रविवार, नवंबर 10, 2013

विजयदान देथा- गांव में रहने वाला वैश्विक लेखक

बिज्‍जी जैसे लेखक किसी भाषा में कई सालों में पैदा होते हैं। वे अपनी भाषा को बचाने के लिए मसीहा की तरह अपना काम करके चुपचाप चले जाते हैं। दुनिया में जब इस दौर के साहित्‍य की बात होगी तो बिज्‍जी की कहानियों का जिक्र जरूरी होगा।


-रामकुमार सिंह-
विजयदान देथा, जिन्‍हें प्‍यार से सब बिज्‍जी कहते हैं, उनका अब इस संसार में ना होना साहित्‍य के लिए ऐसा नुकसान है जिसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है। जैसे ओ हेनरी, मोपासां, प्रेमचंद, गोर्की आदि तमाम महान लेखकों का कोई विकल्‍प नहीं हो सकता, वैसे ही बिज्‍जी का कोई विकल्‍प मुमकिन नहीं है।
वे दुनिया के उन चुनिंदा महान लेखकों में हैं जिन्‍होंने लोक साहित्‍य और आधुनिक साहित्‍य के बीच एक बेहतरीन सामंजस्‍य बिठाया। उसे खूबसूरत किस्‍सागोई से समृद्ध किया। वे राजस्‍‍थानी के लेखक थे लेकिन उनकी पहचान वैश्विक थी। हिंदी में उनका लगभग पूरा साहित्‍य अनूदित है। उनके अनुवाद जब अंग्रेजी में पहुंचे तो वे साहित्‍य के नोबेल के लिए भी नामित हुए। उन्‍होंने इतना समृद्ध साहित्‍य हमारे लिए छोड़ा है कि आने वाली कई नस्‍लें राजस्‍थानी भाषा जानने के नाते इस बात पर गर्व करेंगी कि उनके साहित्‍य में विजयदान देथा हैं। जो जादुई यथार्थवाद (मैजिकल रियलिज्‍म) गेब्रियल गार्सिया मार्केज और दूसरे लातिनी अमरीकी लेखकों में देखा गया, लगभग उन्‍हीं के समकालीन बिज्‍जी वही जादुई यथार्थवाद  बिना शोर शराबे के अपनी राजस्‍थानी कहानियों में इस्‍तेमाल कर रहे थे। जहां उनके पात्र जानवरों से लेकर भूत प्रेत और लोक जीवन से तमाम किरदार रहे। वे ताउम्र अपने गांव बोरूंदा में रहे लेकिन उनकी सोच वैश्विक थी।
बिज्‍जी ने लोक जीवन की खूबसूरती और मासूमियत को अपने किस्‍सों में इस तरह पिरोया है कि हमें अपनी पूरी सांस्‍कृतिक विरासत पर नाज हो सकता है।
मैं उनसे जिस समय मिला, वे राजस्‍थानी कहावत कोश पर काम कर रहे थे। मैंने अपना परिचय जब नए कथाकार के रूप में कराया तो उन्‍होंने मेरी कहानियां पढ़ने की इच्‍छा जताई। मेरा दुर्भाग्‍य था कि मैं अपनी कहानियां उन तक नहीं भेज पाया। वे बेहद मिलनसार और‍ जिंदादिल थे।

उनकी कहानियों पर फिल्‍में भी बनी हैं। प्रकाश झा की परिणति बिज्‍जी की ही कहानी पर बनी थी और एक निजी बातचीत में झा इसे अपनी सर्वाधिक पसंदीदा फिल्‍मों में मानते हैं। उनकी दुविधा कहानी पर मणि कौल की दुविधा और अमोल पालेकर की पहेली बनी। यह हमारी युवा पीढ़ी का दुर्भाग्‍य है कि उन्‍हें अपने महान लेखकों तक पहुंचने के‍ लिए भी सिनेमा की सीढियों का सहारा लेना पड़ता है। पहेली के बाद पूरे देश की नई पीढी ने बिज्‍जी को पढा।
उनकी जिंदादिली का एक किस्‍सा जो उनके परिवारिक दोस्‍तों के जरिए ही मुझ तक पहुंचा, उनके हास्‍य बोध और विट का संकेत करता है। फिल्‍म पहेली की रिलीज के आस पास किसी कार्यक्रम में बिज्‍जी को शाहरूख खान की कंपनी ने मुंबई बुलाया था। वहां उनकी मुलाकात फिल्‍म के सदस्‍यों से भी कराई। बिज्‍जी जब लौटकर आए तो उनके पुत्र महेंद्र साथ थे। उन्‍होंने बताया कि बिज्‍जी को रानी मुखर्जी भी मिली थीं और उनसे मिलकर वह इतनी अभिभूत थी कि उसने बिज्‍जी को उत्‍साह से गाल पर किस किया। उनके दूसरे पुत्र कैलाश कबीर ने जब बिज्‍जी को छेड़ते हुए पूछा तो बिज्‍जी ने कहा, ‘हां, किया तो था लेकिन बीच में मफलर आ गया था।’
बिज्‍जी जैसे लेखक किसी भाषा में कई सालों में पैदा होते हैं। वे अपनी भाषा को बचाने के लिए मसीहा की तरह अपना काम करके चुपचाप चले जाते हैं। दुनिया में जब इस दौर के साहित्‍य की बात होगी तो बिज्‍जी की कहानियों का जिक्र जरूरी होगा।


बुधवार, जुलाई 17, 2013

मेरी नई और लंबी कहानी 'जय माता की' के कुछ अंश


बंदूक से गोली इस तरह चलती थी कि चलने के बाद लगता नहीं था कि बंदूक से गोली चल चुकी है। कुत्‍ता गोली लगने से गिर जाता था। ध्‍यान से नहीं देखो तो कोई कह नहीं सकता था कि वह गोली लगने से मरा है।

