मंगलवार, जून 07, 2011

सौ बरस के अमर अकीरा कुरोसावा



अकीरा कुरोसावा जापान के फिल्‍मकार थे लेकिन विश्‍व सिनेमा को उनका अदभुत योगदान है। कुरोसावा अपने समय के सबसे आधुनिक और प्रयोगशील सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। मुझे वे इसलिए भी ज्‍यादा लुभाते हैं कि उन्‍होंने सिनेमा बनाने में हर वक्‍त जोखिम ली। खासकर उस दौर में जब हॉलीवुड के सिनेमा अपना व्‍याकरण विकसित करके विश्‍व सिनेमा को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था उस दौर में जापानी समाज को लेकर कुरोसावा के उल्‍लेखनीय काम ने सबकी आंखें खोल दी। बाद में हॉलीवुड सिनेमा कुरोसावा के प्रभाव से बच नहीं पाया।
जापान इस मामले में आगे रहा है कि इस छोटे से देश के सांस्‍कृतिक सामाजिक परिदृश्‍य को पूरी दुनिया में पहचान दिलाने में यहां के लेखकों और फिल्‍मकारों की महत्‍त्‍वपूर्ण भूमिका रही है। दूसरे विश्‍वयुद़ध के दौरान परमाणु हमला झेलने के बाद तो वैसे भी जापान पूरी दुनिया के केंद्रीय चिंतन में था और वहां के सिनेमा में इस त्रासदी का असर देख सकते हैं।
कुरोसावा टोक्‍यो के नजदीक तेईस मार्च 1910 को पैदा हुए थे। वे अपने मां बाप की सातवीं संतान थे। उनक पिताजी एक सैनिक अफसर थे और मां व्‍यापारी परिवार से थी। उसके पिता काफी सख्‍त थे और उन्‍हें अपनी पारंपरिक समुराई तलवार बहुत प्रिय थी। वे अपनी पत्‍नी से नाराज होते थे कि वह सब कुछ समुराई परंपरा के मुताबिक नहीं करती थी।
कुरोसावा जब छोटे थे तो उन्‍होंने एक सपना देखा था कि वे एक रेलवे ट्रेक एक तरफ हैं और उनका परिवार दूसरी तरफ। एक कुत्‍ता है जो दोनों के संदेश एक दूसरे को पहुंचा रहा है। इसी दौरान रेल के आने से कुत्‍ता कट गया। उन्‍हें लगा जैसे वह टुना फिश की तरह कटा है। इसके बाद वे तीस साल तक इस समुद्री मछली को खा नहीं पाए थे।
वे अपने स्‍कूल में रोते बच्‍चे कहलाते थे। 1930 में अपनी सेना भर्ती की शारीरिक परीक्षा उत्‍तीर्ण नहीं कर पाए थे। वे वॉनगॉग और सीजेन से प्रभावित थे और एक पेंटर बनना चाहते थे लेकिन जल्‍द ही उन्‍हें यह अहसास हो गया कि इसमें वे कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं तो उनका रुझान साहित्‍य की तरफ हुआ लेकिन जल्‍द ही यहां भी उन्‍हें कुछ जमा नहीं। हम उनके सिनेमा पर गौर करते हैं तो पाएंगे कि वहां पेंटिंग्‍स और पाश्‍चात्‍य साहित्‍य का गहरा असर दिखता है। वे अपने हर फिल्‍म का स्‍टोरीबोर्ड बनाकर काम करना पसंद करते थे।

सिनेमा के अलावा उन्‍हें वे खाने के बेहद शौकीन थे। खाली समय में उन्‍हें अध्‍ययन ओर गोल्‍फ खेलना पसंद था। जब उनकी मृत्‍यु हुई तो उनके बेटे ने उनके कफन में गोल्‍फ कोर्स रखा था। वे अक्‍सर अपने स्‍टोरीबोर्ड पैंट करते थे और उनमें ज्‍यादातर रेखांकनों के बजाय कलाकृतियों की तरह लगते हैं।
कुरोसावा अकसर कहते थे, हर आदमी वह पाता है जिसे वह प्‍यार करता है। वे कहते थे, पहले यह तय करो कि आपके लिए सबसे महत्‍त्‍वपूर्ण क्‍या है। अगर आप यह तय कर पाएं कि यही चीज आपकी जिंदगी में सबसे ज्‍यादा महत्‍त्‍वपूर्ण तो फिर अपनी पूरी ऊर्जा के साथ उसे हासिल करने के लिए जुटना चाहिए। जाहिर है, कुरोसावा ने ऐसा ही किया था।
कुरोसावा फिल्‍मों में अपने बड़े भाई की मदद से आए थे। वे मूक फिल्‍मों के नैरेटर थे और कुरोसावा के प्रवेश लगभग उसे दौर का है जब बोलती फिल्‍मों को दौर शुरू हो रहा था। कुछ समय सहायक निर्देशक के रूप में काम करने के बाद उन्‍होंने अपनी पहली फिल्‍म निर्देशित की सुगाता सनशिरो (1943)। उस समय उनकी उम्र बत्‍तीस साल थी। यह फिल्‍म सेंसर में अटक गई। दूसरे विश्‍वयुद्ध के दौरान उन्‍होंने राष्‍ट्रवादी फिल्‍में बनाई। सही मायनों में 1948 में आई ड्रंकन एंजल उनकी पहली फिल्‍म थी जो कुरोसावा की फिल्‍म कही जा सकती है। इसी फिल्‍म में उनके पसंदीदा हीरो तोशिरो मिफुन ने काम किया, जो कई फिल्‍मों में बाद भी उनके साथ रहा। जब भी मैं कुरोसावा की यह फिल्‍म देखता हूं मुझे कहीं ना कहीं राजकुमार हिरानी के मुन्‍नाभाई और डा.अस्‍थाना याद आते हैं। कोई भी शायद इस बात से इत्‍तेफाक नहीं रख सकता और यहां रिलेशनशिप अलग किस्‍म की है लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि एक डॉक्‍टर और मरीज के एक रिश्‍ते की कुरोसावा की वह सबसे मौलिक कल्‍पना थी ओर मुमकिन है राजू हिरानी कुरोसावा के इन चरित्रों से प्रभावित रहे हों। इस फिल्‍म ने कुरोसावा को एक नए व्‍याकरण वाले सिनेमा के निर्देशक के रुप में पहचान दिलाई और उसक अगले साल आई फिलम स्‍ट्रे डॉग में क्रिमिनल माडंड की पड़ताल अदभुत है। अगले ही ही साल उनकी फिल्‍म स्‍केंडल भी आई लेकिन इसी साल रिलीज उनकी दूसरी फिल्‍म राशोमन ने उन्‍हें विश्‍व ख्‍याति दिलाई जहां एक हत्‍या के अलग अलग चश्‍मदीद अपने ढंग से उसकी व्‍याख्‍या करते हैं और उसमें असली हत्‍यारे को तलाशना चुनौती बन गया है। फिल्‍म अपनी कहानी से भी ज्‍यादा मौलिक नैरेशन के लिए चर्चित रही और कुरोसावा की एक नई पहचान के साथ सामने आए।
कुरोसावा का सिनेमा कालातीत है। उनकी कुछेक फिल्‍मों के अलावा मैंने उनकी लगभग फिल्‍में देखी हैं और हर फिल्‍म में वे एक नए भाव बोध के साथ सामने आते हैं।
वे मानवीय भावनाओं और मस्तिष्‍क में चल रहे द्वंद्व के अप्रतिम चितेरे हैं। उनकी फिल्‍में अपनी विधा से आगे एक कलाकृति, एक उच्‍च किस्‍म की साहित्यिक कृति या दस्‍तावेज की तरह सामने आती हैं।

