकी
गर्दन काटकर मांस खाने के लिए। मैं एक डरी हुई पीढ़ी का पत्रकार हूं। मैं
अपनी गर्दन बचाकर चलता हूं हालांकि मुझे पता है कि उस्‍तरे धार किए जा
रहे हैं और यह गर्दन कटनी है, फिर भी मैं अपने समय का अपराधी हूं कि मैं
अपनी आंखों से हाशिए के लोगों को बेदखल होते देख रहा हूं।
हिंदी मीडिया का यह एक खराब दौर है। दुआ करता हूं यह इससे जल्‍दी बाहर
निकले। हां, यह पैसा कमाने का दौर तो है लेकिन जब पूरे देश में भ्रष्‍ट
तंत्र घर कर गया है। ऐस समय में जब पटवारी से लेकर मंत्री तक पैसा खा रहे
हैं तो जहां हाथ रखो वहीं से खबर मिलती है लेकिन कितनी खबरें छप रही हैं,
आप और हम सब देख रहे हैं। दुर्भाग्‍य देखिए हिमालय की कंदराओं से योग
सिखाने का भेस पहनकर आया एक बाबा शक्ति का केंद्र बन रहा है और वह देश पर
राज करने के सपने देख रहा है। अगले चुनाव तक कोई एक राजनीतिक पार्टी उस
बाबा का मुखौटा जरूर पहनेगी। और यह विषयांतर कतई नहीं है क्‍योंकि इसमें
मीडिया भी उतना ही बड़ा अपराधी है।

वै‍कल्पिक मीडिया खड़ा हो रहा है। सोशल नेटवर्क साइट़स की वजह से, या
ब्‍लॉग की दुनिया में। वहां मुझे बहुत उम्‍मीदें दिख रही हैं। हमारे समय
में हम गवाह रहे हैं कि कुछ क्रांतियां खड़ी हुई हैं। मठाधीश बौखलाए हैं
लेकिन मुझे डर है यहां भी पहरे लगेंगे देर सबेर। इसलिए नए रास्‍तों की
तलाश जारी रहनी चाहिए। लेकिन इससे बड़ी मेरी अपेक्षा यह है कि हमारा
मुख्‍य धारा का मीडिया अपनी भटकन छोड़कर अपने जमीर से पूछे। क्‍या उन
पत्रकार मित्रों को शर्म भी नहीं आती जो पच्‍चीस साल पहले एक पवित्र मिशन
के साथ उतरे थे और आज सिर्फ अपनी टीआरपी महत्‍वाकांक्षाओं के लिए अपने
चैनलों पर यह दिखा रहे हैं कि किस घर में डायन आती है और कहां सांप ने एक
पूरे गांव को बचा रखा है और कैसे एक कापालिक की हवस आज भी उसे भूत बनाकर
अतृप्‍त डोला रही है। जिस देश में आधी जनता भूखी सोती है, जिस देश में
संसाधनों पर दस फीसद आबादी का कब्‍जा है, वहां ऐसी पत्रकारिता के लिए
जनता की अदालत में आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। या इन सब चैनलों को
एंटरटेनमेंट चैनल कर देना चाहिए। लेकिन सरकारें ऐसा नहीं करेंगी क्‍योंकि
वे खुद नहीं चाहती कि कोई ये सब कार्यक्रम बंद करके उनकी तरफ झांके।

(PUBLISHED IN KATHADESH MEDIA ISSUE IN APRIL 2011)

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

बर्फीले बंगले में पिघलते रिश्ते

निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा और निर्देशक मृगदीप सिंह लांबा की फिल्म "तीन थे भाई" तीन ऎसे भाईयों की कहानी है, जो हमेशा एक दूसरे से नफरत करते हैं और अलग अलग रहते हैं। एक डिक्सी (ओम पुरी) की दुकान है शहर में। दूसरा हैप्पी (दीपक डोबरियाल) डेंटिस्ट है और तीसरा फैंसी (श्रेयस तलपड़े) एक्टर बनना चाहता है। इनके मरहूम दादाजी (योगराज सिंह) ने इनके नाम पहाड़ पर एक बंगले और जमीन की करोड़ों की वसीयत लिखी है लेकिन शर्त यह है कि वे तीन साल तक उस घर में बिना लड़े रहेंगे। फिल्म इसी मोड़ पर शुरू होती है जब चारों तरफ बर्फीला सा तूफान है और तीनों भाई उस बंगले पर पहुंचते हैं। लेकिन उनका लड़ाई झगड़ा खत्म नहीं होता। सबसे छोटा फैंसी एक कुत्ते को भी अपने साथ रखता है और उन्हीं के पास दादाजी की अस्थियां भी हैं जो तीन साल बाद ही प्रॉपर्टी मिलने के बाद ही प्रवाहित की जानी हैं।