कुत्‍ता काटने के लिए पुजारी के पीछे दौड़ा था। पुजारी को पता था कि अंतत: कुत्‍ता उसे काट ही लेगा लेकिन फिर भी वह दौड़ता रहा। शायद वह यह देखना चाहता था कि वह कितना दौड़ सकता है। कुत्‍ता भी जानता था कि पुजारी में कितना दम है। वह अंतत: पुजारी को काट ही लेगा। दौड़ते हुए पुजारी हांफ गया। हांफने के बाद वह थम गया। कुत्‍ता भी हांफ गया था। पुजारी डर गया था। कुत्‍ता गुस्‍से से लाल हो रहा था। उसे गुस्‍सा इसलिए भी ज्‍यादा आया कि सब कुछ जानते बूझते पुजारी ने उसे नाहक दौड़ाया। अगर पुजारी सीधे सीधे रुक जाता तो वह सिर्फ एक जगह से काटकर उसे छोड़ सकता था, लेकिन अब चूंकि कुत्‍ता बहुत भाग चुका था। अब वह विजेता था तो उसने पहले पुजारी को एक पिंडली में काटा। पुजारी तो समर्पण कर ही चुका था। कुत्‍ते ने कोई दया दिखाए बिना दूसरी पिंडली पर भी अपने दांत गड़ा दिए और फिर चला गया। वह बोल पाता तो पुजारी से कहता कि अगर तुम भागते नहीं तो सिर्फ एक ही पिंडली पर कटवाने से काम चल जाता।
पुजारी की पिंडलियों में लाल मिर्च भर दी गई। जैसा कि लोग मानते थे कि लाल मिर्च भरने की वजह से घाव जल्‍द ठीक हो ना हो, कुत्‍ते के काटने से होने वाली पागलपन की बीमारी ठीक हो जाती है। पुजारी को जो पीड़ा कुत्‍ते के काटने से नहीं हुई, उससे कई गुना ज्‍यादा तकलीफ लाल मिर्च ने दी।
पुजारी बच गया था, उसे पागलपन जैसी बीमारी नहीं हुई, वरना वह कहीं का नहीं रहता। शायद यह बात ऐसे भी सच है कि पागलपन की बीमारी पुजारी के लगने से बच गई था, वरना पुजारी के लगने के बाद वह उस तरह की पागलपन की बीमारी नहीं रहती जिस तरह की बीमारी वह पुजारी के लगने से पहले थी।

जरूरी नहीं कि जो आदमी पूजा करता है, उसे झूठ बोलना नहीं आता हो। या जो झूठ बोलता हो उसे पूजा करनी नहीं आती। पुजारी के साथ ऐसा ही था। उसने कहा था कि ये कुत्‍ता जरूर कोई बुरी आत्‍मा वंशज रहा होगा। जिनकी जमीन पर कब्‍जा करके उसने मंदिर बनाने की पहल की थी, वो अपना घर छिनने से परेशान रही हो और उस आत्‍मा ने उससे बदला लिया हो। वरना पूरे गांव में उसने पुजारी को ही क्‍यों काटा ?
जरूरी नहीं कि पूजा करने से हर आदमी का मन पवित्र हो जाता हो। या जिसका मन पूरी तरह पवित्र हो उसमें बदला लेने की भावना नहीं आती हो। पुजारी के मन में कुत्‍ते के प्रति बदला लेने की भावना आ गई।
बदला लेने की भावना के बाद पुजारी को नींद कम आने लगी, वह रात को बदला लेने के भाव से खांसता रहता था। इसका सीधा फायदा पिताजी को हुआ, उनको खांसी कम आने लगी और नींद ज्‍यादा।


थाने में अब मंदिर था। मंदिर में पुजारी था। पुजारी में बदला था। बदले में कुत्‍ता था। कुत्‍ते में बुरी आत्‍मा नहीं थी। बुरी आत्‍मा में आत्‍मा नहीं थी।


रिवाज यह हो गया था कि आपने अच्‍छा किया है तो उसका शुक्रिया अदा करने के लिए आप मंदिर तक आएंगे। कुछ चढाएंगे। आपने बुरा किया है तो पश्‍चाताप के लिए मंदिर तक आएंगे। कुछ चढाएंगे। पुजारी के दोनों हाथों में लड्डू थे। मंदिर जोरदार डिटर्जेंट था जो लोगों के दामन पर लगे जिद्दी से जिद्दी दाग को धो देता था। लोग मंदिर इसलिए जाने लगे कि वे अपने दामन पर लगे दाग धो सकें। लोग इसलिए अपने दामन पर दाग लगाने लगे ताकि वे मंदिर जा सकें।

दुनिया गोल है। एक घूमचक्‍कर की तरह घूम रही है। यह बात सबसे पहले स्‍कूल के बच्‍चों को भूगोल के गुरूजी ने पढाई थी। बच्‍चों ने घर आकर बुजुर्गों को बताई तो कोई माना नहीं था। बच्‍चे भी असमंजस में थे जब कुछ भी घूमता हुआ नहीं दिखता तो धरती घूम कैसे रही है? फिर वे एक जगह खड़े होकर गोल गोल चक्‍कर खाने लगते। पूरी धरती घूमती हुई दिखती थी। हालांकि थोड़ी देर बाद वह घूमते हुए दिखना बंद हो जाती। बच्‍चों को लगता था कि धरती घूमती भी है और नहीं भी घूमती। अगर धरती घूमती है तो यह गांव भी घूमता ही होगा। यह गांव घूमता होगा तो कभी यह दिल्‍ली पहुंचता होगा और कभी दुबई। स्‍कूल के अध्‍यापक ने अजीब सा समीकरण दे दिया था और इसे सुलझाने के लिए सब लोग लगे रहते लेकिन सुलझ नहीं रहा था। जब गांव से खाड़ी देशों में मजूरी करने गए इंदरू से उसके ताऊ ईसर ने पूछा, ‘सुण्‍यो है दुनिया घूम री है चकरी की तरह, तनै दुबई में अपणो गांव दिख्‍यो कै।’

‘चाचा था नै के बुढ़ापै मांय सैर करणी है। घूमणै दो दुनिया नै घूम री है तो, कुण सो थारो भाड़ो लाग रयो है।’

‘बात भाड़ै की नहीं इंदरू, मैं देख रया हूं, पेड़ वहीं, घर वहीं, मातारानी को मंदिर वहीं, फेर मास्‍टर झूठ का पाट मेल रया है कि दुनिया घूम री है। मैं कह रयो हूं निकाळो मास्‍टर ने गांव सूं। ई पढाई की टाबरां नै जरूरत नहीं है।’