हाई एंड लो (1963) याद करते हुए मैं उन दो पिताओं और एक अपराधी के अंतरसंघर्ष को याद करता हूं जहां निचली बस्‍ती में रहने वाले क्रि‍मिनल ने एक अमीर के बेटे का अपहरण करने के बजाय गलती से उनके नौकर के बेटे का अपहरण कर लिया है। अपराधी अपनी फिरौती की रकम लेने को आमादा है और अमीर व्‍यवसायी इस दुविधा में है कि उसके बेटे के दोस्‍त और नौकर के बेटे को बचाया जाय या नहीं। ना केवल कथ्‍य के स्‍तर पर बल्कि सिनेमाई थ्रिल भी अंत तक कायम रहता है, जो आपको आखिर तक जाते जाते भावुक कर देता है। यह कहानी नहीं बल्कि तत्‍कालीन जापानी समाज एक डॉक्‍यूमेंट्री की तरह प्रतीत होता है। जिस बेहतर ढंग से कुरोसावा समाज के भीतर चल रहे संघर्षों और परिवर्तनों को देख पाते थे, वह उनकी महान सिनेमाई दृष्टि का प्रमाण है।
सेवन समुराई (1954) को सोलहवीं सदी के कालखंड में वे ले गए हैं जहां एक गांव के लोगों को डाकुओं से मुक्ति दिलाने के लिए गांव वाले समुराई लेकर आते हैं। वो जिस तरह से पूरे गांव वालों को डाकुओं के खिलाफ एकजुट करते हैं। करीब साढे तीन घंटे लंबी यह फिल्‍म हर मायने में उतनी ही आधुनिक और प्रामाणिक लगती है, जो निर्विवाद रूप से उन्‍हें महान फिल्‍मकारों की अगली कतार में रखता है। समराई श्रेणी में उनकी फिल्‍म योजिम्‍बो (1961) एक और महत्‍त्‍वपूर्ण और चर्चित फिल्‍म है जिसमें एक अकेला समुराई डाकुओं से भिड़ता है।

असल में कुरोसावा जापानी समाज एक प्रामाणिक चितेरे हैं जो जापान से ज्‍यादा बाहर लोकप्रिय हुए और स्‍थानीय स्‍तर पर उन्‍हें ऐसी आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा कि वे अपनी समाज की कहानियां विदेशों में बेच रहे हैं। अगर हम याद करें तो एक बड़ा तबका हमारे यहां लगभग ऐसी ही सोच सत्‍यजीत राय की फिल्‍मों के प्रति रखता है।
लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि कुरोसावा की कहानियों कालांतर में हॉलीवुड को भी गहरे प्रभावित किया। कुरोसावा की फिल्‍म रान के कई दृश्‍य कालांतर में अमेरिकन एक्‍शन‍ फिल्‍मों में इस्‍तेमाल किए गए। सेवन समुराई से प्रभावित रही मैग्‍नीफिशिएंट सेवन और रिटर्न ऑव मैग्‍नीफिशिएंट सेवन। राशोमन के असर में आउट्रेज बनी। कुरोसावा की हिडन फोर्ट्रेस ने जॉर्ज लुकाज की स्‍टार वार्स की कहानी को आधार दिया। यह कबूलनामा खुद जॉर्ज लुकाज ने बाद में किया भी।
योजिम्‍बो से शेन और हाई मून प्रभावित रहीं। क्लिंट ईस्‍टवुड अभि‍नीत एक फिल्‍म का पूरा चरित्र तोशिरो मिफुन के योजिम्‍बो में दिखाए चरित्र से मेल खाता था और एक बार इस बाबत जब ईस्‍टवुड से पूछा गया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। 1999 में आई फिल्‍म लास्‍ट मैन स्‍टेंडिंग भी कुरोसावा की कहानी से प्रभावित थी।
यानी कुरोसावा कालातीत होने साथ भौगोलिक सीमाओं को भी लांघते हैं और ना केवल अपने समकालीन सिनेमा को बल्कि उसके बाद कई सालों तक वे हालीवुड के मुख्‍यधारा के सिनेमा को प्रभावित करते रहे हैं।

प्रसंग चल ही रहा है तो यह भी उल्‍लेखनीय है कि कुरोसावा की बहुत सी फिल्‍मों में अभिनेता तोशिरो मिफुन मुख्‍य भूमिका में रहे हैं। उनकी सारी भूमिकाएं चर्चित भूमिका कुरोसावा की फिल्‍मों में हैं जिसमें क्‍लासिक फिल्‍में सेवन समुराई, योजिम्‍बो और राशोमन भी हैं। मुफीन पैदा 1920 में चीन में पैदा हुए थे और वे सिर्फ एक साल के लिए जापान आए थे। उसी दौरान संयोग से उनकी मुलाकात कुरोसावा से हुई और ये साथ लंबा चला। राशोमन में तोशिरो के समुराई डाकू की भूमिका को देखकर चीनी निर्देशक झांग यिमु ने उसे बीसवीं सदी के सबसे ताकतवर अभिनय की श्रेणी में माना था। लगभग वैसा ही जैसे मर्लिन ब्रेंडो या जेम्‍स डीन की भूमिकाएं रही हैं।

