शुक्रवार, मई 28, 2010

रॉयल्‍टी के बहाने

मैं नहीं जानता था कि फेसबुक पर एक योजना के बारे में मेरा एक संदेह और लेखक के हित में सोचने की बात पर एक बहस इतना जोर पकड लेगी। मुझे लगा कि एक जवाब आएगा कि ये किताबें बिना पैसा लिए छापी गई हैं। जाहिर है भाई, माया ने यह खर्च वहन किया होगा या उनके सलाहकार और संपादन मंडल में शामिल लेखक मित्रों ने।
लेकिन बात निकली और दूर तक जा रही है। अभी तक थमी नहीं है। मैं इसीलिए यह लेख लिखने का प्रेरित हुआ हूं।
योजना को लेकर सब तारीफ कर रहे हैं तो क्‍या मैं इतना बेवकूफ हूं जो इस बात की तारीफ नहीं करुंगा कि पाठक को सस्‍ती दर पर उम्‍दा साहित्‍य उपलब्‍ध कराया जा रहा है। लेकिन सवाल अब भी वहीं खडा है कि यदि माया इसकी कीमत चुका रहे हैं तो गलत है। लिखने वाला लेखक चुका रहा है तो भी गलत है। लेखक की जितनी गरज पढने की है उतनी ही गरज जब तक पाठक की पढने की नहीं होगी तो लिखने लिखाने के उपक्रम का अर्थ ही क्‍या है। मेरे गांव में कहावत है कि ‘ रोयां बिना तो मां भी बोबो कोनी दे’ अर्थात बच्‍चा जब रोए नहीं तब तक मां भी उसे दूध नहीं पिलाती। जिन बच्‍चों के पीछे आजकल की माताएं दूध की बोतल, कटोरे, स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक भोजन की थाली हाथ में लिए मनुहार करती हैं, ना तो वे भोजन की अहमियत समझते हैं ओर ना ही मां के दुलार को, ऐसे बच्‍चे बिगडैल हो जाते हैं। लेखक और पाठक का रिश्‍ता ऐसा ही है। मां बेटे जैसा। ऐसा नहीं है कि आप अपने लेखक और लेखक अपने पाठक को प्‍यार नहीं करता लेकिन मुझे लगता है कि हम उस पाठक के पीछे दूध की बोतल लेकर दोड़ रहे हैं कि आ जा, जल्‍दी पी ले, नहीं तो तू छोटा ही रह जाएगा। वो हमारे ममत्‍व को समझ भी रहा है कि नहीं। मुझे लगता है उसे बिगडै़ल बच्‍चा बनने से बचाइए।
दूसरी बात, कि कुछ मित्रों की राय है कि अब तक लेखक को रॉयल्‍टी नहीं मिली और अब भी ना मिले तो हर्ज क्‍या है। ऐसा क्‍यों सोचते हैं आप। हिंदी में प्रिंट ऑर्डर तीन सौ पर आ गया है तो इसमें गलती किसकी है, महंगी कीमत, मुझे नहीं लगता कि कोई आधार है। नाम लूंगा तो बुरा लगेगा लेकिन एक पाठक के नाते मैं सत्‍तर से अस्‍सी प्रतिशत हिंदी लेखकों के माल को रद़दी के भाव ना लूं। आप प्रकाशकजी, उस किताब को सौ रुपए, डेढ सौ रूपए, दो सौ रुपए में बेचेंगे और कहेंगे कि पाठक नहीं है तो भैया गलत बात है। तीसरी बात, यही खराब किताब आप दस रुपए में उसे बेच देंगे तो आपने साहित्‍य का एक पाठक खो दिया। इतनी रद़दी किताब पढकर वे साहित्‍य से नफरत ही करने लगेगा। यानी किताब अच्‍छी हो या बुरी सस्‍ती बेचने पर नुकसान ही है अतंत: मुझे किसी का फायदा नहीं दिखता। जैसा कि भाई रवीन्‍द्र नाथ झा ने कहा है कि आदमी लेखक तो होना चाहिए। सिर्फ लिखते रहने वाला नहीं। आप पूछिए, लोकायत के शेखर से और हास्‍य कवि संपत सरल से भी कि खोया पानी की तारीफ सुनने के बाद कितने लोगों ने उसे सिर्फ माउथ पब्लिसिटी से खरीदा। आंकडा बहुत उत्‍साह जनक नहीं है, लेकिन मेरे आदरणीय यशवंत व्‍यास ने जब स्‍वयं अपनी देखरेख में ही अपनी किताबों का विपणन शुरू किया तो उनके सामने नतीजे अच्‍छे थे कि उनकी किताब बिक रही है। उन्‍होंने लाइब्ररी में किताब नहीं बेची। लेकिन समस्‍या व्‍यापक है। मेरे समझदार मित्र मुझे माफ करेंगे लेकिन यह सच है कि हिंदी विभागों में इतने कूढमगज अध्‍यापक भर गए हैं जो साहित्‍य पढाना ही नहीं जानते। उनकी अपनी संवेदनाएं ही नहीं हैं। वे डिपार्टमेंटल पॉलिटिक्‍स और अन्‍य व्‍यसनों में ही लिप्‍त हैं। उनके लिए वह एक आजीविका है। उनमें मास्‍टर दीनानाथ ब्रांड मामूली आदर्श और समझ भी नहीं बची तो क्‍या खाक अपने स्‍टूडेंट़स को साहित्‍य समझा पाएंगे। हिंदीवालों को नौकरी की वैसे भी मारामारी है। हमारे वे पाठक अपनी साहित्यिक रुचि की वजह से ही हिंदी विभाग तक आते हैं। वहां लेखक बनाना दूर, एक समझदार पाठक बनाने का काम भी नहीं होता। जड़ से उसको खत्‍म करने का काम यहीं होता है। मैं हिंदी की एक वाद विवाद प्रतियोगिता में