लेकिन ऐसी नौबत आई नहीं। जब मास्‍टर को गांव को निकालना पड़ा हो। एक दिन घूमती हुई दुनिया की घिर्री में कोई ऐसी फांस फंस गई कि जिस हिस्‍से में यह गांव था वह अचानक घूमना बंद हो गया। अब सिर्फ दुनिया घूम रही थी और यह गांव थम गया था। गांव ने देखा कि उनके सामने से दुनिया घू‍मती जा रही है। लग यूं रहा था कि जैसे दुनिया आगे जा रही है और गांव पीछे लेकिन हुआ यह था कि गांव वालों को महज यह भ्रम था। गांव तो फंसा हुआ वहीं खड़ा था। दुनिया जरूर या तो आगे जा रही थी या पीछे। अचानक गांव वालों ने देखा कि समरकंद चले गए हैं। किसी ने पहले यह जगह नहीं देखी थी। घीसिया नहीं होता तो गांव वालों के मुश्किल हो जाती। मास्‍टर जी उस समय अपने घर में सो रहे थे। पुजारी आंखें मूंदें मातारानी के मंदिर में मूर्ति के सामने घंटी हिला रहा था। समरकंद यूं ही निकल जाता लेकिन घीसिया गांव का प्रतिभावान लड़का था। वह अपनी कक्षा में पहले नंबर पर आता था। उसने बताया कि बा‍बर नाम का एक मुगल आदमी यहीं से भारत आया था, उसके बाद हिंदुस्‍तान में उसके बेटे हुमायूं और अकबर समेत कई राजाओं ने राज किया। पहले वे लोग यहीं हिंदुस्‍तान के छोटे छोटे राजाओं से लड़ते रहे। बाद में जब अंग्रेज आ गए तो इनमें कुछ लोग अंग्रेजों के साथ हो गए और कुछ ताउम्र उनसे लड़ते रहे। गांव वालों ने देखा, खूबसूरत पहाड़ी वादियां। जन्‍नत सी खूबसूरत जमीन। ईसर ताऊ बोले, ‘बाबरियो बावळो हो, आपणो गांव अठै होतो तो आपां कदै गांव नहीं छोड़ता। कांई आणा जाणी है, आपणै अठै भूख पड़ी है।’ इतना कहकर ईसर ताऊ यह कहते हुए समरकंद में कूदने की कोशिश करने लगै कि वे अब इसी खूबसूरत वादी में रहेंगे लेकिन उसी समय गांव वालों ने उन्‍हें रो‍क लिया, ‘ईसर, समरकंद अब वो नहीं रियो है, जो बाबर के टेम हो। उणका तो भाई उणनै लट़ठ मार के समरकदं सूं काढ्यो हो। तेरी तो गांव में इज्‍जत है। पाछो बैठ ज्‍या चुपचाप।’
ईसर बैठ गया। दुनिया घूमती रही। गांव थमा रहा। कभी रोशनी का ‘चिल्‍का’, कभी केले का छिलका, कभी अंधेरा गांव से गुजरता रहा। सुबह हो गई पुजारी पूजा करके बैठा था कि देखा, हर तरफ मंदिरों की घंटियों का शोर है। पुजारी ने ऐलान करते हुए कहा, ल्‍यो भई, अयोध्‍या आ गई। भगवान रामजी की नगरी। हणमानजी का मंदिर। सरयू का घाट और पूजा पाठ की जमीन आ गई।
देखते ही देखते एक हुड़दंग मच गया। कुछ भगवा से कपड़े पहने लोग जय श्री राम का नारा लगाते हुए चलती हुई अयोध्‍या से ठहरे हुए गांव में ऐसे कूद गए जैसे इस गांव में उनके बाप का राज हो। वे लोगों को पहले तो डराने धमकाने लगे और जब बात बनी नहीं तो उन्‍होंने बताया कि वे लोग चंदा इकट्ठा कर रहे हैं।
गांव वालों ने पूछा, ‘किस बात का चंदा इकट्ठा कर कर रहे हो ?’
‘तुम कैसे हिंदू हो, तुमको पता नहीं कि पूरे देश में राम मंदिर का आंदोलन चल रहा है। हम मंदिर वहीं बनाएंगे जहां अब मस्जिद बन गई है।’
‘मस्जिद है तो मंदिर क्‍यों बनाओगे ?’
‘उन्‍होंने हमारा मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई थी। अब हम यहां मस्जिद को तोड़कर मंदिर बनाएंगे।’
‘किसने बनाई थी मस्जिद? कब बनाई?’ ईसर ताऊ को बात समझ में नहीं आई।
‘बाबर ने। बाबर नाम का आदमी था। उसने यहां बहुत मंदिर तोड़े, बहुत सारी मस्जिदें बनाईं। उसने हमारे धर्म का बहुत नुकसान किया।’
‘यह कब हुआ ? ’ कहते हुए ईसर ताऊ ने घीसिया की तरफ बड़ी उम्‍मीद से देखा लेकिन घीसिया ने इनकार में सिर हिला दिया कि इतनी सब बातें उसने कभी अपनी इतिहास की किताबों की नहीं पढ़ी।
‘तो तुम उस वक्‍त क्‍यों नही बोले? जब उसने मस्जिद तोड़ी थी।’
‘क्‍योंकि उस वक्‍त वो राजा था। राजा से हमारी हमेशा फटती थी।’
‘अब राजा कौन है ?’
‘अब तो हमारे बाप का राज है? हम जो चाहेंगे करके दिखाएंगे। मर जाएंगे मिट जाएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। उस मस्जिद को ढहाएंगे।’
फिर अचानक भगवाधारियों ने ईसर को कहा, ‘ताऊ, बहुत वक्‍त खराब कर रहे हो। सवा रुपए में क्‍या जाता है?’ यह कहते हुए उन्‍होंने मीरासियों की तरह गाना शुरू किया, ‘सवा रुपया दे दे भइया कार सेवा के नाम का, राम के घर में लग जाएगा पत्‍थर तेरे नाम का।’
उनका बेसुरा सा गाना सुनकर पिताजी की आंख खुल गई। ईसर ताऊ उनके गाने से प्रभावित हो गए और उन्‍होंने जेब टटोलनी शुरू की ही थी कि पिताजी चिल्‍लाकर बोले, ‘ये कौन भिखारी गांव में घुस गए हैं। बाहर निकालो इन्‍हें।’
इतना बोलना भर था कि वे भगवा कपड़े पहने लोग गांव से बाहर कूदकर अयोध्‍या की तरफ भागने लगे। ठीक इसी क्षण घिर्री की फांस निकली और पूरी दुनिया के साथ गांव एक बार फिर घूमने लग गया।

मंगलवार, जुलाई 16, 2013

आम आदमी की अनंत संभावनाओं की कहानी


भाग मिल्खा भाग :