1971 में सोवियत यूनियन में कुरोसावा ने आत्‍महत्‍या की कोशिश की और बच गए। माना जा रहा है कि 1970 में उनकी पहली कलर फिल्‍म डोडेस का डेन (1970) को समीक्षकों ने बुरी तरह उड़ाया और फिल्‍म चली ही नहीं। कुरोसावा बेहद आहत हुए। दूसरा एक कारण यह भी माना जाता है कि उन्‍होंने यह प्रयास इसलिए भी किया कि जो तीन नए डायरेक्‍टर एक नई फिल्‍म कम्‍पनी के लिए उनके साथ जुड़ थे, उन्‍हें कुरोसावा की वजह से नुकसान हुआ है। गौर करने की बात यह है कि कुरोसावा के जिस भाई ने उन्‍हें फिल्‍मों में जाने में मदद की थी उसने 27 साल की उम्र में आत्‍महत्‍या कर ली थी क्‍योंकि उसकी नौकरी चली गई थी। अपने आत्‍महत्‍या के प्रयास के बाद कुरोसावा पैसे के लिए ज्‍यादातर विदेशी फिल्‍मकारों और निर्माताओं पर निर्भर रहे मसलन स्‍पीलबर्ग, लुकाज, कोपोला आदि। उनकी आखिरी फिल्‍मों की समीक्षकों ने कोई खास तारीफ भी नहीं की।
अपने करियर को देखते हुए कुरोसावा ने 1985 में कहा था, कि मैं पहले कहानियां बुनता हूं और फिर फिल्‍म बनाता हूं। मैं भाग्‍यशाली हूं कि कहानियां जिंदगी से आती हैं और ये लोगों के अपील कर सकती हैं तथा फिल्‍में कामयाब होती हैं।

हालांकि कुरोसावा की बाद की फिल्‍मों की उतनी तारीफ नहीं हुई। समीक्षकों ने यह माना कि वे बहुत इमोशनल हो गई थीं इसके बावजूद वे लगातार मुख्‍यधारा में रहे। उनकी फिल्‍म देरसु द ट्रेपर रुसी भूगोलशास्‍त्री वी के अर्नेव की किताब पर आधारित थी और इस फिल्‍म ने बेस्‍ट फॉरेन लेंगवेज फिल्‍म का ऑस्‍कर जीता लेकिन जापान के लिए नहीं बल्कि सोवियत यूनियन के लिए।
कुरोसावा क्‍योटो के होटल में फिसल गए थे और अपनी रीढ की हड़डी ओर टांग तुड़वा बैठे थे। इसके तीन साल बाद वे 1998 में उनकी मौत हो गई। उस समय भी वे अपनी अगली फिल्‍म द सी वॉज वाचिंग की तैयारी कर रहे थे।
तो कुल मिलाकर कुरोसावा का खुद का जीवन भी एक महागाथा की तरह चलता है और वा इस सदी के नहीं सर्वकालिक महान फिल्‍मकारों की श्रेणी में माने जाएंगे।
उनके साथ काम करने वाले ज्‍यादातर सहायक बाद में स्‍वतंत्र फिल्‍मकार बने और उन्‍होंने ख्‍याति भी अर्जित की लेकिन वैसी ख्‍याति नहीं जो अकीरा कुरोसावा को मिली। उन्‍हीं के सहायकों में एक इशिरो होंडा भी हैं जिनका भी यही साल जन्‍म शती साल है और मुझे याद आता है कि वे गोडजिला सीरिज की पहली फिल्‍म उन्‍होंने ही बनाई थी और मैंने बाद में बनी अठाईस गोडजिला में कुछ देखी हैं। उनमें सबसे बेहतर आज भी इशिरो होंडा की फिल्‍म है। जो जापानी लोक कथा के रूपक को आधार बनाते हुए परमाणु विकिरण तक पहुंचते हैं। यह उनकी बेहतरीन कृतियों में से एक है। जन्‍म शती वर्ष पर दोनों ही फिल्‍मकारों को विनम्र श्रद्धांजलि।   -रामकुमार सिंह

(this article is published in literary magazine from JAIPUR named KURJAAN.. edited by premchand gandhi)

शुक्रवार, जून 03, 2011

रेडी: मनोरंजन की सलमान रेसिपी

film READY review


नो एंट्री की कामयाबी के बाद अनीस बज्मी कॉमेडी की एक सी रस्सी पर ही चलते रहे हैं, बस उनके हाथ का बांस बदल जाता है। इस बार फिर उनके पास सलमान खान हैं। एक लाइन में कहें तो रेडी सलमान खान और अनीस बज्मी टाइप मनोरंजक फिल्म है लेकिन ना तो यह दबंग है और ना ही नो एंट्री।

रेडी तेलुगू की इसी नाम से बनी फिल्म का रीमेक है और हिंदी में इसकी कहानी, गीत, संगीत और अभिनय से अलग एक ही ताकत है, सलमान खान। इस फिल्म में भी उनका नाम प्रेम है। सरनेम कपूर है और और लघु माफियानुमा जोकर चौधरियों की भांजी संजना (आसिन) से उसको प्यार हो जाता है। कहानी का रायता फैलता है और उसे समेटकर बज्मी वापस बर्तन में डालते हैं। रेडी हंसाती है, टाइमपास करती है और एक स्तर पर पहुंचने के बाद थोड़ी लंबी और उपदेशात्मक हो जाती है, जो कि अनीस बज्मी की ज्यादातर फिल्मों के साथ होता है। इंटरवल से पहले यह शिकायत ज्यादा है। इंटरवल बाद भी फिल्म को काटपीटकर दस मिनट और छोटा किए जाने की गुुंजाइश थी।

यहां प्रियदर्शन और अनीस बज्मी टाइप मिश्रित स्पर्श फिल्म में साफ दिखता है और सलमान का स्पर्श उसे कामयाबी की गारंटी देता है। फिल्म का गाना डिंका चिका सबसे ज्यादा असर छोड़ता है। खासकर जिस तरह उसे फिल्माया गया है और उसकी कोरियोग्राफी जिसमें सलमान खान पैंट की जेब में हाथ डालकर हिलाते हैं। रेडी की अच्छी बात यह भी है कि एक आध जगह द्विअर्थी संवादों को छोड़कर यह पारिवारिक फिल्म भी लगती है। सलमान आसिन और परेश रावल को छोड़कर फिल्म के लगभग सभी पात्र लाउड हैं।

लेकिन भारतीय दर्शक को इससे भी अपच नहीं होती। बहरहाल एक्शन कॉमेडी के घालमेल और दृश्य रचने में निर्देशकीय निरंकुशता के बावजूद टाइमपास के लिए आप रेडी देख सकते हैं। क्योंकि थियेटर से बाहर आते समय आपके चेहरे पर मुस्कराहट रहती है।