कहानी में ये तीनों पात्र एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। कालांतर में पहाड़ पर ही भटकते हुए कुछ अंग्रेज लड़कियां इन्हें मिलती हैं और इनके लिए एक नई मुसीबत खड़ी करती हैं। इस मुसीबत से निपटते ही दूसरी आती है और नाटकीय घटनाक्रम में फिल्म अंत तक पहुंचती है।

फिल्म की सबसे ताकतवर चीज गुलजार के गीत हैं और सबसे बड़ी कमजोरी इसका संपादन। कई दृश्य अनावश्यक लंबे हैं। दूसरी, कमजोरी पटकथा की बाधित करने वाली गति है। कहानी की गति अविश्वसनीय ढंग से आगे बढती है और कुछ गैर जरूरी से दृश्य संपादक ने फिल्म में क्यों रहने दिए समझ नहीं आता संवाद साधारण है और जादुई नहीं लगते। इंटरवल तो फिल्म खिंचती हुई सी चलती है लेकिन इंटरवल के बाद थोड़ी गति पकड़ती है। फिल्म की खूबसूरत लोकेशन्स और बर्फानी वादियां इसकी ताकत है कि आपको थियेटर आपको बर्फानी अहसास होता है। ओमपुरी ने ठीक अभिनय किया है लेकिन उम्र और वजन ने उन्हें शिथिल किया है। तनु वेड्स मनु के बाद दीपक डोबरियाल लगातार सहज और आकर्षक लगे हैं। श्रेयस ने काम चलाऊ काम किया हैं। क्रिकेटर युवराज के पिता योगराज सिंह दादाजी के रोल में इस फिल्म से डेब्यू कर रहे हैं और कहीं कहीं लाउड हैं। यूं तो पूरी फिल्म के पात्र ही जरूरत से ज्यादा लाउड लगते हैं। यदि आप परंपरागत कॉमेडी फिल्मों से ऊबे हुए हैं तो "तीन थे भाई" एक टाइमपास फिल्म है। सिर्फ सब्जेक्ट अलग होने मात्र से वह बहुत ज्यादा जादू पैदा नहीं करती है। संगीत औसत है।

शनिवार, अप्रैल 09, 2011

बेवफा पतियों की टाइमपास कॉमेडी

film review-- THANK YOU

‘थैंक यू’ इस हफ्ते रिलीज अनीस बज्मी निर्देशित और अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म है जो शायद दोनों के लिए लगातार विफलताओं के बीच एक आखिरी चिराग की तरह हिल डुल रही है। आइपीएल की हवा है। दीये में तेल कमजोर है। चिरागों से लौ जा रही है।
‘थैंक यू’ का कथासूत्र अनीस की पुरानी फिल्म ‘नो एंट्री’ का दोहराव है जहां तीन लंपट पति हैं और जिन्हें अपनी पत्नियों से इतर दूसरी लड़कियों के साथ इश्क लड़ाने में आनंद आता है। घर में एक प्यार का ढोंग करता है, एक अतिरिक्त डरने का और तीसरा सामंती किस्म का है जो रात को तीन बजे भी चाय पीने के लिए पत्नी को ही कष्ट देता है। चौथा आदमी जासूस है, जिसकी भूमिका अक्षय कुमार ने की है और वह इन तीनों ही जोड़ों में एक दूसरे के लिए जासूसी करता है। तीनों पत्नियों के लिए यह आदमी उनके मर्दों की जासूसी करता है और तीनों पति उस जासूस को ढूंढऩे उसी आदमी से मदद मांगने पहुंचते हैं जो पहले से ही इनकी जासूसी में लिप्त है। एक गुत्थी सुलझती है और दूसरी उलझती है और अंतत: एक प्रवचननुमा अंत में फिल्म लंपट पतियों के लिए प्रेरक कथा की तरह लगती है कि किस तरह दुनियाभर की सारी पत्नियां आपके लिए त्याग करती हैं और पति किस तरह बाहर की तरफ मुंह मारते हैं।
कहानी में ‘नो एंट्री’ जैसी ताजगी नहीं और संवादों में वैसा विट भी नहीं है। बहुत जगह निर्देशकीय स्वच्छंदता दर्शक पर भारी पड़ती है, जैसा कि अनीस अपनी हर फिल्म में करते हैं लेकिन  हास्य की एक ही हांडी में बार बार कामयाबी नहीं उबाली जा सकती। अक्षय कुमार के लिए भी फिल्म कुछ खास नहीं कर पा रही है। बॉबी देओल, सुनील शेट्टी, ठीक हैं। सोनम कपूर बनावटी ज्यादा लगी हैं, रिमी सेन साधारण हैं और सलीना जैटली फिल्म के बहुत कम हिस्से में हैं। पूरी फिल्म में सबसे आकर्षण का केंद्र इरफान हैं, जो सिर्फ अपने संवाद बोलने के ढंग से ही एक साधारण संवाद में भी एक मुस्कान पैदा कर देते हैं। खूबसूरत लोकेशन्स की भी तारीफ हो सकती है लेकिन बिकिनीधारी विदेशी बालाओं की फिल्म में अतिरिक्त उपस्थिति बॉक्स आफिस की कामयाबी की गारंटी नहीं होती। गीत संगीत साधारण हैं और मल्लिका आयटम सॉन्ग में भी औसत लगी है। एक लाइन में, यह फिल्म अनीस और उससे भी ज्यादा अक्षय कुमार के लिए अग्नि परीक्षा है।