3.5/5 स्‍टार

 इस कहानी में इमोशन है, ड्रामा है, देशप्रेम है, तथ्यगत सच्चाई है। लेकिन इन सबसे ऊपर यह एक मामूली आदमी के अपने आप से लडऩे की कहानी है, जब वह इतनी बाधाएं पार करते हुए फलक पर नाम लिखता है। इस तरह मिल्खा की कहानी एक आम आदमी की अनंत संभावनाओं की कहानी है।

राकेश ओमप्रकाश मेहरा को हम 'रंग दे बसंतीÓ जैसी सार्थक और जानदार फिल्म के लिए जानते हैं। उनकी 'दिल्ली 6Ó भी खराब फिल्म नहीं थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस का फैसला कुछ अलग रहा। उनकी नई फिल्म 'भाग मिल्खा भागÓ भारत के मशहूर धावक मिल्खा सिंह के जीवन से प्रेरित है, जिसमें कुछ हिस्सा सिनेमाई जरूरतों के हिसाब से काल्पनिक भी है, लेकिन पूरी फिल्म एक प्रेरक किस्सा है। फिल्म देखते हुए मजा आता है।

यह फिल्म एक आम आदमी के नायक बनने की कहानी है। एक बच्चा, जिसने विभाजन के समय अपने माता-पिता को दंगों में मरते देखा और वह भागकर हिंदुस्तान आया। संघर्षपूर्ण बचपन के बाद वह सेना में दाखिल हुआ। इसके बाद जुनून लिए दौड़ता रहा, लेकिन यकायक कामयाब नहीं हुआ। वह हिम्मत नहीं हारता। मेलबर्न ओलंपिक की हार उसे इतना आहत करती है कि लौटते हुए विमान में जब सब सहयात्री सो रहे हैं, तो उसे नींद नहीं आ रही है। वह अपने कोच को जगाकर पूछता है कि चार सौ मीटर दौड़ का वल्र्ड रिकॉर्ड क्या है? कोच एयर इंडिया के पेपर नेपकिन पर उसे ४५.९ लिखकर देता है और एक दिन वह ४५.८ पर पहुंचकर वल्र्ड चैम्पियन बनता है। इस कहानी में इमोशन है, ड्रामा है, देशप्रेम है, तथ्यगत सच्चाई है। लेकिन इन सबसे ऊपर यह एक मामूली आदमी के अपने आप से लडऩे की कहानी है, जब वह इतनी बाधाएं पार करते हुए फलक पर नाम लिखता है। इस तरह मिल्खा की कहानी एक आम आदमी की अनंत संभावनाओं की कहानी है। एक विश्वसनीय कहानी है कि यह आदमी हमारे समय में पैदा हुआ, उसे हम देख सकते हैं, छू सकते हैं। यह एक आम आदमी के ऐसे सदमे से उबरने की कहानी है कि जिस पाकिस्तान से जान बचाकर बालक मिल्खा सिंह भागा था उसी पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल अयूब ने युवा मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख की उपाधि देकर कहा कि यह उपाधि देते हुए पाकिस्तान को गर्व महसूस होता है।
मिल्खा के दर्द और कामयाबी को पर्दे पर उतारने के लिए निर्देशक मेहरा और लेखक प्रसून जोशी की तारीफ बनती है। आंशिक शिकायतें हैं, लेकिन वे नजरअंदाज की जा सकती हैं। फरहान अख्तर कमाल कर रहे हैं। वे किरदार में रम गए हैं। पवन मल्होत्रा और योगराज सिंह जोरदार लग रहे हैं।

फिल्म की अवधि तीन घंटे के आसपास होने से वह थोड़ी लंबी तथा खिंचती हुई महसूस होती है। तीन घंटे की फिल्म होना गलती नहीं है। गलती यह है कि यह अवधि फिल्म की गति को प्रभावित करती है। प्रसून जोशी के गीत और शंकर-अहसान-लॉय का संगीत दमदार हैं। हां, वे 'रंग दे बसंतीÓ से उन्नीस ही हैं। पूरी फिल्म एक निहायत ईमानदार कोशिश है और इसकी छोटी-मोटी गलतियों की तरफ ध्यान देना अनुचित है। यह जरूर देखने लायक फिल्म है। हम सबके भीतर छुपे एक नायक को उद्वेलित करती है, उसे चुनौती देती है। हमें एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित भी करती है।
-रामकुमार ङ्क्षसह

शनिवार, जुलाई 06, 2013

लुटेरा: आखिरी पत्ती, हवा के झोंके और इश्क का नगमा



फिल्म समीक्षा
4/5 स्टार
फिल्म 'लुटेरा में बंगाल की पृष्ठभूमि में आजादी के बाद का कालखंड है। सरकार जमींदारी उन्मूलन कानून लाने की तैयारी मे हैं। मानिकपुर के जमींदार सौमित्र रॉयचौधरी के घर में वरुण श्रीवास्तव आता है। कोई दबी हुई सभ्यता की खोज में और उनकी इकलौती बेटी पाखी से उसे प्यार हो जाता है। ऐसा भी कह सकते हैं कि उनकी बेटी को उससे प्यार हो जाता है। वरुण के पास बड़ा सा खाली कैनवस है। वह उसपर मास्टरपीस बनाना चाहता है। बात दरअसल यह है कि उसे तो पत्ती भी बनानी आती नहीं। वह तो लुटेरा है। जमींदार साब की दौलत और उनकी बेटी का दिल लूट के चला जाता है। इस लूट की चश्मदीद है बाबा नागार्जुन की कविता 'अकाल और उसके बाद।
फिल्म दूसरे हिस्से में डलहौजी पहुंच जाती है, जहां वरुण फिर आता है अपना मास्टरपीस बनाने। पाखी जानती है कि वह एक लुटेरा है। एक तरह से उसके पिता का हत्यारा भी। एक आवेग में वह उससे नफरत करती है। इंसपेक्टर को फोन करती है। दूसरे ही आवेग में वह उसे माफ करती है। वह उसे सच्चा प्यार करती है। पाखी बीमार है। उसकी खिड़की से एक हराभरा पेड़ दिखता है। बर्फबारी के दिन हैं। पेड़ की पत्तियां झडऩी शुरू होती हैं। उसे लगने लगता है कि जब आखिरी पत्ती गिरेगी तो वह भी मर जाएगी। यह पूरा हिस्सा अंग्रेजी के मशहूर लेखक ओ हेनरी की कहानी द लास्ट लीफ से प्रेरित है लेकिन विक्रमादित्य ने इसे अपने ढंग से कहा है। यह सिर्फ कथा संकेत भर है। फिल्म इससे कहीं ज्यादा गहरी है। अपने कहानी कहने के ढंग में जहां इंटरवल तक तो आपको यह भी नहीं लगता कि पलक झपकाई जाए।
निर्देशक विक्रमादित्य अपने सिनेमाटोग्राफर महेन्द्र शेट्टी, साथी लेखक भवानी अय्यर और अनुराग कश्यप, संपादक दीपिका कालरा के साथ मिलकर रोमांस की एक नॉस्टेलजिक सी दुनिया रचते हैं। जिसके साथ आप बहते हुए चलते हैं। इतना सा डूबते हुए भी, कि पाखी और वरुण की फुसफुसाहटें सुनने के लिए अपनी सीट से आगे की तरफ अनायास झुकते हैं, जैसे सुनें तो, लड़का लड़की बात क्या कर रहे हैं? यह हिंदी सिनेमा के हौसले को सलाम करने का समय है। थियेटर से बाहर आने के बाद फिल्म के बिम्ब आपके जहन से जाते नहीं हैं।
रणवीर सिंह और सोनाक्षी सिन्हा ने इस फिल्म में बेहतरीन काम किया है। राउडियों और दबंगों की दुनिया से इतर यहां वो बेहद प्रभावशाली और स्वाभाविक लगी हैं। रणवीर सिंह जिस लो पिच पर अपने संवादों का निर्वाह कर रहे हैं वह उन्हें अलग धरातल पर ले जाता है। अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म के साथ चलता है। धन्यवाद निर्माता अनुराग कश्यप, विकास बहल, शोभा कपूर और एकता कपूर को भी। मनोरंजक फिल्म बनाने के दावे करने वाले निर्माता निर्देशक आपसे कहते हैं अपना दिमाग घर छोड़कर आइए। ऐसे दर्शकों से आग्रह है कि वे कभी अपने दिल और दिमाग को भी अपने साथ फिल्म दिखाएं। कब तक उन्हें बाहर छोड़ते रहेंगे।

