विशाल भारद्वाज की फिल्म सात खून माफ एक ऎसी औरत सुजैन या सूजी की कहानी है जिसे जीवन में सच्चा प्यार चाहिए और उसे उसके पति खराब ही मिलते हैं, एक नहीं पूरे छह। अपने रिश्तों को बचाने की जद्दोजहद में जब वह हार जाती है तो पति का खून कर देती है। उसके मददगार घरेलू नौकर हैं जो आखिर तक उसके साथ रहते हैं और उसकी हर हत्या का रहस्य जानते हैं।
सिनेमाई व्याकरण के लिहाज से फिल्म का नैरेटिव समझ में आने वाला और सपाट है। वह कमीने की तरह उलझा हुआ नहीं लेकिन इतना साधारण है कि एक नए पात्र का चेहरा पर्दे पर आते ही आपको पता चल जाता है कि अब एक और शादी होगी और एक और हत्या। लिहाजा सस्पेंस के मामले में क्लाइमेक्स भी कोई बहुत ज्यादा असर नहीं छोड़ता।
यूं लगता है जैसे कहानी कहने की जल्दी है। पटकथा में कुछेक जगह विट बहुत ही बेहतरीन है! जब तक आप किसी कैरेक्टर को समझें उससे पहले तो वह स्वर्ग सिधार जाता है। नील नितिन मुकेश, इरफान और जॉन की कहानी को ठीक ट्रीटमेंट मिला है लेकिन अन्य कहानियों को समय कम मिला है या वे प्रभावी तरीके नहीं कही गई हैं।
फिल्म के लोकेशन्स बेहतरीन हैं और वे ही हैं जो आपको पर्दे पर देखते रहने के लिए फिल्म को आसान करती हैं। हर फे्रम भरा हुआ है।
प्रियंका चौपड़ा ने बेहतरीन अभिनय किया है और उसके चेहरे के हाव भाव उसकी परिपक्वता को दिखाते हैं। फिल्म का पाश्र्व संगीत बेहद प्रभावी है। लेकिन संगीत ठीक ठाक है। रूसी गाने से प्रभावित डार्लिग ऎसा है जो अच्छा है। बेकरान भी अच्छा है लेकिन संगीत भी फिल्म की गति को मदद नहीं करता है। जाहिर है, दर्शक कोई खून माफ नहीं करते हैं।
सिनेमाई व्याकरण के लिहाज से फिल्म का नैरेटिव समझ में आने वाला और सपाट है। वह कमीने की तरह उलझा हुआ नहीं लेकिन इतना साधारण है कि एक नए पात्र का चेहरा पर्दे पर आते ही आपको पता चल जाता है कि अब एक और शादी होगी और एक और हत्या। लिहाजा सस्पेंस के मामले में क्लाइमेक्स भी कोई बहुत ज्यादा असर नहीं छोड़ता।
यूं लगता है जैसे कहानी कहने की जल्दी है। पटकथा में कुछेक जगह विट बहुत ही बेहतरीन है! जब तक आप किसी कैरेक्टर को समझें उससे पहले तो वह स्वर्ग सिधार जाता है। नील नितिन मुकेश, इरफान और जॉन की कहानी को ठीक ट्रीटमेंट मिला है लेकिन अन्य कहानियों को समय कम मिला है या वे प्रभावी तरीके नहीं कही गई हैं।
फिल्म के लोकेशन्स बेहतरीन हैं और वे ही हैं जो आपको पर्दे पर देखते रहने के लिए फिल्म को आसान करती हैं। हर फे्रम भरा हुआ है।
प्रियंका चौपड़ा ने बेहतरीन अभिनय किया है और उसके चेहरे के हाव भाव उसकी परिपक्वता को दिखाते हैं। फिल्म का पाश्र्व संगीत बेहद प्रभावी है। लेकिन संगीत ठीक ठाक है। रूसी गाने से प्रभावित डार्लिग ऎसा है जो अच्छा है। बेकरान भी अच्छा है लेकिन संगीत भी फिल्म की गति को मदद नहीं करता है। जाहिर है, दर्शक कोई खून माफ नहीं करते हैं।
6 टिप्पणियां:
दर्शक कोई खून माफ नहीं करते हैं.. yahi sach hai filmi dunia ka antim sach!
shukriya.....
badhiya......shukriya......sadhi hui baat
आपने सही कहा....
अच्छा लगा पढ़कर
आप भी जरूर तशरीफ लाइए...
एक गीत तो बहुत ही जबरजस्त है।
अच्छा लगा पढ़कर
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