जज बन कर गया था। एक व्‍याख्‍याता मित्र के कहने से। मुझे जो मानदेय दिया गया कि उस पर उन्‍होंने अपने हा‍थ से वाद विवाद प्रतियोगिता और मेरा नाम लिखा। मानदेय की राशि लिखी। इन तीन लाइनों में वर्तनी की छह गलतियां थीं जो अनजाने में नहीं हुई थीं। सचमुच उन्‍हें हिंदी लिखनी नहीं आती। तो जो स्‍टूडेंट आपका एक पुख्‍ता पाठक बन सकता था कि उसे हमारे हिंदी विभागों ने खत्‍म कर दिया है दोस्‍तो। और पूरे जोर शोर से वे इस अभियान में लगे हुए हैं। वे छात्र साहित्‍य को पढना नहीं सीखते, सिलेबस में ठुकी हुई किताबों को पढने को अभिशप्‍त हैं। जो साहित्‍य में रुचि के लिए प्रवेश लेते हैं वे ही विभाग से निकलते हुए रट़टा मार रहे हैं नेट स्‍लेट के लिए। वे ही आगे पढाने पहुंच जाएंगे। दुर्भाग्‍य से सिलेबस भी प्रकाशकों के अहसानमंद या प्रकाशकों को अहसान चुकाने वाले लोगों द़वारा तैयार किया जाता है, बहस दिशा ना छोडे तो पुन: बिंदु पर आते हैं। मेरा आशय इसलिए है कि पाठक हमसे क्‍यों छूट रहा है, इसकी सबसे बड़ी वजह केवल किताब महंगी होना ही नहीं है। हिंदी साहित्‍य वाले हिंदी से ऊबे हुए छात्र बना दिए गए। आदरणीय डीपी सर, जिस छूटे हुए पाठक की बात कर रहे हैं, वे मेरी भावना समझ रहे होंगे। आज ब्‍लॉगिंग को देखिए, गैर हिंदी पढे हुए लोग, दूसरे अनुशासनों में काम करने वाले, विज्ञान स्‍नातक, इंजीनियर आदि हैं जो हिंदी में सबसे रचनात्‍मक ढंग से काम कर रहे हैं। मेरे अपने अखबार में जिन लोगों ने हिंदी साहित्‍य पढा है, वे सबसे खराब पत्रकार हैं। संवेदना और समझ के लिहाज से। अब आप पत्रकारिता के गिरते स्‍तर पर मत जाइए। वो जितनी गिर गई है, उससे भी गिरी हुई और गई बीती पत्रकारिता हिंदी साहित्‍य पढकर आए लोग कर रहे हैं। हम सब जानते हैं कि साहित्‍य और पत्रकारिता का पुराना रिश्‍ता क्‍या रहा है और अब क्‍या रह गया है। पर साहित्‍य कोई पत्रकारिता का मोहताज नहीं है। वह बचेगा। यह बात भी विषयांतर के साथ कहना जरूरी है।
तो हमें जिन पाठकों को पकड़ना चाहिए या जिनकी चिंता करनी चाहिए वे ज्ञान के दूसरे अनुशासनों के लोग हैं, वे तुलनात्‍मक रूप से बौदि़धक और आर्थिक रूप से बेहतर हैं, उनके लिए कीमत से ज्‍यादा महत्‍त्‍वूपर्ण अच्‍छे साहित्‍य की उपलब्‍धता है।
दूसरी बात, हर किसी के पेट में ज्ञान और संवेदनाओं के अक्षर नहीं पचते। सुधी पाठकों का एक समुदाय है। तो क्‍यों हम लाखों करोडों पाठकों की चिंता करते हैं। क्‍यों ना भले ही सीमित लेकिन असली पाठकों पर ध्‍यान दें।
दूसरी भाषाओं में लुग्‍दी साहित्‍य की क्‍या हालत है, मैं अधिकृत तौर पर नहीं कह सकता, क्‍योंकि मेरा ज्ञान सीमित है। लेकिन हिंदी में यह बखूबी दिखता है। मैं उस लुग्‍दी की बात नहीं कर रहा हूं जो केशव पंडित, वेद्प्रकाश शर्मा या सुरेंद्र मोहन पाठक का साहित्‍य है। उसके तो पाठक हमसे भी ज्‍यादा होंगे। मैं उस मुख्‍यधारा के साहित्‍य की बात कर रहा हूं, जिसका जिक्र ओम पुरोहित कागद, दुष्‍यंत की चर्चा में हैं। पैसा देकर किताब छपाना, उसे मित्रों को मुफ़त बांटना, उस पर प्रतिक्रिया जानने को व्‍यग्र होना। मुझे तो कभी कभी लगता है कि आज हिंदी में पाठक कम हो गए हैं और लेखक ज्‍यादा हैं।
कितने लोग कितना कुछ लिख गए हैं। डर लगता है कि उस विरासत को खराब क्‍यों करूं। चुपचाप किताबें पढते हुए किसी कोने में पाठक बनें रहें।
मुझे खुद को रॉयल्‍टी नहीं चाहिए। मैं मेरे उन प्रिय लेखकों के लिए संघर्ष करता हुआ पाठक हूं। मैं चाहता हूं कि उनका अस्तित्‍व रहे। वे लिखते रहें। उनके पास लडने की लिखने की ऊर्जा रहे। आप मानें या मानें अपने तमाम वामपंथी आग्रहों के बावजूद मैं मानता हूं कि धन से वह ऊर्जा मिलती है, लेखक को वह ऊर्जा मिलनी चाहिए। आप किस क्रांति की बात कर रहे हैं। सत्‍यनारायण लेखक नहीं होते तो भी वे जहां रहते वहां के लोगों को एक सादगी और सहजता से जीना सिखाते। मुझे उनके ही किसी स्‍टूडेंट ने बताया कि गांव से आए कई जरूरतमंद बच्‍चों को गुमनाम तरीके से वे आर्थिक मदद करते हैं। यह सच है तो मुझे लगता है दस रुपए में क्‍यों बेच रहे है आप सत्‍यनारायण की किताब। क्‍या उन्‍हें रॉयल्‍टी का और पैसा नहीं मिलना चाहिए, जो उनका हक है। मतलब कोई लेखक भला है, तो उसकी भलमनसाहत के बूते ही उसे मार डालेंगे क्‍योंकि हमें पाठक को सस्‍ती किताब देनी है। सत्‍यनारायण को आप रॉयल्‍टी देंगे तो वह किसी जरूरतमंद की फीस भरने के काम आएगी।