मंगलवार, अक्टूबर 02, 2012

मेरी नई कहानी बाचीज: ए अत्‍फाल का एक छोटा अंश

हाल ही नई कहानी लिखकर पूरी की है। उसके कुछ अंश आप प्रिय पाठकों के लिए प्रस्‍तुत हैं। पूरी कहानी के लिए आपको एक बार इंतजार करना होगा। 



"" एक दिन बूढे़ प्रधानमंत्री ने लाल किले से खुश होकर कहा कि चूंकि अब हमारा पेट ऊपर तक भर गया है। इसलिए सीधे सीधे कुछ खाना मुमकिन नहीं है। अब दूसरे तरीके से कुछ और खाएंगे और जनता को खिलाएंगे। अब हर स्‍कूल आने वाले बच्‍चे को हर महीने दस सेर गेहूं मिलेगा। वो पढाई के लालच में भले ही ना आए लेकिन उसके घर वाले गेहूं के लालच में जरूर पढ़न
े भेजेंगे। सरकार की ओर से बंटने वाली इस ‘खैरात’ में पहले बच्‍चे को तौलकर अनाज दिया जाने लगा। इस तुला में भी वही खूबी थी, जो इस देश के बनियों, ठेले, सब्‍जीवालों की सारी तुलाओं में होती थी। यह कमबख्‍त कम तौलती थी। दस सेर की जगह आठ सेर तौल दिया। बच्‍चे तो बच्‍चे थे, शिकायत करते तो यह तुला उन्‍हें डांट देती थी कि जितना मिल रहा है, उतना क्‍या कम है? यह तो मुफ्त का माल है और इसमें भी तुम्‍हें पूरा तौल चाहिए। बच्‍चे चुप करा दिए गए। बचा हुआ गेहूं विद्यालय के अध्‍यापकों के घर जाने लगा। जब उनकी पत्नियों ने आपत्ति जताई कि इस गेहूं की रोटियां बनने के बाद ज्‍यादा काली दिखती है तो मेघ सिंह ने अपने उपलब्‍ध ज्ञान के आधार पर कह दिया कि यह सरकारी गेहूं है। इसमें आयरन ज्‍यादा है।
सच बात तो यह थी कि इस देश में खूब भुखमरी के बावजूद सरकार के पास गेहूं इतना ज्‍यादा हो गया था कि रखने के लिए जगह ही नहीं बची थी। वह धूप में तपता था। बारिश में भीगता था। बाढ में बहता था। आग में जलता था। इसके बावजूद सरकारी अफसरों ने सरकार तक यह खबर भिजवाई कि सब हादसों और आपदाओं के बावजूद गेहूं बहुत बच गया है। हम भी कितना खाएंगे। हमारा भी पेट भर गया है। यह गेहूं भीग भी गया है। इसे अब देश के स्‍कूलों में बंटवा दो।
मेघ सिंह की आयरन वाली दलील को पहले तो उसकी पत्‍नी ने मान लिया लेकिन जब रोटियों में स्‍वाद ही गायब मिलता रहा तो उस गेहूं का दलिया पीसकर उसने अपनी बकरियों का खिलाना शुरू कर दिया। बकरियां मौन थी। वे ना प्रधानमंत्री को शिकायत कर सकती थीं ना मेघ सिंह को। बस चबर चबर गेहूं का दलिया चबाती।
उस दौर में गांव में सबसे ज्‍यादा खुश वे बकरियां ही थीं जिन्‍हें सरकारी गेहूं भी खाने को मिलता था और पढ़ना भी नहीं पड़ता था।
एक दिन खेत में चरते हुए सरपंच की बकरियों से मेघ सिंह की ब‍करियों की मुलाकात हुई। उनकी खूबसूरती देखकर सरपंच की भूरती बकरी ने मेघ सिंह की चितकबरी बकरी से पूछा,
‘बहन, बहुत सुंदर हो गई हो इन दिनों। राज क्‍या है ?’
चितकबरी ने कहा, ‘क्‍या बताऊं बहन, आजकल चारे के साथ जोरदार अनाज भी मिलता है। तुम जानती हो, खेत में उगने वाले गंवार से तो मुझे मोटे होने का खतरा था लेकिन यह तो सरकारी गेहूं है, धुला हुआ एकदम। इसमें प्रोटीन कुछ ज्‍यादा ही लगता है। फिर मुफ्त का है तो जब त‍क मेरा पेट नहीं भर जाता तब तक मालकिन बर्तन हटाती नहीं है। मुझे तो खेत में सिर्फ चहलकदमी के लिए आना होता है। वरना खाने पीने की तो घर में कमी नहीं है बहन। मैं तो दुआ करती हूं कि अगले जन्‍म में भी भगवान अगर ठीक समझे तो मुझे सरकारी मास्‍टर के यहीं बकरी बनाकर भेजे।’ ""