शनिवार, मई 21, 2011

लंबी और कमजोर रोमांटिक कॉमेडी


FILM REVIEW- PYAAR  KA PUNCHNAAMA

निर्माता अभिषेक पाठक और निर्देशक लव रंजन की फिल्म प्यार का पंचनामा में सारे अभिनेता नए ही हैं। निर्देशक भी नए हैं लेकिन दुर्भाग्य से दर्शक नए नहीं है। वे फिल्में देखते रहते हैं। प्यार का पंचनामा रोमांटिक कॉमेडी है और तीन दोस्तों के लड़कियों से मिलने ओर बिछुड़ने की कहानी है। कैनवस फरहान अख्तर की दिल चाहता है से मिलता है लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं मिलता।

तीनों दोस्त साथ रहते हैं और एक दिन अचानक तीनों की जिंदगी में तीन तरह की लड़कियां आती हैं और "कुत्तागिरी" शुरू होती है। तीनों लड़कियों में ऎसी कोई खास बात नहीं है कि जिसके लिए उनके पीछे इस तरह से पड़ा जाए। तीनों नायक भी नए हैं और वे अपना काम ठीक ठाक कर गए हैं। लेकिन कहानी में लड़कियों को लेकर अनीस बज्मीवादी टिप्पणियां बहुत ज्यादा हैं जो लड़कियों को हीन दिखाने की पुरूषोचित सोच का वमन है। जहां एक पात्र विक्रांत कहता है कि कोई कितनी भी समानता और एक दूसरे को स्पेस देने की बात करे वो तब तक ही ठीक लगती है जब तक लड़की आपको मिली नहीं हो या पहली बार कंधे पर सिर रखकर रो रही हो। उसके बाद साथ रहते हुए आप एक दूसरे को स्पेस देने की कल्पना भी नहीं कर सकते।

हां, इंटरवल से पहले तक कुछ कॉमिक संवाद और दृश्य अच्छे लगे हैं लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म ऊबाऊ और लंबी होती चली जाती है। लिव इन से लेकर दूसरे बॉय फे्रंड को बर्दाश्त करने और प्यार में बलिदान और तौहीन सहने जैसी कई सिचुएशन फिल्म में हैं लेकिन वे ताजा नहीं लगती और इसलिए प्यार का पंचनामा एक अच्छे विचार और कथासूत्र के बावजूद बहुत बेकार लगती है।

खासकर फिल्म की अवधि बेहतर संपादन के बाद यदि बीस से पच्चीस मिनट और कम कर दी जाती और महिलाओं और युवा लड़कियों के प्रति लेखक निर्देशक कुछ स्पष्ट और उदार नजरिए से सोचते तो शायद बात अलग होती। फिलहाल फिल्म में इतनी सी गुुंजाइश है जवान होने की दहलीज पर खड़े दर्शक टाइमपास के लिए इसे देख सकते हैं। लगातार पार्श्व में चलता गाना बंध गया पट्टा, देखो बन गया कुत्ता यह सोच बताने को काफी है कि आदमी कुत्ता होता है और औरत उसकी जिंदगी में आते ही उसे एक पट्टा डालती है, और उसे उम्र भर उसके कहे अनुसार ही चलना होता है, लिहाजा जितना उनसे बच सकें आप बचें। सुनने में यह बाद कबीर वाणी के "माया महाठगिनी हम जानी" जैसी है लेकिन अफसोस कि पर्दे पर यह फिल्म प्रभावित नहीं करती। गाने ठीक ठाक हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

गोवा के ड्रग माफिया पर कामचलाऊ थ्रिलर

Film Review- DUM MAARO DUM


निर्देशक रोहन सिप्पी की फिल्म दम मारो दम इस हफ्ते रिलीज हुई है। गोवा में ड्रग माफिया की सफाई के लिए नियुक्त किए किए एसीपी विष्णु कामथ यानी अभिषेक बच्चन और माफिया माइकल बारबोसा की तलाश की कहानी है, जिसके शिकार कई मासूम लोग हुए हैं। लोरी (प्रतीक) इनमें एक है, जो अमेरिका पढ़ने जाना चाहता है लेकिन इनके चंगुल में फंसता है।

इसके समांतर जोई (बिपाशा बसु) भी है जिसे एअर होस्टेस बनने की चाह है और वह भी ड्रग माफिया की शिकार हो गई है। तीसरा संगीतकार जैकी (राना डागुटी) है, जो जोई का बॉय फे्रंड है। ये सब लोग कहीं ना बारबोसा से पीडित है और बारबोसा का सूत्रधार बिस्किट (आदित्य पंचोली) है। फिल्म असली बारबोसा को तलाशने की एक यात्रा है। कहानी प्रतीक के अमेरिका जाने के लालच में ड्रग माफिया के चंगुल में फंसने से होती है और अंत 920 करोड़ के ड्रग्स को आग लगाने से। इस बीच थ्रिलर की तरह फिल्म चलती है लेकिन इंटरवल तक ही पटकथा की पोल खुलने लगती है और इंटरवल के बाद तो वह अति साधारणीकरण का शिकार हो जाती है।

ऎसी इंस्पेक्टर वाली कहानियां बनाना जो अन्याय के खिलाफ लड़ें, हमारे फिल्मकारों का प्रिय शगल रहा है। लिहाजा इसमें कोई नयापन है तो सिर्फ यह कि कैमरा गोवा को दिखा रहा है। असल में फिल्म से स्पार्क गायब है। यूं लगता है जैसे गोवा ऎसा ही है जैसा दिखता है। यह एक बनावटी कहानी है, जहां से गोवा की असली जिंदगी और असली ड्रग समस्याएं गायब सी लगती है। यानी कहानी कहीं अति साधारण है और कहीं हद से ज्यादा काल्पनिक। समस्या चरित्रों के साथ भी है कि चारों चरित्रों में से किसी एक के साथ दर्शक को सहानुभूति रखने में जोर आता है। मसलन लौरी और जोई पैसे और महत्वाकांक्षा के चलते ड्रग वालों की मदद करते हैं, ऎसा क्यो? एसीपी विष्णु कामथ एक नंबर का भ्रष्ट अफसर रहा लेकिन दुर्घटना में पत्नी और बेटी के मरने के बाद घोर ईमानदार। ऎसा क्यों? जोई का बॉय फे्रंड ही उसे ड्रग्स के धंधे में धेकलता है और वही अब मसीहा बनके आ रहा है? ऎसा क्यों? जोई पूरी फिल्म में बिस्किट की रखैल है और अचानक पवित्र हो जाती है।

यानी दर्शक किसी एक चरित्र के साथ अपनी सहानुभूति जोड़ नहीं पाता है। पटकथा की यह खामी भारी पड़ती है फिल्म पर। उसमें कुछेक दृश्यों को छोड़कर कहीं कुछ जादुई नहीं लगता। अभिषेक ने ठीक ठाक अभिनय किया है। प्रतीक ठीक है। बिपाशा सजावटी गुडिया है, विद्या बालन की सिर्फ हाजिरी सी है। राना भाव विहीन चेहरा लिए हैं। आयटम सॉन्ग दम मारो दम में दीपिका पादुकोण हैं और ठीक लगी हैं। अभिषेक ने गाना अच्छा गाया है। जयदीप साहनी ने गाने ठीक ठाक लिखे हैं। कुल मिलाकर दम मारो दम में नया और जादुई कुछ नहीं लगता। बस टाइमपास के लिए आप जा सकते हैं।