रही बात फ्रांस की क्रांति से लेकर आजादी के आंदोलन में लेखकों की भूमिका को लेकर। क्‍या बात करने का हक है हमें। हम सब डरे हुए लोग हैं। अपने अपने दडबों में सुरक्षित। राज्‍य की अकादमियों की हालत पर क्‍या कभी राजस्‍थान से लेखकों की टिप्‍पणी आई। प्रतिरोध आया कहीं से। क्‍या आपको पता है कि जवाहर कला केंद्र एक स्‍वायत्‍त कला संस्‍थान है और एक आइएएस अफसर पिछले करीब ढाई साल से वहां अपने ढंग से काम कर रही है। मुझे किसी ने बताया कि इनका तबादला इसलिए नहीं हो सकता कि वे एक सीनियर आइएएस हैं, इससे खराब जगह उनके लिए और कोई नहीं है। यानी यह उनके लिए पनिशमेंट पोस्टिंग है, तो लेखक कलाकारों के लिए यह क्‍या है, इसका अंदाजा आप लगा सकते हैं। पिछले साल पूरे मार्च के महीने में लाखों रुपए जवाहर कला केंद्र मे उडाए गए। बिना दर्शकों के भी हर रोज कोई ना काम आयोजन किया गया क्‍योंकि मार्च खत्‍म होने से पहले बजट को ठिकाने लगाना था। क्‍या हमको पता है कि यह तय करने का हक एक अधिशासी समिति का होता है जिसमें रंगकर्मी, लेखक, कलाकार सब होने चाहिए। वो समिति आज तक बनी ही नहीं। सरकार ने बनाई ही नहीं। ना ही बनाने की उसे फिक्र है। मैंने एक भी लेखक और कलाकार को यह कहते नहीं सुना कि यह हो क्‍या रहा है। बैठते सब लोग एक जाजम पर। धरने पर बैठ जाते जवाहर कला केंद्र के बाहर कि ये फिजूलखर्ची रूकनी चाहिए। सीएम को चिटठी ही लिखते। अखबार भी मजबूरन लेखक की आवाज को उठाते। लेकिन कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आती। लेखक हैं लेकिन बेखबर है कि आस पास क्‍या हो रहा है। हमारे आंदोलनकारी आदरणीयों को डर है कि उन्‍हें धरने पर देख लिया गया तो अकादमियों के पुनर्गठन के दौरान उन पर ध्‍यान कौन देगा।
असल में क्रांति पाठक को सस्‍ती किताबें से नहीं होती। वो तो जमीन पर ही होती है। अपने दौर के महान लेखकों ने अपने समय में क्रांतियों में सक्रिय हिस्‍सेदारी ली। हम सौभाग्‍यशाली हैं कि लोकतंत्र में हैं। हम बयान तो दे सकते हैं। अखबार नहीं छापते हैं तो क्‍या हुआ। फेसबुक पर ही दें। छोटी सी आवाज भी अहमियत रखती है। देवयानी ने सही कहा था कि फेसबुक लोगों को अभिव्‍यक्‍त कर रहा है, भले ही उनको कोई प्रतिक्रिया की उम्‍मीद नहीं है। पत्रकार भाई आलोक तोमर ने इसे एक अभियान की तरह इस्‍तेमाल किया है। वे कामयाब भी हैं।
इतने बडे मुद़दे हमारे सामने हैं, फिर भी हम लेखक की पीठ पर धौल जमाते हुए कह रहे हैं, लिखता रह उस्‍ताद, फल की चिंता मत कर। लेखक ही नहीं बचेगा जिस दिन तो पाठक का क्‍या अचार डालेंगे आप। आप प्रकाशक को लाख गाली देते हैं। वो है तो आप लेखक है ना। वो कमीशन इसलिए खाता है कि खुजली आपकी है। प्रकाशक नहीं रहेगा, तो लेखक क्‍या जनसभाओं संबांधित करते हुए अपनी कहानी सुनाएगा। उससे बात की जा सकती है, अपने हक के लिए। बड़ी मुश्किल से कोई उपयुक्‍त प्रकाशक पनप रहा है तो क्‍यों उसे खत्‍म करने पर तुले हैं। फिल्‍म इंडस्‍ट्री में तमाम मूर्खता के बावजूद प्रोडयूसर की इज्‍जत बहुत होती है, क्‍योंकि वो है तो सिनेमा बनेगा। वो अच्‍छा बनेगा या बुरा बनेगा बाद की बात है। बुरे को लोग खारिज कर देंगे। किताब का पाठक सिनेमा के दर्शक के कहीं ज्‍यादा सुकोमल है। उसने एक बार आपको खारिज कर दिया तो आप हमेशा के लिए गए काम से। लेखक की छवि लिखने से बनती है और प्रकाशक वो क्‍या छाप रहा है इससे बनती है। जयपुर के कितने कोनों में चालू टाइप प्रकाशन है जिनकी किताबें लाइब्ररी के लिए छपती है। वह लुगदी है। रद़दी है। यह साहित्यिक अपराध है। जिन प्रकाशकों का बड़ा नाम हे वह इसलिए है कि उनकी किताबें आप हम जैसे पाठक पढना चाहते हैं। उनका बडा नाम इसलिए नहीं है कि वे लाइब्रेरीज में ज्‍यादा किताबें देते हैं और उनका मुनाफा ज्‍यादा है। आप वहन नहीं कर सकते। दस रुपए में तीसरा या चौथा खंड लुगदी ही छपने का खतरा है। उससे कैसे बचेंगे आप। जो बनाएंगे, वे ही पाठक आपको छोडकर चले जाएंगे।