शुक्रवार, सितंबर 07, 2012

मेरा गांव जो मेरी रूह में जो बसा हुआ है


साहित्यिक पत्रिका कुरजां का दूसरा अंक गांव पर केंद्रित है और बाजार में आ गया है। इसमें मैंने मेरे गांव के बारे में एक लेख लिखा है। यहां उपलब्‍ध है, आपका मन हो तो पढें। 

                                             पिताजी  के साथ मैं अपने गांव के घर में

बात उस समय की है जब मैं चौथी क्लास में था। अपने चचेरे भाई गोकुल के साथ खेत से लौट रहा था। पीठ के थैले पर झाड़ी के बेर थे जो हम अकसर अपनी जेबों में भरकर स्कूल में ले जाया करते थे। घर पहुंचने से ठीक पहले ही गायों के एक झुंड से एक गाय तेजी से हमारी तरफ दौडऩे लगी। मैं छोटा था, गोकुल ने हाथ पकडक़र मुझे खूब दौड़ाया लेकिन उसी समय गाय की भेठी उसकी पीठ पर थी। मेरा हाथ छूटा। मैं झटके से आगे गिरा। गोकुल गाय की टांगों में गिरा और वहां से उठकर निकल भागा। अब मैं पूरी तरह गाय के हवाले था। वह शेरनी की तरह मुझ पर टूट पड़ी थी। जैसे तैसे बचा गोकुल मदद के लिए चिल्ला रहा था। जब तक पड़ोस में रहने वाली सुबीरा गोकुल की आवाज सुन मदद के लिए लाठी लेकर आई, गाय ने मेरा कचूमर निकाल दिया था। मेरे रोम रोम से लहू बह रहा था। सिर फट गया था। जिसने मुझे पकड़ा वही खून में रंग गया। घर लाकर पानी से मुझे धोया जा रहा था और रिसाव वाली जगहों पर कपड़े बांधे गए और सब दौड़ पड़े गांव के अस्पताल की तरफ। सारा गांव इकट्ठा था। गांव वालों में मेरे पिता की उम्र के भल्लू राम भी थे। वे गांव की सारी उपलब्ध गालियां गाय के मालिक को दे रहे थे। मां बहन एक कर दी थी उन्होंने गाय के मालिक की। मैं इकलौता बच्चा था और सारे गांव वालों समेत भल्लूराम को भी लग रहा था कि मैं बचूंगा नहीं, लिहाजा उन्होंने गालियों का डोज बढा दिया था। वे गालियां देते हुए थककर चुप होते इससे पहले ही अपराधी गाय की छानबीन करने गए आदमी ने आकर कहा, यार भल्लू गाय तो तेरे वाली है जिसने मारा है। भल्लू राम अचानक चुप हुए। फिर धीरे से बोले, आ कैंया होगी, म्‍हारळी गाय तो मारया ही कोनी करै।(यह कैसे हुआ, मेरी गाय तो मारती ही नहीं है।)
इस घटना के बाद स्कूल में जब भी मास्टर जी बोलते थे कि गाय हमारी माता है। तो कभी उनसे सहमत नहीं होता था।
यह मेरा गांव बिरानियां है। राजस्थान के सीकर जिले में फतेहपुर के पास। जिसमें पैदा होने और होश संभालने के बाद मेरी पहली ख्‍वाहिश थी कि अपने घर में नल होना चाहिए क्योंकि स्कूल के ठीक सामने कुंआ था। मां पिताजी खेत में हुआ करते थे। यह मेरी ही नहीं मेरे जैसे कई बच्चों की परेशानी थी कि कुएं पर हलचल दिखते ही हमें लगता था कि गुरुजी से आधे घंटे की छुट्टी लेनी पड़ेगी। हमें पानी भरना होता था। पांच लीटर का डिब्बा लेकर हम घर से कुएं के बीच चक्कर लगाते थे। कई बार नन्हे हाथों से वह छूटकर गिरता था और पीछे से आ रहे बुजुर्ग गुस्से से गाली देते थे कि पानी व्यर्थ बहा दिया। वे यह नहीं पूछते थे कि गिरने से चोट तो नहीं लगी। यानी गांव में जीने का पहला सबक यही है कि जितने जल्दी स्वावलंबी बनो अच्छा है और नंबर दो बात जब संसाधनों की दुरुपयोग की है तो आपसे कोई सहानुभूति नहीं। आपकी चोट तो ठीक हो सकती है लेकिन आपकी लापरवाही से जो पांच लीटर पानी चला गया, वह तो व्यर्थ ही हुआ ना।
इसका मशहूर किस्सा भी है। गांव की बस से शहर जा रहे ताऊ बस की खिडक़ी में पैर टिकाकर खड़े थे कि सामने आ रही कंटीली झाड़ी देखकर कंडक्टर ने चेताया कि ताऊ, थोड़ा तिरछा रहणा वरना पीठ फट जाएगी और ताऊ का जवाब आता है, पीठ फट जाए दुख नहीं यार, कमीज नहीं फटणी चाहिए