शनिवार, अप्रैल 16, 2011

हिंदी मीडिया, भाषा और कथ्‍य के सवाल


बावजूद इसके कि परंपरागत हिंदी वालों की तरह मुझे अंग्रेजी से उस तरह की
कोई दुश्‍मनी नहीं है कि मैं उसे खदेड़ने का झंडा लेकर खड़ा हो जाऊं।
लेकिन वही अंग्रजी जब आम पाठक तक हिंदी के अखबार से पहुंचती है तो
तकलीफदेह है। हमारे समय की सबसे कड़वी सच्‍चाई यह है कि हमारे पूरे
मीडिया पर विज्ञापन, बाजार और उसके दबाव काम कर रहे हैं लेकिन मुझे यह
एजंडा कतई समझ नहीं आता कि हिंदी के अखबार में शाब्दिक ढंग से तो
अंग्रेजी घुस ही रही थी, अब उसकी लिपि भी घुस रही है। दुर्भाग्‍य की बात
यह है कि भाषा को इस समय रीजनल मीडिया में गंभीरता से लिया ही नहीं जा
रहा। आप देख सकते हैं कि एक ही अखबार एक ही शब्‍द को कई तरह से छापता है।

जैसे हिंदी नवभारत टाइम्‍स ने अपना मास्‍ट हैड रोमन में कर दिया था, ऐसा
करने मात्र से क्‍या युवा पीढी जिसके बारे में हमने मान लिया है कि वे
अंग्रेजी ही पढेंगे और यह सब उनके लिए किया जा रहा है। ऐसा क्‍यों हो रहा
है कि हिंदी के अखबारों की प्रसार संख्‍या लगातार बढ रही है। आई
नैक्‍स्‍ट और कॉम्‍पेक्‍ट का प्रयोग देख ही रहे हैं। दूसरे अखबारों में
बॉम्‍बे टाइम्‍स की नकल पर शुरू हुए नगरीय लाइफ स्‍टाइल परिशिष्‍टों की
भी यही हालत है। यह कितना कुतर्क है कि लिपि या शब्‍द अंग्रेजीदां या
हिंगलिश कर देने से युवा पीढी किसी अखबार से जुड़ सकती है। जबकि सच्‍चाई
यह है कि कथ्‍य और विषय वस्‍तु के लिहाज से गुणवत्‍ता का भीषण पतन हुआ
है।

असल में महानगरों में पत्रकारिता के केंद्र बने हुए हैं। हिंदी अखबारों
के केंद्र में आप दिल्‍ली को भले ही मानते रहें लेकिन सच्‍चाई यह है कि
हिंदी पत्रकारिता की बड़ी दुनिया दिल्‍ली से बाहर है। दिल्‍ली मुंबई जैसे
कॉस्‍मोपॉलिटन्‍स से इतर यह दुनिया पटना, भोपाल, जयपुर, लखनऊ और कानपुर
जैसे शहरों में बडी है। इनके सबसे बडे़ पाठक जो पढ रहे हैं वे महानगरों
से दूर देहातों और कस्‍बों के पाठक भी हैं और आश्‍चर्यजनक रूप से हमारे
मौजूदा हिंदी अखबार इस बात के अपराधी हैं कि वे पूरे हिंदी समाज की भाषा
को एक महानगरीय अहम के साथ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। आप मुझे क्‍या
समझा सकते हैं कि रविवार विशेष के स्‍थान पर SUNDAY SPECIAL लिख देने से
किसी भी हिंदी अखबार के पाठक बढते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि दूर दराज के
कस्‍बों और देहातों के बारे में हमारे पत्रकार और‍ डिजायनर समझते ही नहीं
है। मैंने तर्क किए हैं ऐसे मौकों पर कि भाई ऐसा क्‍यों लिख रहे हो, तो
तर्क आता है कि यह ‘मॉडर्न ले आउट’ है, मैं उससे कहता हूं तुम्‍हारी औकात
कंप्‍यूटर के की बोर्ड पर लिखे अक्षरों से ज्‍यादा  अंग्रेजी जानने की
नहीं है फिर तुम उन सब लोगों की भाषा क्‍यों खराब कर रहे हो, जो इतनी भी
नहीं जानते। तो अगला कुतर्क है कि नहीं जानते तो वे जानेंगे। क्‍यों
जानेंगे कि क्‍या आपने किसी समाज को वो भाषा पढाने का ठेका लिया है, जिसे
आप खुद नहीं जानते। हमारे बहुसंख्‍यक हिंदी पत्रकारों की हालत अंग्रेजी
के मामले में ऐसी ही हो गई है। या ऐसा मान लीजिए कि उन पर दबाव हैं
प्रबंधन के की भाषा बदलो। मुझे हमेशा लगता है कि आपको अंग्रेजी से इतना
ही मोह है तो अंग्रेजी अखबार नि‍कालिए। कम से कम भाषायी उदारीकरण के आधार
पर बहुसंख्‍यक समाज के गद्य को क्‍यों खराब कर रहे हैं? खासकर तब जब उस
तरह की भाषा कर देने से अखबार के पाठक नहीं बढते हैं। यह कितना बड़ा
कुप्रचार अखबार के वितरण और विपणन विभाग वाले एमबीए ब्रांड लोग करते हैं
कि ऐसा करने से चीजें बदल जाएंगी। दुर्भाग्‍य से कुछेक जगह छोड़कर हिंदी
की भाषायी पत्रकारिता में विषय वस्‍तु को लेकर चिंता ही नहीं है। अखबारों
के फीचर विभाग और विशेष आलेखों के विभाग इंटरनेट पर इतने आधारित है कि
अंग्रेजी के पिष्‍टपेषण में लगे हुए हैं। मौलिक चिंतन, फीचर और आलेखों का
नितांत अभाव है और भाषायी लिहाज से हमें एक खतरनाक भ‍विष्‍य की ओर ले
जाया जा रहा है।