प्रकाशक मायामृग को आपने महान बना दिया। पाप का चौ‍था हथियार श्रद़धा ही है, चढा दो। उसने बहुत क्रांतिकारी काम किया है। माया मेरे मित्र हैं, मेरा हक है उन पर, मैं पूछता हूं घाटा उठाकर यह काम क्‍यों किया है। इस योजना का पहला एसएमएस एक पत्रकार मित्र से ही आया था कि सौ रुपए में दस किताबें। आपमे से कितने लोग जानते हैं कि उसने खुद ने अपनी किताब को पच्‍चीस रूपए में बेचा है। मेरे जिन परिचितों को उसने यह किताब बेची है, वह तरीका निहायत खराब था। पहले सौ रूपए मांगे और फिर उनकी सहमति की परवाह किए बिना चार किताबें थमा दीं। यह संकेत देते हुए कि एक तुम पढो बाकी तीन बेचकर अपने पिचहतर रुपए बचा सकते हो तो बचा लो। यह किताब की मल्‍टीलेवल मार्केटिंग हैं। तो प्रिया परिवार, एमवे के उत्‍पाद बेचने से हमने यह सीख लिया। सब लोग पीठ पीछे उसकी इस हरकत को बुरा कह रहे थे। मैंने नहीं ली उसकी भी किताब। मैंने पत्रकारिता पर कम ही किताबें पढी हैं लेकिन वह एक कमजोर किताब है। वो मेरा सहकर्मी मित्र रहा है, इसलिए पूरे हक से मैं कह सकता हूं, उसे नहीं लिखनी चाहिए थी, ि‍लख ही दी तो अच्‍छा है पर ऐसे बेचनी नहीं थी। मेरी जानकारी के अनुसार किताब बिकी अच्‍छी खासी है। उसके पास एक कमजोर किताब को बेचने की भी कला है। लेकिन आपका पाठक तो खराब हुआ। अगली बार मांगने से वह सौ रुपए नहीं देगा। भेडिया सचमुच जिस दिन आएगा, उस दिन मदद को कोई नहीं आएगा। आप पाठक की मासूमियत का फायदा मत उठाइए। लेखक की छपास की बीमारी से बचिए। एक उपयुक्‍त प्रकाशक को बचाना भी उतना ही जरूरी है जितना एक लेखक और पाठक को बचाना जरूरी है। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।
हमारा वह मित्र भी इस अभियान का हिस्‍सा है। वहीं से मुझे यह खयाल आया है। अरे भाई, आप पच्‍चीस रुपए कीमत रखिए ना। चलिए इस सोल्‍यूशन पर आते हैं, जो निहायत मेरा है, माया इसे मानें या मानें उनकी मर्जी।
आप पच्‍चीस रुपए कर दीजिए कीमत। शायद इससे छपाई की लागत और लेखक और आपका भी कुछ हिस्‍सा बनेगा। सौ रुपए में आप चार किताबें दीजिए ना। यह योजना भी उतनी ही आकर्षक है जितनी दस किताबों की। बस इतना करिए कि लुगदी साहित्‍य को बाहर निकाल दीजिए। समझदार लेखकों को एक संपादक मंडल बना लीजिए, उसका वे पैसा भी नहीं लेंगे, यहां लेना भी नहीं चाहिए। यह लेखकों का ही फर्ज है कि पाठक के सामने अच्‍छा साहित्‍य जाए। क्‍या हमारा फर्ज नहीं कि हम प्रभात के गीतों की किताब बंजारा नमक लाया को व्‍यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाएं। यकीन है इसमें सिफारिशी लेखकों की किताबें नहीं आएंगी। पाठक लेखक प्रकाशक तीनों का भला है, बहस मेरे खयाल से बहुत हो गई समाधान पर आएं। किसी के पास इससे बेहतर समाधान है तो वह भी आना चाहिए।
ये किसी पर व्‍यक्तिगत आक्षेप नहीं हैं। लेखक हैं तो आपका जीवन सार्वजनिक है, एक आध टिप्‍पणी होती है। हमारी हरकतों से लेकर रचनाकर्म तक पर लोग बोलेंगे। बुरा नहीं लगना चाहिए। लगे तो इसका उपचार भी हम स्‍वयं को ढूंढना होगा। तीन दिन से तर्क वितर्कों के बाद मुझे खीज हो रही है कि बातों को तार्किक ढंग से ही सुलझाएं तो बेहतर। आप स‍मझिए मुझे गिरिराज भाई की प्रतिलिपि से क्‍या दुराग्रह होगा। वे एक अच्‍छी पत्रिका निकाल रहे हैं। गिरिराज बचने चाहिए, प्रतिलिपि बचनी चाहिए, पाठक भी इसी गुणवत्‍ता की वजह से बचेगा। इसलिए नहीं कि आपने उसे सस्‍ती किताब दी इसलिए वह पढ रहा है। मायामृग भी बचने चाहिए। पुस्‍तक पर्व भी बचना चाहिए। पाठक की जेब का कुछ पैसा भी बचना चाहिए लेकिन उसकी गुणवत्‍ता की भूख शांत होनी चाहिए। कुल मिलाकर बात यह है कि सबसे ज्‍यादा जरूरी है किताब बचनी चाहिए। वो तब बचेगी जब लेखक बचेगा, जब पाठक बचेगा और प्रकाशक बचेगा।