गाय के हमले से घायल होने के बाद मैं फतेहपुर के अस्पताल से लगभग मौत के मुंह से निकलकर आया था तो जिस ऊँटगाड़ी में मैं गांव लौटा था उसी में कुछ पाइप जैसा कुछ सामान था और गांव पहुंचने पर पता चला कि पाइपलाइन डल गई है। नल अब हर घर में होगा। मुझे अब पानी भरने के लिए कुएं पर नहीं जाना होगा। यह सन 1984 की बात है।
चूंकि यह पानी की सप्लाई ट्यूब वेल से हुई थी तो गांव के एक हिस्से में बिजली भी घुस गई थी और उसका सीधा संबंध मेरी दूसरी इच्छा से था।
पिताजी ने एक लैंप लाकर दी थी। मिट्टी का तेल उन शायद आसानी से मिल जाता था। राशन में आता था। लैंप की रोशनी चिमनी से बेहतर होती थी और मैं ही नहीं मेरे आस पास के पड़ोसी बच्चे भी उस बेहतर रोशनी के लालच में मेरे यहीं पढऩे आते थे। गर्मियों में घर की छत पर बीचों बीच लैंप रखी जाती और उसे चारों और हम लोग घेरा बनाते थे, जब तक मन होता पढते थे और उसके बाद वहीं सो जाते थे। गांव के दूसरे हिस्से के कुछ बच्चों के घर में बिजली आ गई थी हालांकि बहुत से परिवार अब भी ऐसे ही थे कि वे बिजली का खर्च वहन नहीं कर सकते थे इसलिए तार खंभे से डालकर चोरी करते थे। उनके बच्चे थोड़ी हेकड़ी से हमारे मोहल्ले वाले बच्चों को देखते और यह रौब झाड़ते कि वे अब बिजली में पढ़ते हैं। हमने अपने हीनताबोध से निकलने का उपाय यह निकाला था कि सरकारी मेहरबानी से बिजली बहुत ही कम आती थी। उन बच्चों को बिजली के टाइमटेबल के हिसाब से चलना होता था। हम अपना टाइमटेबल खुद बनाते थे जिसमें सबसे ऊपर यह लिखा जाता था कि प्रात: साढे पांच बजे उठना। पांच से साढे पांच नित्य कर्मों से निवृत्ति (हालांकि ऐसा कभी होता नहीं था, इतनी सुबह हाजत ही नहीं होती थी लेकिन गुरुजी का दबाव ऐसा था कि उठने के बाद शौचादि से निवृत्त होने के बाद ही अध्ययन करो तो याद रहता है) और बाद में जो भी गणित अंग्रेजी विज्ञान आदि पढने का कार्यक्रम बनाते थे। बिजली बाले बच्चे हमारी तरह स्वतंत्र नहीं थे। हम जब भी जागें तभी लैंप जलाएं और पढना चालू।
इसी के समांतर मेरी तीसरी इच्छा जुड़ी हुई थी। जब भी मुझे ननिहाल जाना होता था तो गांव से तीन किलोमीटर दूर से एक बस पकडऩी होती थी। बचपन में मां गोद में लिए चलती थी लेकिन जब वजन कुछ भारी हुआ तो पैदल ही चलाती थी। बहुत जोर आता था बस तक पहुंचने में। मेरी इच्छा यह थी कि फतेहपुर जाने के लिए गांव से ही बस जानी चाहिए लेकिन मैं इच्छा ही रख सकता था। सरकार या प्राइवेट बस आपरेटर्स को यह ज्ञापन नहीं दे सकता था कि हमारे गांव से बस चलनी चाहिए।
और वे सचमुच सुकून देने वाले दिन थे जब एक दिन ट्रेक्टर में भरकर सफेद लंबे बिजली के खंभे हमारे मोहल्ले में उतरे। बिजली विभाग वाले लोगों का इंतजार किए बिना गांव के युवाओं ने अपने हिसाब से नापकर गड्ढ़े खोदे। हमारे गांव के हनुमान बिजली विभाग में लाइन मैन थे और उन्हीं के सलाह मशवरे से खंभे खड़े हो गए। बिजली वाले उन पर तार खींच गए। बिजली के कनेक्शन हुए और घर के कमरे में जब पहला लट्टू जला था तो मैं बहुत खुश हुआ था।
उसी दौरान हमारे पड़ोसी गांव के एक आदमी ने बस खरीदी थी और उसे भैरजी नामक ड्राइवर चलाते थे। उनकी प्रतिष्ठा ऐसी ही थी जैसे वे बोइंग विमान चला रहे हों। और तो और हममें से ज्यादातर बच्चों ने अपने करियर का पहला सपना देखा था कि हम बड़े होकर बस ड्राइवर बनेंगे। क्योंकि यह सबसे आनंददायी काम लगता था। हम बच्चे रोज सवारियां गिनते थे क्योंकि बस ट्रायल पर चली थी कि पंद्रह बीस दिन में यदि सवारियों से खर्चा ना निकला तो बस बंद हो जाएगी। हम बच्चे दुआ करते थे कि ऐसा ना हो। हम लोग बनावटी ड्राइवर कंडक्टर को खेल खेलते थे। कागज की पन्नियां फाड़क़र किराया वसूलते थे और चूंकि हमें सुबह शाम एक बार बस देखने को मिलती थी तो हम इंतजार करते थे कि कब आएगी और उसे देखने के लिए उतने ही उत्सुक रहते थे जैसे कोई चिडिय़ाघर में पहली बार शेर देखने के लिए उत्सुक रहता है।
बस में सवारियां होने लगी थी और तय हो गया कि बंद नहीं होगी। बल्कि उसके फेरे एक से दो हो गए।
लेकिन फिर भी एक दिक्कत थी। मई जून में तेज आंधियां चलती थी। बस के रास्ते खोखले से हो जाते थे। उसके पहियों वाली जगह मिट्टी भर जाती थी। उन दिनों बस नहीं चला करती थी। दिन इतने गर्म हुआ करते थे कि शरीर में खून तक उबलने लगता था। शामें ठीक होती थीं और रातें बेहद शीतल अहसास देने वाली। इन्हीं दिनों में मूंज की कुटाई होती थी और मोहल्ले के बीचों बीच रखी एक चौकी पर कोई ना कोई छोटी छोटी पूळियों को कूटता था और भरी दोपहर मोगरी की आवाज आती रहती थी। एक आदमी को दिन भर मेहनत के बाद कोई एक या दो पूळी कूट पाता था जिसमें वह पसीने से लथपथ हो जाता था। फिर एक दिन दूसरे गांव से आए एक मेहमान ने बताया कि सडक़ आने के बाद से उनके गांव में यह आराम हुआ कि बारहों महीने बस चलती है। मिट्टी में लोकल गाडिय़ां भी नहीं फंसती। गांव का दूध और अन्य सामग्री शहर में बेची जा सकती है और तो और मूंज कूटने की जरूरत नहीं पड़ती। बस सडक़ पर पूळी डाल दो और बार बार आती जाती बसों और गाडिय़ों के पहियों के नीचे वह वैसे ही तैयार हो जाएगी। मेरी चौथी इच्छा अब ये हो गई थी कि गांव में सडक़ आ जाए।
देखते ही देखते गांव के एक हिस्से में सडक़ का शुरू हुआ लेकिन फतेहपुर बारह किलोमीटर था और सडक़ बनने के बाद वह अठारह किलोमीटर दूर हो गया क्योंकि सडक़ कई गांवों से घूमते हुए हमारे गांव में पहुंची थी। लिहाजा उस सडक़ का इस्तेमाल बहुत ही कम होता था।
एक दिन हमारे इलाके के सांसद गांव में किसी के यहां आए। यह जून की कोई दोपहर थी। वे शहर से सीधे लग रहे रास्‍ते से आ रहे थे, जहां सड़क नहीं थी। उनकी कार एक टीले में फंस गई। उनके साथ मौजूद चार पांच लोगों ने लाख कोशिश कर ली गाड़ी टस से मस नहीं हुई। उसी समय शहर से गांव आने वाली बस आई और लोगों ने देखा कि सांसद की गाड़ी फंसी है। सबने कहा, आप बस में बैठिए, आपकी गाड़ी को गांव के युवा लोग निकाल लाएंगे। इनका अभ्‍यास है। प्यास से बेहाल और पसीने से लथपथ एमपी साब ने गांव वालों से शिकायत की कि ये रास्ते की क्या हालत कर रखी है? तो उल्टे गांव वालों ने कि रास्ता खराब कहां है? आपने कितनी अच्छी सडक़ बनवाई है? हम तो रोज ऐसे ही आपकी बनवाई सडक़ का सुख लेते हैं? आप एक दिन में ही उकता गए़? सांसद बेहद शर्मिन्दा थे और अगले पंद्रह दिन में गांव से शहर को जोडऩे वाली सीधी सडक़ का काम शुरू हो गया था। फिल्‍म भोभर में एक दृश्‍य भी हमने ऐसा ही रचा था जिसमें एमएलए की जीप मिट्टी में फंस जाती है।