शनिवार, फ़रवरी 26, 2011

अटेंड करने लायक शादी





तनु वेडस मनु निर्देशक आनंद राय की केवल एक रोमांटिक कॉमडी नहीं है बल्कि कहीं कहीं वह भावनात्मक रूप से भी आपको छूती है।

लंदन में रहने वाला डॉक्टर मनु (माधवन)भारत आता है और माता पिता के दबाव में शादी के लिए लड़की ढूंढ़ने निकला है, वहीं मुलाकात तनु (कंगना रानौत) से होती है लेकिन तनु किसी से प्यार करती है और अपने बॉयफे्रंड भी जल्दी बदलती है। वह सिगरेट पीती है, वोदका और रम भी खींच लेती है कभी कभार। इधर मनु जब पहली बार तनु को देखता है तो वह उससे प्यार कर बैठता है और जब वह उससे शादी से इनकार कर देती है, एक बार तो बिगड़ती है लेकिन दूसरे सिरे से उसकी मुलाकात तनु से हो जाती है।

वह उसके मेंटर की तरह काम करने लगता है और कहानी प्रेम के त्रिकोणों और चतुष्कोणों से आगे बढ़ते हुए अंजाम तक पहुंचती है। एक तरह से अपनी पूर्ववर्ती कुछ छोटी और कामयाब फिल्मों की तरह इस फिल्म की तारीफ इसलिए भी लाजिमी है कि यहां असली भारतीय मध्यवर्गीय परिवार है। यहां सिर्फ दूल्हा एनआरआई है लेकिन वह हिंदुस्तानी ही चेहरे मोहरे वाला है।

असल में जगह जगह लड़की देखना एक अजीब सा लगता है लेकिन छोटे शहरों में होने वाली नुमाइश परेड पर यह तंज भी दिखता है। इस कहानी की लड़की लोगों के मुताबिक अपने घर वालों के हाथ से निकल चुकी है और लड़की सोचती है सब कुछ सीधा सपाट हो जाए तो क्या मतलब। कुल मिलाकर वह एक कंन्फ्यूज्ड लड़की कहानी है, जो कुछ कुछ जब वी मेट की करीना कपूर से मिलती है। लेकिन आनंद राय ने अपने चरित्र थोड़ा अलग किया है और कंगना उसमें जमती है।

इंटरवल के बाद फिल्म थोड़ी धीमी पड़ती है लेकिन एक अच्छे क्लामेक्स की वजह से मनोरंजक बन पड़ी है। माधवन निस्संदेह फिल्म की जान हैं लेकिन दीपक डोबरियाल की उपस्थिति हर जगह आपके चेहरे पर मुस्कान रखती है। जिम्मी शेरगिल भी हैं और उन्होंने अपने हिस्से को काम अच्छा किया है।

फिल्म के गीत संगीत बेहतर हैं। रंगरेज गीत लिखा बहुत अच्छा गया है तो कदे सडी गली भी आया करो के गीत संगीत बेहद उम्दा है और फिल्म की जान है। पता नहीं फिल्म में गीत अधूरा सा ही क्यों इस्तेमाल हुआ लगता है। बीप की ध्वनि की ध्वनि के साथ कुछ गालियां हैं इसके बावजूद तनु और मनु की शादी में आप एक बार सपरिवार जा सकते हैं। निराश नहीं होंगे। 

रविवार, फ़रवरी 20, 2011

एक था बीबीसी लंदन

हालांकि अब यह तय हो गया है की बीबीसी हिन्दी के सेवायें अभी जारी रहेंगी लेकिन यह लेख उस निर्णय से पहले लिखा गया था और डेली न्यूज़ के सन्डे सप्लीमेंट हमलोग में छापा था.