सोमवार, मार्च 29, 2010

सरकारी जादू की झप्पी


आप नरेगा के बारे में कितना जानते हैं? जो खबरें छप रही हैं उतना ही उससे ज्यादा कुछ। जिस इलाके में मैं घूमकर मैं आया हूं, वहां जमीनी हकीकत कुछ और है। दरअसल सरपंच समेत गांव के आम लोगों ने यह समझ लिया है कि नरेगा या महानरेगा का पैसा सरकार बांट रही है लिहाजा जरूरी नहीं कि इस पैसे के बदले काम किया जाए। सरकारी नियमों के मुताबिक एक तयशुदा काम होना चाहिए। कुछ समय पहले सवाई माधोपुर जिले के गांवों में मैं नरेगा कार्यों की जांच करने गए एक इंजीनियर मित्र के साथ था। वहां हमने देखा कि मस्टर रोल संबंधी औपचारिकताएं पूरी हैं लेकिन मिट्टी की खुदाई वाले स्थान पर जेसीबी मशीन के दांतों के निशान थे। जब जांच में उन्होंने आपत्ति जताई तो सरपंच ने कहा, आपको क्या तकलीफ है, जब लोगों को पैसा मिल रहा है। लोगों को दिक्कत ही नहीं है कि उन्हें काम किए बिना ही पैसा मिल रहा है। भले ही इसमें सरपंच और सरकारी अफसरों ने अपना कमीशन काट लिया है। सरकार का काम तो हो ही रहा है। फिर वो चाहे आदमी खुदाई करे या मशीन बात तो एक ही है। सच्चाई यह है कि मशीन की खुदाई वाले काम में मजदूर और सरकारी कारिंदों के बीच सौदेबाजी की सदैव आशंका है।दूसरी बात यह है कि नरेगा के दौरान कराए जा रहे कार्यों में बहुत सारे इतने अप्रासंगिक और गैर-जरूरी हैं। मसलन किसी भी जोहड़ में मिट्टी खोदना। गांव के सामूहिक चरागाह के चारों ओर खाई देने का तुक समझ में नहीं आता। खासकर राजस्थान के उस मरूस्थलीय हिस्से में, जहां हर मई जून में चलने वाली आंधियों से उस खाई में फिर मिट्टी भर जाती है। सवाल है कि ऐसे काम क्यों हो रहे हैं, जवाब वही है कि सरकारी आदमियों को ऐसे ही कामों में पैसा डकारने की छूट मिलती है। वे कह सकते हैं कि खुदाई तो करवा दी थी लेकिन आंधियों ने सब खराब कर दिया। एक गांव में मैं गया, वहां गांव के भीतर ही पूरा मार्ग ऐसा है कि आपकी कार या बाइक को चलने में तकलीफ होती है। मैंने पूछा, यहां नरेगा के कोटे से आप लोगों ने पत्थर या सीमेंट की सडक़ क्यों नहीं बनाई? खुलासा हुआ कि इस मोहल्ले के लोगों ने उस आदमी को वोट नहीं दिया, जो इस बार सरपंच जीत गया। पिछली बार भी यह हादसा इसी मोहल्ले के साथ हुआ। सत्ता के साथ नहीं रहने की अपनी तकलीफें हैं। सरपंच अपनी पूरी दादागिरी कर रहा है। खुद मेरे गांव में मुझे यह जानकर ताज्जुब हुआ कि गांव के इतिहास में पहली बार सात आदमी सरपंच के लिए मैदान में थे। वरना समझा बुझाकर दो और तीन आदमी ही मैदान में रह जाया करते थे। इस बार सरकारी धन का लालच चरम पर था। अघोषित तौर पर लोगों ने माना कि कोई 25 से 30 लाख रुपए का खर्च सरपंच के चुनावों में हो गया है। इसमें बड़ी रकम शराब पर खर्च की गई। आदरणीय चाचाओं ने मुझे गर्व के साथ बताया कि पिछले तीन महीने कितने हसीन गुजरे हैं, जब मैखाने की धार गांव से गुजर रही थी और मनचाहे ढंग से लोग उसमें डुबकी लगाकर पुण्य कमा रहे थे। नरेगा के बाद गांव में मजदूर अब खेतों में अपनी नियमित मजदूरी नहीं करना चाहते। खतरनाक ढंग से सरकारी पैसे ने उनकी श्रम करने की नीयत तेजी से बदली है। वे अब बिना काम किए सब कुछ चाहते हैं। वे खेतों में मजदूरी नहीं करना चाहते क्योंकि वहां पैसा देने वाला सीमांत किसान है और वह अपने पैसे की पूरी वसूली चाहता है। सरपंच या सरकारी अफसरों की तरह उसके खेत में कमीशन खोरी नहीं चल सकती। मैं नरेगा की आलोचना करते हुए गैर सरकारी संगठनों के उस अभियान को भी हवा नहीं देना चाहता जिनकी तकलीफ है कि सरकार सीधे गांवों में पैसा क्यों बांट रही है? इतनी बड़ी रकम में उनको भी मलाई मिलनी चाहिए। पैसा बांटने का मौजूदा सरकारी ढांचा ही ठीक है। मैंने नॉर्थ ईस्ट के अराजकताग्रस्त राज्य मणिपुर में भी नरेगा का काम देखा। वहां काम कर रहे मजूदरों से बातचीत की। सचमुच नरेगा ने गांवों के आम लोगों की जिंदगियों को बदल दिया है। उनके पास पैसा पहुंच रहा है। जरूरत इस बात की है कि इस पैसे पर नजर रहे। सरकार की, हम सबकी। उसे बांटने के ढंग पर सरकार सोचे। देश की तकदीर तेजी से बदल सकती है। लेकिन मुझे सबसे बड़ा खतरा यह दिख रहा है कि गांवों में तेजी से जा रही यह पूंजी उन लोगों की श्रम करने के जुनून, अपने हक के लिए जूझने की आदत, क्रांतिचेतना को कुंद कर रही है। सरपंच और सरकारी तंत्र मिलकर पूरी कोशिश में है कि आदमी बिना काम किए पैसा लेने की आदत बनाए ताकि उनका फायदा हो। यह आम आदमी को अपनी ही नजरों में गिराने की एक साजिश जैसा है। क्योंकि भूखे आदमी को पहले भरपेट रोटी चाहिए। उसके बाद वह सच झूठ, नैतिक अनैतिक चीजों के बारे में सोचता है। मुझे डर है कि आने वाले दस साल में गांव वालों के पास पैसा बहुत आने वाला है लेकिन वे गांव वाले नहीं बचेंगे। छल कपट, बेईमानी और भ्रष्टाचार उनकी नसों में दौड़ेगा। मैं दुआ करता हूं, ऐसा नहीं होगा। लोग अपने श्रम की अहमियत समझेंगे। नरेगा जैसी सरकारी जादू की झप्पी को शायद वे ठीक से महसूस कर पाएंगे।