एक मिनट के लिए मान लीजिए कि इससे भी समाज की भाषा खराब नहीं होती तो
मुझे उससे भी बड़ी सहानुभूति उन हिंदी के पत्रकारों के साथ है, जो इस दौर
में पत्रकारिता में आ रहे हैं। उन पर हिंगलिश लिखने का दबाव है। वे सबसे
दुर्भाग्‍शाली युवा हैं, वे पांच दस साल की कलमघिसाई के बाद ना तो अच्‍छी
हिंदी लिखने के काबिल हैं और ना ही अच्‍छी अंग्रेजी के। एक खिचड़ी पीढी
के पत्रकार इस समय पैदा हो रहे हैं और पंद्रह साल बाद जब ये लोग अलग अलग
संस्‍करणों के संपादक होंगे और अपने समाज को जो भाषा पढाएंगे उसकी
कल्‍पना मात्र से मैं कांपता हूं।
हिंदी को लेकर ये सब लोग उतने ही अपराधी हैं जिन्‍होंने हिंदी को जटिल
करने और संस्‍कृतनिष्‍ठ करने की कोशिश की। दोनों की हालत में नुकसान इसी
भाषा का है। और यह तर्क भी मत सुनिए भूलिए कि कोई समाज अखबार से अपनी
भाषा नहीं सीखता। आप कैसे मान सकते हैं कि जिस हिंदी में पढ़ने के नाम पर
सबसे ज्‍यादा हिंदी अखबार ही पढे जाते हैं तो वे किसी साक्षर समाज की
भाषा का निर्माण करने के सबसे जिम्‍मेदार माध्‍यम हैं।

एक और बात जो मुझे हमेशा परेशान करती है कि कहने को आम आदमी का दावा हम
लोग करते हैं लेकिन मैं दावे से कह सकता हूं कि हमारे बहुसंख्‍यक भाषायी
मीडिया के पास उस आम आदमी के हक का एजंडा तेजी से गायब होता जा रहा है।
यह बात मैं अधिकारपूर्वक कह सकता हूं। हिंदी के ज्‍यादातर अखबारों के
नगरीय और डाक संस्‍करण के फर्क को देख लीजिए। हमारे पत्रकार ना जाने किस
फूंक में रहते हैं। महानगर में रहने वालों के लिए कस्‍बा और गांव तो खबर
ही नहीं है। यह कितनी बड़ी विडम्‍बना हमारे समय की है कि अखबारों के
स्‍थानीय संस्‍करण तेजी से बढे हैं ताकि वे स्‍थानीय खबरों को अहमियत दे
सकें लेकिन अफसोसजनक ढंग से उनकी विषय वस्‍तु उतनी ही घटिया और गैर जरूरी
हो गई है। वहां आधे से ज्‍यादा पेज इस बात से भरे रहते हैं कि किस मंदिर
में क्‍या सत्‍संग चल रहा है। कौनसे चौराहे पर जुआ खेलते लोग पकड़े गए
हैं और किस घर में क्रिकेट का सट़टा चल रहा था। अस्‍सी फीसदी स्‍थानीय
समाचार रद़दी में फेंकने लायक होते हैं लेकिन वे प्रमुखता से छपते हैं।
तो यह अपराध भी हिंदी पत्रकारिता के माध्‍यम से हो रहा है कि जिस तरह
राजनीति, समाज और अपराध या विकास को लेकिन एक समाज संवेदनशील होने की
प्रक्रिया से गुजरता है, वह खंडित हो गई है। स्‍थानीय प्रशासन को फर्क ही
नहीं पड़ता है उनको पता है कि इस अखबार को इलाके का एमएलए भी नहीं पढ रहा
क्‍योंकि इस समय विधानसभा चल रही है और वह राजधानी में है। तेजी से
गांवों को पत्रकारिता से बेदखल किया जा रहा है, जहां इस देश की
बहुसंख्‍यक आबादी रहती है।
तो इस बात का यह अर्थ ना लगाएं आप कि जो स्‍थानीय स्‍तर पर पत्रकार काम
कर रहे हैं, वह गैर जरूरी है। असल में उनको प्रशिक्षित करने का कोई एजंडा
नहीं है कि उन्‍हें किस तरह से घटनाओं के प्रति संवेदनशील बनाया जाए। यही
वजह है कि हमारे भाषायी अखबारों की भारी भरकम प्रसार संख्‍या के बावजूद
पिछले कितने सालों में ऐसी कोई खबर उभरकर नहीं आई जो सत्‍ता या भ्रष्‍ट
तंत्र को हिलाए।