बीबीसी लंदन भारतीय जनमानस में सिर्फ एक रेडियो सेवा ही नहीं है, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की अनौपचारिक पाठशाला भी रही है यानी भारत में लोकतंात्रिक मुल्यों के विकास में जिन संस्थाओं का परोक्ष परंतु महत्वपूर्ण योगदान रहा है, उनमें बीबीसी लंदन की हिंदी सेवा को पहली कतार में गिना जा सकता है, दूरदराज में जहां अखबार नहीं पहुंचता था, एक गैरतरफदार रेडियो के रूप में बीबीसी ने देश को राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर बुहत कुछ सिखाया, पढ़ाया है ...

यह अस्सी के दशक के शुरूआती दिन थे जब मेरे हमारे गांव में सड़क नहीं थी। बिजली के खंभे भी गांव के एक ही हिस्से में थे, जहां ट्यूब वेल खुद रही थी। हमारे मोहल्ले के कुएं में ऊंट जोतकर चड़स से पानी खींचा जाता था। और स्कूल शायदी उसी साल पांचवी से आठवीं कर दिया गया था। गांव के कुछ लोग खाड़ी के देशों में मजदूर बनकर जाना शुरू ही किया था और चूंकि उनकी मुद्रा विदेशी होती थी इसलिए जब वे गांव लौटते थे तो गांव उनको अफसरों जैसा सम्मान देता था। वे लोग भी पूरे मजे से गांव के लोगों से मिलने वाली इज्जत का पूरा मजा लेते थे। गांव लौटते में उनके पास एक छोटा सा जादुई डिब्बे जैसा कुछ यंत्र होता था जिसे वे रेडियो कहते थे। 

ट्रांजिस्टर भाषायी लिहाज से शायद सही शब्द है लेकिन सब की जुबान पर वा रेडियो ही रहा है। ऎसा ही एक रेडियो पिताजी के एक भतीजे ने यानी मेरे चचेरे भाई ने उन्हें लाकर दिया था। और पिताजी सबसे पहले स्कूल के मास्टर के यहां गए थे, जिनके पास पहले से ही रेडियो था। उसमें आकाशवाणी तो हम सुनते ही थे लेकिन पिताजी ने बीबीसी लंदन की मीटर वेव पूछ ली थी और बीबीसी लंदन की हिंदी सेवा घर की नई आरती हो गई थी, जिसे सुनना हम बच्चों की शुरूआती दिनों में मजबूरी थी, लेकिन धीरे धीरे आदत बन गई। उसमे मजा आने लगा। सारे गाने बजाने छोड़ शाम सात बजकर चालीस मिनट से पहले आठ दस तक और फिर जब उनका समय बढ़ गया तब साढे सात से साढे आठ तक। कैलाश बुधवार, अचला शर्मा, राजनारायण बिसारिया, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, परवेज आलम, शफी नकी जामयी, गौतम सचदेव, विजय राणा। 

आज जिन पंकज पचौरी को आप एनडीटीवी इंडिया पर देखते हैं, वे शायद नब्बे के दशक में इंडिया टुडे छोड़कर बीबीसी गए थे। जयपुर के राजेन्द्र बोहरा थे जिनको मैं बाद में सुनता रहा, उनका एक रूपक आया करता था। इसी तरह बाद के बरसों में ललित मोहन जोशी ने सिनेमा के इतिहास पर एक एक बेहतरीन प्रोग्राम तैयार किया था। सुबह-सुबह वे सीधी बात कराते थे पत्रकारों से और मेरे खयाल में अखबारों में आज क्या छपा है यह सब भी मैं बाद के सालो में सुनता रहा।