मंगलवार, मार्च 16, 2010

कुतिया की नानी, बारिश का पानी



आइपीएल के मैच प्रसारण के दौरान सिनेमा और टेलीविजन के निर्माताओं को पसीना आने लगता है। सारा देश क्रिकेट देख रहा है। टीवी की यह क्रांति महज एक दशक पुरानी है। इसका सबसे बड़ा खमियाजा बच्चे भुगत रहे हैं। दो ढाई दशक पहले जिन भारतीय लोगों ने अपना बचपन बिता दिया उनके लिए निंजा हथौड़ी, कितरेत्सु, कैनी जी, लोबिता, परमैन आदि की जादुई और गैर तार्किक सी दुनिया नहीं थी। उनकी कल्पनाओं में चंदा मामा के बीचों बीच चरखा कातने वाली बुढिया थी, जो किशोर होते होते समझ में आती थी कि चंद्रमा ने एक ऋषि की पत्नी के साथ भेष बदलकर दुराचार किया था। जब चंद्रमा अपना काम तमाम करके निकल रहा था तो सामने नदी से नहाकर आए ऋषि दिख गए। वह भागने को ही था कि कंधे पर रखी गीली धोती से ऋषि ने चंद्रमा को मारा। ये उसी गीली धोती के दाग हैं। जब युवा हुए, पढ लिख गए तो सब धरा रह गया। नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद पर पहुंच ही गया। उसने बताया कि यहां कोई बुढिय़ा चरखा नहीं कात रही। ना ही ऋषि से दुश्मनी का जिक्र चांद ने किया है। यहां तो ऊबड़ खाबड़ गडढे हैं। कल्पना से हकीकत तक आते आते यह पूरी यात्रा है। बहुत अफसोस होता है कि मेरे बच्चे कल्पना की इतनी लंबी यात्रा नहीं कर रहे। वे रिमोट के बटन से किड्स चैनल बदलने में अपना समय गंवाते हैं। टीवी और क्लासरूम तक हमारे बहुसंख्यक बच्चों की दुनिया सिमट गई है। वे हवा में तैरते बादलों में डायनासोर, मोर, ऊंट, चिडिय़ा, सांप की छवियां नहीं टटोल सकते। कब बादल का ऊंट करवट लेकर डायनासोर जैसी शक्ल बना लेता है कोई नहीं जानता। उन्हें हम तर्क से यह जरूर पढ़ा रहे हैं कि बादल का बनना और बिगडऩा एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
टेलीविजन के खबरिया चैनलों पर भी भूत है और टीवी सीरियल में भी भूत। दादी के किस्सों में आने वाला भूत तर्क के जरिए गायब कर दिया गया। पर्दे पर दिखने वाला भूत डरावना ही नहीं है। हम बच्चों को समझाते हैं कि भूत कुछ होता ही नहीं, यह सब मेक-अप और स्पेशल इफेक्ट का कमाल है। हम उन्हें निडर बनाना चाहते हैं लेकिन भूल जाते हैं कि किसी भी समाज में अनुशासित करने में कितनी मदद करता है? दादी नानी के किस्सों में आने वाले भूत से राजकुमारी शादी कर लेती थी और उस भूत के चेहरे को कल्पनाओं के जरिए कोई आकार देने की कोशिश करते थे। कभी तार पर सूखते हुए सफेद कपड़े को रात को देखकर भूत समझते, तो कभी दूर बाड़ में खींफ, आक, कीकर के पेड़ में भूत देखते। कभी पीपल के पेड़ पर रहने वाले बूढे शरीफ भूत की कल्पना करते। सब कुछ इक्कीस, उनतीस, बत्तीस इंच के स्क्रीन का शिकार हो गया है। हमारे दौर के बच्चों के साथ यह बड़ा हादसा है।
स्कूल से घर लौटते हुए पंद्रह बीस बच्चों का झुंड अक्सर उस खुले मैदान के किनारों पर बने कुत्तों के घूरे में बीतता था। कुतियाएं सात-सात पिल्ले जनती थीं। बच्चे उनके पंजे गिनते थे। अपने टिफिन से उन्हें खिलाते थे। कुतिया अपने पिल्लों को तो प्यार करती ही थी, इन बच्चों के प्यार को भी मानती थी। वे कुतियाएं नई मां थी। वो किसी को काटती नहीं थी। घरवालों की हिदायत के बावजूद बच्चों का समय वहीं बीतता था। वे सब एक दूसरे से रिश्ते जोड़ लेते थे। असली बचपन, जो टीवी का शिकार नहीं था। गांव में कुत्ते बढ़ गए थे। वे मवेशियों के बाड़े पर हमले करने लगे थे। गांव वालों ने बंदूक वाले शिकारियों को किराए पर लिया। रोज धमाकों की आवाज होती थी। सारे कुत्ते मार दिए। वे सब भी जिनके साथ बच्चों की दोस्ती थी। स्कूल से लौटते हम खाली घूरों के पास बैठकर रोते थे। अपने ही बुजुर्गों को कोसते थे कि उन्होंने हमारे दोस्तों को मरवा दिया। घरों में सारे बच्चे मुंह फुलाए घूमते थे। उस साल गांव में एक बूंद पानी नहीं बरसा। गांव वाले समझते रहे कि यह महज एक प्राकृतिक आपदा है लेकिन मुझे लगता है जिन बादलों को रातभर जागकर हम घूरते हुए कई चेहरे तलाशते थे, उनसे से भी हमारी दोस्ती हो गई थी। बादलों ने अपना पानी हम बच्चों को उधार दिया था ताकि रोने से हमारी आंखों को नुकसान ना हो। बादल, कुत्ते, चांद, बारिश सब हमारी मदद को आते थे। क्या हमारे बच्चों की मदद के लिए लोबिता, कितरेत्सु, परमैन आएंगे? कहां से आएंगे? वे सिर्फ रेखाएं हैं, कार्टून हैं, जिन्हें बाजार ने ईजाद किया है। बाजार की ईजाद की हुई चीजें बचपन को तो नुकसान ही करती हैं। जिन वैज्ञानिकों ने चांद को प्रयोगशाला बना दिया, क्या वे ऐसा ही एक और चांद हमारे बच्चों को दे सकते हैं, जिसे देखकर वे खूबसूरत कल्पनाएं कर सकें? ऐसा नहीं होगा। मुझे इस दौर के बच्चों से सहानुभूति है। वे नहीं जानते कि वे कितना कुछ खो रहे हैं।