बाजार और‍ विज्ञापन की अघोषित सी साजिश चलती दिखती है। नरेगा मजदूरों के
मिलने वाली मजदूरी के घोटालों की खबर पर संपादकों की संवेदनाएं मरी हुई
हैं। वे कहते हैं, यह क्‍या हरदम गरीबी का रोना रोते रहते हैं। क्‍योंकि
वह मजदूर हमारा उपभोक्‍ता नहीं है। बिना नाम लिए मैं उल्‍लेख करूंगा कि
एक अखबार ने लावारिस लाशों के फोटो छापने बंद कर दिए कि इससे क्‍या फर्क
पड़ता है। संपादकीय बैठकों में यह कहा जाता है कि चूंकि गरीब आदमी तो
हमारा उपभोक्‍ता है, नहीं लिहाजा उसकी खबर क्‍यों छापी जाए। तो साब, नारा
लगाना बहुत आसान है और जब सामने पुलिस हो तो भी नारा लगाया जा सकता है,
लेकिन जब यह पता चले कि गोली चल सकती है तो पीछे हट जाने से आप
स्‍वतंत्रता सेनानी नहीं बनते। प्रॉब्‍लम हमारी यही है कि हमारे बीच से
तेजी से संवेदनशील पत्रकारों की नई जमात गायब हो रही है। वे चाटुकार
अच्‍छे हैं, वे कपड़े ब्रांडेड पहनते हैं, वे तेजी से नौकरियां बदलते हैं
क्‍योंकि इससे उनका वेतन बढता है। तो पत्रकार होने और किसी बैंक में
मैनेजर होने जैसी नौकरियां एक सी हो गई हैं। वे इस बाजार के हाथों में
खेल रहे श्रमिक हो गए हैं। दोष पत्रकारों का नहीं, प्रबंधन भी तो ऐसा ही
चाहते हैं। यह मान लिया गया है कि आपकी सबसे बड़ी योग्‍यता युवा होना ही
रह गया है। ये ऐसे युवा हैं जो गली कूचों में खुली पत्रकारिता के नाम पर
धंधा करने वाली कॉलेजों से निकलकर आए हैं और उन्‍हें लगता है कि दुनिया
को वे ही लोग चला रहे हैं। मुझे तो समझ में नहीं आता कि पत्रकारिता की
पढाई का औचित्‍य क्‍या है। आप पत्रकारिता क्‍या है, उसका इतिहास क्‍या
है, खबरें कैसे लिखी जाती हैं इस तरह की व्‍याकरण वाली बातें तो पढा सकते
हैं लेकिन एक अच्‍छा पत्रकार कैसा होता है इसका फार्मूला कोई नहीं होता।
आप किसी स्‍कूल में पढाकर गणेश शंकर विद्यार्थी, राजेंद्र माथुर या
प्रभाष जोशी पैदा नहीं कर सकते। दुर्भाग्‍य से पत्रकारिता में यह मान
लिया गया है कि जिसका वेतन ज्‍यादा है, वही बड़ा और वरिष्‍ठ पत्रकार है,
जबकि आप जानते हैं आठ महीने में तीन नौकरियां बदलने से भी वेतन बढ सकता
है। चालीस पैंतालीस साल के पार हो गए हैं तो आप किसी काम के लायक नहीं है
और आपकी नौकरी पर खतरा है, यदि आप उन सब हथकंडों को नहीं जानते जो
मैनेजमेंट स्‍कूल में पढाए जाते हैं कि बॉस गुस्‍से में हो तो कैसे
व्‍यवहार करें और बॉस की कार पंक्‍चर हो गई हो तो आप कैसे अपने नंबर
बढाएं। कभी कभी बहुत ही बुरा लगता है कि किस तरह से मीडिया पत्रकारों से
खिसककर मैनेजरों के हाथ में जा रहा है लेकिन याद रखिए मैनेजर कभी आम
लोगों की नहीं सोचता, वह अपना और अपनी कंपनी का मुनाफा देखता है। हाशिए
के लोग हमारे समय के सबसे दुर्भाग्‍यशाली लोग हैं, जिनको हमने
नक्‍सलवादी, चोर उचक्‍के, फुटपाथी या भिखारी कहकर अपराधी ही मान लिया है
जैसे इस देश की छवि उनके होने से ही खराब है, बाकी अंबानी, टाटा,
मित्‍तल, तेंदुलकर, अमिताभ बच्‍चन, शाहरुख खान आदि ने तो कोई कसर नहीं
छोडी है कि दुनिया में भारत का डंका बुलंद हो। मैंने पिछले डेढ दशक में
पत्रकारिता करते हुए यह भोगा है कि आम आदमी की जो जगह अखबार में थी, उसे
अमिताभ बच्‍चन, शाहरुख खान, अंबानी बंधु, टाटा, राडिया, मित्‍तल आदि लोग
घेरकर बैठे हैं, जैसे महानगरों और शहरों में फैलते माफियाओं ने किसानों
को अपनी जमीन से बेदखल कर दिया। और कोई क्रांतिकारी उम्‍मीद बची नहीं है।
ये लोग और घातक तरीके से हमलावर होंगे। आम लोगों को बेदखल करने के लिए।
अफसोस यही है कि हम पत्रकार भी अब हथियार डाल चुके हैं, क्‍योंकि हमें डर
है कि आम लोगों को अखबार में घुसाने से हमारे खुद के बेदखल होने का खतरा
है। क्‍योंकि बाजार सिर्फ अपने उपभोक्‍ता की परवाह करता है, और वह परवाह
ऐसी है जैसे कसाई अपने बकरे को पालता पोषता है। ममता से नहीं, बल्कि उसकी
गर्दन काटकर मांस खाने के लिए। मैं एक डरी हुई पीढ़ी का पत्रकार हूं। मैं
अपनी गर्दन बचाकर चलता हूं हालांकि मुझे पता है कि उस्‍तरे धार किए जा
रहे हैं और यह गर्दन कटनी है, फिर भी मैं अपने समय का अपराधी हूं कि मैं
अपनी आंखों से हाशिए के लोगों को बेदखल होते देख रहा हूं।
हिंदी मीडिया का यह एक खराब दौर है। दुआ करता हूं यह इससे जल्‍दी बाहर
निकले। हां, यह पैसा कमाने का दौर तो है लेकिन जब पूरे देश में भ्रष्‍ट
तंत्र घर कर गया है। ऐस समय में जब पटवारी से लेकर मंत्री तक पैसा खा रहे
हैं तो जहां हाथ रखो वहीं से खबर मिलती है लेकिन कितनी खबरें छप रही हैं,
आप और हम सब देख रहे हैं। दुर्भाग्‍य देखिए हिमालय की कंदराओं से योग
सिखाने का भेस पहनकर आया एक बाबा शक्ति का केंद्र बन रहा है और वह देश पर
राज करने के सपने देख रहा है। अगले चुनाव तक कोई एक राजनीतिक पार्टी उस
बाबा का मुखौटा जरूर पहनेगी। और यह विषयांतर कतई नहीं है क्‍योंकि इसमें
मीडिया भी उतना ही बड़ा अपराधी है।

वै‍कल्पिक मीडिया खड़ा हो रहा है। सोशल नेटवर्क साइट़स की वजह से, या
ब्‍लॉग की दुनिया में। वहां मुझे बहुत उम्‍मीदें दिख रही हैं। हमारे समय
में हम गवाह रहे हैं कि कुछ क्रांतियां खड़ी हुई हैं। मठाधीश बौखलाए हैं
लेकिन मुझे डर है यहां भी पहरे लगेंगे देर सबेर। इसलिए नए रास्‍तों की
तलाश जारी रहनी चाहिए। लेकिन इससे बड़ी मेरी अपेक्षा यह है कि हमारा
मुख्‍य धारा का मीडिया अपनी भटकन छोड़कर अपने जमीर से पूछे। क्‍या उन
पत्रकार मित्रों को शर्म भी नहीं आती जो पच्‍चीस साल पहले एक पवित्र मिशन
के साथ उतरे थे और आज सिर्फ अपनी टीआरपी महत्‍वाकांक्षाओं के लिए अपने
चैनलों पर यह दिखा रहे हैं कि किस घर में डायन आती है और कहां सांप ने एक
पूरे गांव को बचा रखा है और कैसे एक कापालिक की हवस आज भी उसे भूत बनाकर
अतृप्‍त डोला रही है। जिस देश में आधी जनता भूखी सोती है, जिस देश में
संसाधनों पर दस फीसद आबादी का कब्‍जा है, वहां ऐसी पत्रकारिता के लिए
जनता की अदालत में आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए। या इन सब चैनलों को
एंटरटेनमेंट चैनल कर देना चाहिए। लेकिन सरकारें ऐसा नहीं करेंगी क्‍योंकि
वे खुद नहीं चाहती कि कोई ये सब कार्यक्रम बंद करके उनकी तरफ झांके।

(PUBLISHED IN KATHADESH MEDIA ISSUE IN APRIL 2011)