बाद में स्कूल में चार साल मैं हॉस्टल में रहा था और वहां रेडियो रखने की मनाही थी। लेकिन मैं एक छोटा सा रेडियो चुपके से अपने कमरे में दबाकर रखा था और बीबीसी हिंदी सुनता था। मेरी बीबीसी के बदले मेरे कमरे के बाकी साथी फिल्मी गाने और क्रिकेट की कमेंट्री सुनते थे। मैं अगर उन्हें रेडियो ना देता तो वे वार्डन से मेरी शिकायत कर सकते थे। इस विवरण का आशय कोई आत्मप्रशंसा या प्रचार नहीं है लेकिन जब से यह खबर मिली है कि बीबीसी की हिंदी सेवा बंद हो रही है, तो मुझे मन ही मन तकलीफ हुई। हालांकि पिछले कुछ साल में मैंने बीबीसी सुनना बंद कर दिया है फिर भी एक भी दिन ऎसा नहीं है जब मैं इंटरनेट खोलूं और बीबीसी की साइट पर ना जाऊं। लेकिन वहां भी मैं रिकॉर्डेड प्रोग्राम इंटरनेट से सुनता हूं। 

खाड़ी युद्ध के दिनों में 
खाड़ी युद्ध हम जैसे दूरदराज के गांवों से आने वाले उन युवाओं के लिए बीबीसी हिंदी आज भी शायद उतना ही उपयोगी हो जितना कभी मेरे लिए रहा है। मुझे खुद पर ताज्जुब होता है, जब हॉस्टल के दिनों में खाड़ी युद्ध पर एक डायरी तैयार करता था जिसमें पैट्रियट और स्कड मिसाइलों के फर्क से लेकर अमेरिका और यूरोप की बिदेश नीति तथा भारत के रवैए से जुड़ी चीजें हुआ करती थी। मैं सुबह के अखबार आने से पहले ही बता दिया करता था आज अखबारों में यह सब छपेगा। 

उसके बाद
हमारे घर के पड़ोस में रहने वाले मेरे चाचा दुलाराम अब सत्तर पार के हो गए हैं लेकिन उनका बेटा कोई डेढ़ दशक पहले सोमालिया गया था। संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना में। वे सुबह नियमित रूप से बीबीसी सुनते थे क्योंकि उसके लिए ऎसा कोई समाचार माध्यम नहीं था जो वहां की नियमित रिपोर्टिग करता हो। हमारे टीवी चैनल्स देखते हुए हमेशा यही लगता है कि दुनिया में हिंदुस्तान ही एक देश है और वहां भी मुंबई, दिल्ली जैसे ही शहर हैं। गांव तो जैसे गायब हैं। बहरहाल बरसों बाद जब हम कॉलेज में थे और उड़ती उड़ती खबर आई थी कि हमारे गांव और आसपास में कुछ लोग जहरीली शराब पीने से मर गए हैं तो हमारे पास बीबीसी हिंदी की रात पौन ग्यारह की सभा सुनने के अलावा कोई मीडियम नहीं था, जहां से पुष्टि हुई और अपने उस कस्बे का नाम मैंने रेडियो पर सुना जहां हम आते जाते बड़े हुए थे। 

कहने का मतलब यह है कि वह मेरे गांव से सोमालिया, यूगोस्लाविया, युगांडा तक की खबरें एक ही मीटर वेव पर सुन लिया करते थे और उनपर भरोसा कर लिया करते थे। आज भी मैं गांव जाता हूं तो कई युवा मुझसे पूछते हैं कि मैं जयपुर में रहता हूं तो क्या नारायण बारेठ को जानता हूं जो बीबीसी पर बोलते हैं और मेरी हां में वे खुश होते हैं। इसका मतलब यह है कि गांव में तमाम आधुनिकता के बावजूद लोग बीबीसी को सुन रहे हैं। आज भी कोई एक करोड़ से ज्यादा लोग बीबीसी हिंदी सुनते हैं। जहां बिजली नहीं है, टीवी नहीं है वहां यही खबरें हैं जो लोगों की मदद करती हैं। 

इंदिरा की मौत का दिन 
मुझे याद है जब इंदिरा गांधी की हत्या की खबर पूरे गांव में एक अफवाह की तरह थी तो हमारे घर में शाम को पुरूषों और महिलाओं का मेला सा लगा था। रेडियो ऑन था और जब यह सबसे पहले बीबीसी पर आई कि इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई है तो महिलाएं रोने लगी थीं और पुरूष मुंह लटकाए आंखें नम किए बैठे थे। इससे पहले सब लोग इस इंतजार में थे कि शायद वे घायल हुई हैं और बच जाएंगी। इसी तरह राजीव गांधी की हत्या की खबर भी रात को पौने ग्यारह बजे की सभा में सबसे पहले बीबीसी से ही मिली थी। 