शुक्रवार, मार्च 12, 2010

घर में ठीक, घाट भी साफ

निर्देशक शंकर अग्रवाल की फिल्म ना घर के ना घाट के इसी हफ्ते रिलीज हुई है और एक साफ सुथरी कॉमेडी फिल्म है। वेलकम टु सज्जनपुर की तरह यहां गांव की वापसी हुई है। पिछले कुछ समय से नए फिल्मकारों ने गांव को फिल्मों में वापस लाने की कोशिश की है। टीवी पर तो गांव बिक ही रहा है। गांव के एक युवक की नौकरी मुंबई में लगी है। वह पहली बार मुंबई जा रहा है। वहां उसे एक लोकल गुंडे के साथ रहने को जगह मिलती है। धीरे धीरे दोनों में समझदारी बढती है। गुंडा मराठी है, गांव का युवक उत्तर भारतीय। दोनों की यारी दिखाकर निर्देशक यह बताने की कोशिश कर रहा है कि मुंबई किस तरह सब भारतीयों की है। नौकरी कर रहा देवकी नंदन त्रिपाठी जब गांव वापस पहुंचता है कि मां बाप को उसके दुबलेपन की चिंता है और उसकी शादी तुरंत कर दी जाती है। उसके पिता उसकी दुल्हन को लेकर मुंबई जाते हैंं। फिल्म एक दिलचस्पी को लगातार बनाए रखती है। अचानक मुंबई में गांव की दुलहन पुलिस के हत्थे गलती से चढ जाती है और नायक, उसका गुंडा दोस्त और पूरा गांव अब उसकी बीवी को पुलिस से छुड़ाने में लग जाते हैं।फिल्म की कहानी दिलचस्प तरीके से कही गई है। निर्देशक शंकर अग्रवाल खुद ही लीड रोल में हैं ओर आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने ठीक अभिनय किया है जबकि पोस्टर और प्रोमोज में दिख ही रहा है कि उनकी शक्ल सूरत नायक के परम्परागत चेहरे जैसी नहीं है। सिर के बाल भी लगभग उड़ ही गए हैं लेकिन यह उत्साही युवक अमीर कमाल खान से कहीं ज्यादा बेहतर और संवेदनशील ढंग से फिल्म को बना गया है। इंटरवल के बाद में हिस्से में फिल्म की गति थोड़ी धीमी होती है। ओम पुरी संकटा प्रसाद त्रिपाठी की भूमिका में जमे हैं। परेश रावल पुलिस वाले हैं और रवि किशन ने लाउड ही सही, एक मराठी गुंंडे को किरदार ठीक निभा दिया है। निश्चित रूप से फिल्म ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों जैसी प्रतीत होती है लेकिन अफसोस की बात यह है कि हमारे दर्शकों को आजकल नए किस्म की कॉमेडी और भारी भरकम सितारों वाली फिल्में देखने की आदत हो गई है। फिल्म के गीत संगीत भी अच्छे लगते हैं। बोर्ड के इम्तहान और आइपीएल सब फिल्मों पर इस समय भारी है।

थोड़ी राइट, थोड़ी रॉन्ग

फिल्म समीक्षा

मुक्ता आर्ट्स की ओर से रिलीज निर्देशक नीरज पाठक की फिल्म राइट या रॉन्ग एक थ्रिलर है। एक ऐसा थ्रिलर है जिसकी शुरुआत धीमी है लेकिन धीरे धीरे कहानी खुलने लगती है। यह दो पुलिस अफसर दोस्तों की कहानी है जो अपने ढंग से एक सच और झूठ के साथ जी रहे हैं। एक दोस्त एनकाउंटर में हादसे का शिकार होता है और अपाहिज हो जाता है। अपने अच्छे दिनों को याद करते हुए वह अवसाद का शिकार है और अपनी ही बीवी और भाई को कहता है कि वे उसका मर्डर कर दें। कहानी यहां से करवट लेती है। कुछ चीजें बिलकुल ही खोलकर बता ही गई हैं जैसे पुलिस अफसर की बीवी का उसके भाई के साथ अफेयर है। बाद में थ्रिलर इस बात पर जाकर टिक जाता है कि वह मर्डर था कि हादसा। लेकिन इससे पहले दर्शक सब कुछ जान जाते हैं कि वह सचमुच क्या था। जो अभियुक्त है, वो किस तरह खुद को बचा रहा है।
फिल्म में सन्नी देओल और इरफान खान लीड रोल में हैं तो ईशा कोप्पिकर और कोंकणा सेन भी हैं। कहानी इतनी ज्यादा थ्रिलिंग नहीं है कि आप पहले से अंदाजा ना लगा सकते हों। इस लिहाज से यह एक औसत फिल्म है। एक्शन दृश्य अच्छे हैं। कहानी कहने की पुरानी अदा, जैसे कोर्ट में गवाही, वकीलों की जिरह जैसे पुराने पड़ चुके दृश्यों को नया रंग देने की कोशिश की गई है। गीत संगीत औसत हैं और गैर जरूरी भी लगते हैं। ईशा कोप्पिकर पर फिल्माए गए बैडरूम दृश्य कुछ ज्यादा ही बोल्ड हैं और अनावश्यक लंबे किए गए हैं, जाहिर है, फिल्म को उत्तेजक दृश्यों के सहारे नहीं बेचा जा सकता। टाइमपास के लिए ठीक ठाक फिल्म है।

शनिवार, मार्च 06, 2010

अतिथि तुम कब जाओगे:

यहां अतिथि भगवान माना गया है लेकिन इस फिल्म का शीर्षक ही यह दुआ कर रहा है कि अतिथि घर छोड़कर जाए। मुंबई में फिल्म राइटर पुनीत के घर उनके दूर के रिश्तेदार लंबोदर चाचा आए हैं। पुनीत और उसकी कामकाजी पत्नी मुनमुन ने शुरुआती दिनों में आदर भाव दिखाया लेकिन धीरे धीरे इस अतिथि की वजह से उनकी निजी जिंदगी में भूचाल आ गया। माता पिता के कामकाजी और शहरी जीवन शैली से अकेलेपन से जूझ रहा उनका छह साल का बच्चा लंबोदर चाचा से घुलमिल गया है। लंबोदर चाचा के पास मुंबई में आस पास के गांव के परिचित लोगों की सूची हैं जिन्हें उन्होंने याद किया है। कुल मिलाकर लंबोदर चाचा गांव के हैं और पुनीत और उसकी पत्नी पर शहरीकरण का पूरा रंग है। उन्हें अतिथि बोझ ही लगता है। सबके पास अपनी थोड़ी सी स्पेस है और दिल बुरी तरह संकरा। दोनों पति पत्नी हर मुमकिन कोशिश करते हैं कि वे लंबोदर चाचा को वहां से निकालें लेकिन लंबोदर चाचा है कि धीरे धीरे मोहल्ले में लोगों और बच्चों के भी प्रिय बन गए हैं। वे जाने का नाम ही नहीं ले रहे। आखिरकार एक मामूली घटनाक्रम के बाद वे स्वयं ही उनका घर छोड़कर जाने की बात करते हैं। फिल्म की पटकथा में लोकजीवन की छोटी छोटी कथाओं को पिरोया गया है। लंबोदर चाचा द्वारा बार बार गैस निकालने की ध्वनि एक स्तर पर आकर थोड़ी ऊब पैदा करती है लेकिन कुल मिलाकर फिल्म एक स्वस्थ पारिवारिक मनोरंजन करती है। खासकर महानगर में रहने वाले लोग लंबोदर चाचा जैसे अतिथि का कभी ना कभी सामना तो करते ही हैं। फिल्म बिना कुछ कहे गांव और शहर के लोगों की मन:स्थिति के बुनियादी फर्क को भी रेखांकित करती है कि घर बड़े बनाकर और दौलत कमाने वाला मध्यवर्गीय आदमी में शहर में आकर कैैसे अपनी प्राथमिकताएं बदल देता है। फिल्म में लंबोदर चाचा बने परेश रावल अदभुत लगे हैं। अजय देवगन ओर कोंकणा ठीक हैं। चौकीदार बने संजय मिश्रा का काम भी काबिले तारीफ है। गीत इरशाद कामिल के हैं और बीड़ी जलाइले की धुन पर माता की आरती ठीक लगती है। संगीत प्रीतम और अमित मिश्रा का है। कबीर और रहीम के दोहों को अच्छे से इस्तेमाल किया गया है। निर्देशक अश्विनी धर ने एक मनोरंजक फिल्म रची है। फिल्म खत्म होते होते अतिथि देवो भव ही स्थापित होता है।