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

बर्फीले बंगले में पिघलते रिश्ते

निर्माता राकेश ओमप्रकाश मेहरा और निर्देशक मृगदीप सिंह लांबा की फिल्म "तीन थे भाई" तीन ऎसे भाईयों की कहानी है, जो हमेशा एक दूसरे से नफरत करते हैं और अलग अलग रहते हैं। एक डिक्सी (ओम पुरी) की दुकान है शहर में। दूसरा हैप्पी (दीपक डोबरियाल) डेंटिस्ट है और तीसरा फैंसी (श्रेयस तलपड़े) एक्टर बनना चाहता है। इनके मरहूम दादाजी (योगराज सिंह) ने इनके नाम पहाड़ पर एक बंगले और जमीन की करोड़ों की वसीयत लिखी है लेकिन शर्त यह है कि वे तीन साल तक उस घर में बिना लड़े रहेंगे। फिल्म इसी मोड़ पर शुरू होती है जब चारों तरफ बर्फीला सा तूफान है और तीनों भाई उस बंगले पर पहुंचते हैं। लेकिन उनका लड़ाई झगड़ा खत्म नहीं होता। सबसे छोटा फैंसी एक कुत्ते को भी अपने साथ रखता है और उन्हीं के पास दादाजी की अस्थियां भी हैं जो तीन साल बाद ही प्रॉपर्टी मिलने के बाद ही प्रवाहित की जानी हैं।

कहानी में ये तीनों पात्र एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। कालांतर में पहाड़ पर ही भटकते हुए कुछ अंग्रेज लड़कियां इन्हें मिलती हैं और इनके लिए एक नई मुसीबत खड़ी करती हैं। इस मुसीबत से निपटते ही दूसरी आती है और नाटकीय घटनाक्रम में फिल्म अंत तक पहुंचती है।

फिल्म की सबसे ताकतवर चीज गुलजार के गीत हैं और सबसे बड़ी कमजोरी इसका संपादन। कई दृश्य अनावश्यक लंबे हैं। दूसरी, कमजोरी पटकथा की बाधित करने वाली गति है। कहानी की गति अविश्वसनीय ढंग से आगे बढती है और कुछ गैर जरूरी से दृश्य संपादक ने फिल्म में क्यों रहने दिए समझ नहीं आता संवाद साधारण है और जादुई नहीं लगते। इंटरवल तो फिल्म खिंचती हुई सी चलती है लेकिन इंटरवल के बाद थोड़ी गति पकड़ती है। फिल्म की खूबसूरत लोकेशन्स और बर्फानी वादियां इसकी ताकत है कि आपको थियेटर आपको बर्फानी अहसास होता है। ओमपुरी ने ठीक अभिनय किया है लेकिन उम्र और वजन ने उन्हें शिथिल किया है। तनु वेड्स मनु के बाद दीपक डोबरियाल लगातार सहज और आकर्षक लगे हैं। श्रेयस ने काम चलाऊ काम किया हैं। क्रिकेटर युवराज के पिता योगराज सिंह दादाजी के रोल में इस फिल्म से डेब्यू कर रहे हैं और कहीं कहीं लाउड हैं। यूं तो पूरी फिल्म के पात्र ही जरूरत से ज्यादा लाउड लगते हैं। यदि आप परंपरागत कॉमेडी फिल्मों से ऊबे हुए हैं तो "तीन थे भाई" एक टाइमपास फिल्म है। सिर्फ सब्जेक्ट अलग होने मात्र से वह बहुत ज्यादा जादू पैदा नहीं करती है। संगीत औसत है।

शनिवार, अप्रैल 09, 2011

बेवफा पतियों की टाइमपास कॉमेडी

film review-- THANK YOU

‘थैंक यू’ इस हफ्ते रिलीज अनीस बज्मी निर्देशित और अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म है जो शायद दोनों के लिए लगातार विफलताओं के बीच एक आखिरी चिराग की तरह हिल डुल रही है। आइपीएल की हवा है। दीये में तेल कमजोर है। चिरागों से लौ जा रही है।
‘थैंक यू’ का कथासूत्र अनीस की पुरानी फिल्म ‘नो एंट्री’ का दोहराव है जहां तीन लंपट पति हैं और जिन्हें अपनी पत्नियों से इतर दूसरी लड़कियों के साथ इश्क लड़ाने में आनंद आता है। घर में एक प्यार का ढोंग करता है, एक अतिरिक्त डरने का और तीसरा सामंती किस्म का है जो रात को तीन बजे भी चाय पीने के लिए पत्नी को ही कष्ट देता है। चौथा आदमी जासूस है, जिसकी भूमिका अक्षय कुमार ने की है और वह इन तीनों ही जोड़ों में एक दूसरे के लिए जासूसी करता है। तीनों पत्नियों के लिए यह आदमी उनके मर्दों की जासूसी करता है और तीनों पति उस जासूस को ढूंढऩे उसी आदमी से मदद मांगने पहुंचते हैं जो पहले से ही इनकी जासूसी में लिप्त है। एक गुत्थी सुलझती है और दूसरी उलझती है और अंतत: एक प्रवचननुमा अंत में फिल्म लंपट पतियों के लिए प्रेरक कथा की तरह लगती है कि किस तरह दुनियाभर की सारी पत्नियां आपके लिए त्याग करती हैं और पति किस तरह बाहर की तरफ मुंह मारते हैं।
कहानी में ‘नो एंट्री’ जैसी ताजगी नहीं और संवादों में वैसा विट भी नहीं है। बहुत जगह निर्देशकीय स्वच्छंदता दर्शक पर भारी पड़ती है, जैसा कि अनीस अपनी हर फिल्म में करते हैं लेकिन  हास्य की एक ही हांडी में बार बार कामयाबी नहीं उबाली जा सकती। अक्षय कुमार के लिए भी फिल्म कुछ खास नहीं कर पा रही है। बॉबी देओल, सुनील शेट्टी, ठीक हैं। सोनम कपूर बनावटी ज्यादा लगी हैं, रिमी सेन साधारण हैं और सलीना जैटली फिल्म के बहुत कम हिस्से में हैं। पूरी फिल्म में सबसे आकर्षण का केंद्र इरफान हैं, जो सिर्फ अपने संवाद बोलने के ढंग से ही एक साधारण संवाद में भी एक मुस्कान पैदा कर देते हैं। खूबसूरत लोकेशन्स की भी तारीफ हो सकती है लेकिन बिकिनीधारी विदेशी बालाओं की फिल्म में अतिरिक्त उपस्थिति बॉक्स आफिस की कामयाबी की गारंटी नहीं होती। गीत संगीत साधारण हैं और मल्लिका आयटम सॉन्ग में भी औसत लगी है। एक लाइन में, यह फिल्म अनीस और उससे भी ज्यादा अक्षय कुमार के लिए अग्नि परीक्षा है।