बाजार में 
समझदार होने के बाद, बाजार और उत्तर आधुनिकता को समझने के बाद यह भी समझ में आने लगा कि किस तरह समाचार मीडिया भी बुरी तरह से बाजार के दबाव में रहा है। यहां तक कि बीबीसी के पूर्व संपादकों ने बीबीसी की निष्पक्षता को भी संदिग्ध भी बताया लेकिन जो एक दृष्टि साम्राज्यवाद के खिलाफ और आम आदमी के हक में समाचारों को सुनते हुए विकसित होती है, उसमें बीबीसी ने मेरे खयाल से बहुत मदद की है। राजनीतिक और सांस्कृतिक विविधता वाली जो चेतना दूर दराज की हिंदी बेल्ट में बीबीसी हिंदी की रेडियो प्रसारण सेवा का मेरे खयाल से बड़ा योगदान रहा है, क्योंकि आकाशवाणी और दूरदर्शन की खबरें भी मैं लगातार सुनता रहा हूं और उनमें ज्यादातर सरकारी महिमागान होता है। दुर्भाग्य से वह बढता ही जा रहा है। 

समकालीन समाचार परिदृश्य में जितने हिंदी के चैनल आ गए हैं उनको देखते हुए यह अफसोस होता है कि यह कहां आ गए हैं हम? एक ऎसे अजूबे देश में जहां भूत प्रेत, साधु संन्यासी, नेता, डकैत, फिल्मवालों की तो खबरें हैं लेकिन आम आदमी की खबरें गायब हैं। ऎसे में बीबीसी आम लोगों के बीच फैला ऎसा माध्यम है, जो लोगों की राजनैतिक, सांस्कृतिक और भाषायी चेतना के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण था और सही अर्थो में इसके बंद होने का नुकसान बीबीसी के उन पत्रकारों से कहीं ज्यादा उन बचे हुए गांव देहात के स्रोताओं का है।

क्योंकि पत्रकारों की जमापूंजी होगी और उन्हें नई जगह काम भी मिल जाएगा लेकिन उन स्रोताओं को दूसरा बीबीसी लंदन नहीं मिलेगा। जिस तरह से साइकिल के गायब होने और मोटरसाइकिल और कार के आने को हम प्रगति समझ रहे थे लेकिन दुनिया के कई देशों में साइकिल पुन: प्रासंगिक हो गई है, वैसे ही रेडियो गायब होने के बाद एफएम के रूप में वो पुन: लोगों के बीच आ गया लेकिन अफसोस तो यह है, वहां बीबीसी जैसे माध्यम में बाजार का दबाव है और वे मोबाइल और इंटरनेट पर जा रहे हैं। 

और ऎसा भी होता है
जयपुर के राजेन्द्र बोहरा को बीबीसी लंदन से मैं स्कूल के दिनों में सुनता था और दूसरे प्रसारकों की तरह उनके भी कई रूपक मुझे याद थे। बरसों बाद जब मैं जयपुर में उनसे मिला था तो उन्हें मेरे लिखे कुछ न्यूज फीचर याद थे। जयपुर में हम एक ही पार्टी में थे, जब एक मित्र ने हमारा परिचय कराया तो वे मेरी तारीफ कर रहे थे और मैं उनकी। मेरी आंखें नम थीं, मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि बचपन से प्रिय मेरे उस प्रसारक से कभी रूबरू मिल पाऊंगा और वह मुझे मेरे नाम से जान रहा होगा जैसे मैं उन्हें उनके नाम से जानता था, चेहरे से नहीं। 

उन्होंने पार्टी में लगे पेय की तरफ इशारा करते हुए पूछा था, लेते हो? और मेरी हां पर वे खुश हुए, बोले, आज मजा आयगा जब मिल बैठेंगे, दो यार। उसके बाद हम लगातार मिलते रहे। कोई चार साल पहले जब बोहरा जी के निधन की खबर आई थी तो मैं बेहद उदास था, जैसे कोई मेरे परिवार से चला गया है। वैसे ही, अब बीबीसी हिंदी रेडियो के अवसान की खबर है, जो सचमुच मुझे उदास कर रही है। 

(डेली न्‍यूज के संडे सप्‍लीमेंट हमलोग में रविवार 20 फरवरी 2011 की कवर स्‍टोरी)