फागुन घुस गया है जहन में

फरवरी का आखिरी और मार्च का पहला पखवाड़ा उत्तरी भारत में एक खुशनुमा मौसम का होता है। बसंत पंचमी अक्सर सर्दी के बीचोंबीच आती है लेकिन होली आते आते मौसम एक करवट लेता है। ठिठुरन से रजाई में दुबके रहने और लू के थपेड़ों से बचकर घर में पड़े रहने जैसे अकर्मण्य अहसासों से मुक्ति दिलाने वाले ये महीने उल्लेखनीय हो जाते हैं। यही वे दिन होते हैं, जब हमारा सर्जन उफान पर होता है। काम करने की इच्छा होती है। लोगों से मिलने की इच्छा होती है। एक दूसरे को छेडऩे की इच्छा होती है। बरसाने में इसी छेड़छाड़ में लट्ठमार होली होती है तो शेखावाटी में धमाल और गींदड़ के साथ लोग झूमते हैं।
मेरे गांव के कई लोग ऐसे हैं, जिनके बारे में मैं पूरे साल कुछ नहीं जान पाता था। जैसे बिड़दाराम। बिड़दाराम पूरी साल खेती बाड़ी करके, मेहनत मजूरी करके इज्जत से अपने परिवार को पालता है। सामान्य दिनों में वह इतना दिलचस्प इंसान नहीं होता लेकिन होली के दिनों में गींदड़ में सबसे बेहतरीन स्वांग करता है। पिछले साल की बात है, वे लोग एक आदमी को गधागाड़ी में पटक के लाए। पूरे जिस्म पर प्लास्टर किया हुआ। सिर्फ नाक खुला था। गधे के सिर पर उन्होंने टॉर्च लगाई। एक हरा चमकीला कागज बांधकर एंबुलेस की शक्ल दी थी। गाड़ी की तरफ उन्होंने स्विच लगाया था। उससे वो हरी बत्ती बिल्कुल जलती बुझती दिख रही थी। एक टेपरिकॉर्डर से एंबुलेस के सायरन की ध्वनि निकाली गई। साल भर गंभीर रहने वाला सुल्तान यहां एक कॉमिक डॉक्टर था। आंख पर एक चश्मा, जिस पर एक तरफ का कांच था ही नहीं। सफेद एप्रिन और स्टेथेस्कोप गांव की प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से जुटाया गया। क्लिनिक में गांव के एक बढ़ई के घर से मांग कर लाई गई करोत, बसौला, हथौड़ा, छैनी, आरी जैसे ऑपरेशन के औजार थे। लोग हंस हंस के लोट पोट थे। डॉक्टर ने कहा, मरीज की सर्जरी होगी, क्योंकि उसके पास मरीज आते ही नहीं है और कई दिन से उसने आपरेशन किया नहीं है। उसकी आपरेशन करने की दिलीतमन्ना है, वरना एमबीबीएस की पढ़ाई बेकार जाएगी। उसने ईमानदारी से यह भी बताया कि आजतक जिस मरीज का आपरेशन उसने किया वह जिंदा नहीं बचा। मरीज के परिजन अपनी गधा एंबुलेस को लेकर आगे भाग रहे थे कि मरना मंजूर लेकिन ऑपरेशन नहीं कराएंगे। होली ने मेरे गांव में नाटक को अब तक बचाकर रखा है। वह उन मेहनतकश लोगों को साल भर की यंत्रणा और थकान से मुक्ति देती है। एक तरह से रिचार्ज करती है। वे अपनी ही व्यथा कथाओं पर तंज करते हुए खुद पर हंसते हैं।

हमारे यहां एक मुहावरा चलता है कि इसमें फागुन घुस गया है। इसके माने है कि जिसमें फागुन घुस गया दुनिया उसके जूते की नोंक पर है। मस्त रहो, खुलकर कहो। आप कुछ भी पूछिए, कोई बात का सीधा जवाब नहीं देता। वह तुक मिलाएगा। अश्लील या शालीन हास्य टिप्पणी करेगा। जब मै स्कूल के दिनों में हॉस्टल में था तो तीसरी क्लास में पढऩे वाले अमित ओर सुमित नाम के जुड़वा भाई भी हॉस्टल में रहते थे। एक सुबह किसी ने सुमित से कह दिया कि यार तेरे में फागुन घुस गया है। वह दौड़कर कमरे में गया। कपड़े उतारे, झाड़े लेकिन फागुन दिखाई नहीं दिया। वह मेरे पास आया। रोने लगा कि मेरे कपड़ों में फागुन घुस गया है। दिख भी नहीं रहा। वह मुझे काट लेगा। हॉस्टल के बच्चे हंस हंस के लोटपोट थे। अब उस बच्चे को यकीन दिलाना मुश्किल हो गया कि फागुन कुछ होता ही नही। सुमित का रोना नहीं थमा। वार्डन को उसने शिकायत की। वार्डन ने उसकी निशानदेही पर हम सबको हॉस्टल के बरामदे में कतार लगाकर खड़े होने को कहा ओर चपरासी से डंडा लाने को। दस मिनट बाद हम सबका फागुन वार्डन ने निकाल दिया था। सुमित को अब भी शक था कि उसके कपड़ों से फागुन अभी तक निकला नहीं।