और सडक़ बनने के बाद तो वहां सब कुछ तेजी से बदलने लगा। उस गांव में जहां मैं पैदा हुआ, लगभग वो सब अब आने लगा जो शहर के लोगों को नसीब था। कुछ दुकानों पर ताजा सब्जियां और फल, लोगों के घरों में अपने निजी वाहन। युवाओं में खासकर मोटर साइकिल लोकप्रिय होने लगी। धीरे धीरे गांव की दुकानों में बाजार घुसने लगा। दही और छाछ से सिर धोने वाली गांव की नव यौवनाएं अब शैम्‍पू की मांग करने लगीं। दूध ओर छाछ पीने वाले किशोर और युवा दुकानों से पेप्सी और कोका कोला पीने लगे। कुर्ता पायजामा और गांव के दर्जी से कपड़े सिलवाकर पहनने वाले युवा अब जींस की पेंट और टी शर्ट के उपभोक्ता हो गए। उनके मुंह में गुटखा आ गया और जेब में सिगरेट को पैकेट। शाम ढलते ढलते वे ठेके की तरफ जाते थे और देसी शराब से इतर वे अंग्रेजी पीने लगे। यह उनके जेब के बूते की बात नहीं थी लिहाजा कोई नहीं जानता था कि उनके पास यह पैसा आ कहां से रहा है। मैंने लगातार देखने की कोशिश की लेकिन समझना मुश्किल था। वे छोटे मोटे अपराध करने लगे। कुछेक लोग हरियाणा से शराब लाकर बेचने लगे ओर मैंने देखा पहली बार हमारे गांव को कोई युवक चोरी के आरोप में भी पकड़ा गया। बाद में एकाध लोग अवैध शराब के धंधे को लेकर भी पकड़े गए। अपने गांव को लेकर इस तरह की इच्छाएं कभी नहीं की थीं।
बारिश के दिनों में जब गांव भर का पानी बहकर एक जगह तालाब सा बना लिया करता था, वह जगह हम किशोरों और गांव की भैंसों में समान रूप से लोकप्रिय थी। बेखौफ वहां स्‍नान होता था। अब बहते नाले में नहाना मुमकिन नहीं। वो गंदा हो गया है। उसमें प्‍लास्टिक और कांच की बोतलें इतनी होती है कि घायल होने के खतरे हैं। हमारे दौर के कितने ही बच्‍चे नंगे पांव स्‍कूल जा सकते थे लेकिन अब रास्‍ते सुरक्षित नहीं है। हां, गंदगी शहरों के मुकाबले अब भी कम है।

मुझे याद है फागुन के दिनों में लगभग पूरे महीने ही जश्‍न का माहौल होता था। बाद में वह सिमटकर पंद्रह दिन पर आया और एक दौर ऐसा आया जब वह लगभग बंद ही हो गया था। पिछले तीन चार साल में युवाओं ने एक नवयुवक मंडल बनाया और होली के आयोजन को वापस एक हफ्ते के जश्‍न तक ले आएं हैं लेकिन आश्‍चर्यजनक रूप से गांव को सबसे बड़ा निवेश इन दिनों में एक मंदिर पर हुआ। लोग कहते हैं करीब डेढ करोड़ रूपए इसमें खर्च हुए हैं। मैंने जब भी अपने परिवार से इतर इस निवेश को लेकर लोगों से बात करने की कोशिश की तो लोग नाराज हुए। यह एक दुर्गा मंदिर है और ग्रामीण इलाके में सबसे भव्‍य दुर्गापूजा हमारे गांव में होने लगी है। मैंने कितनी ही बार कहा कि ये पैसा सबको मिलकर एक लाइब्रेरी में लगाना चाहिए, जो गांव के युवाओं के काम आएगा। लेकिन कोई नहीं सुनता। ऐसी अंधी आस्‍था बुजुर्गों में कभी नहीं थी। हां, मंदिर थे। एक पुजारी पूजा भी करता था लेकिन दो चार पांच लोगों के अलावा कोई भी मंदिर जाता नहीं था। सिर्फ त्‍योहार के वक्‍त ही भीतर जाना होता था लेकिन अब यह बढ गया है।
गांव के बहुत से युवा कमाने के लिए गांव छोड़ रहे हैं। ज्‍यादातर लोग खाड़ी देशों में काम कर रहे हैं। जो पढ लिख गए वे अध्‍यापक हो गए हैं और कुछ लोग सेना में नौकरी कर रहे हैं। सारे समर्थ लोगों में आजकल एक ही होड़ है कि वे निकटवर्ती कस्‍बे में प्‍लॉट खरीद लें। उन्‍हें रहने के लिए अब शहर की जरूरत होने लगी है जबकि अब गांव में सब कुछ है। सड़क, पानी, टेलीफोन, इंटरनेट ब्रॉडबैंड, डीटीएच आदि। एक अस्‍पताल भी है और वहां डॉक्‍टर के रहने का दबाव गांववालों ने ही बनाया है। कुछ लोग निवेश के लिए शहरों में जमीनें खरीद रहे हैं।
जब से नरेगा नाम की सरकारी योजना आई है तो चीजें और भी स्‍पष्‍ट हो गई हैं। अब गांव में ही रहने वाले के लिए रोजगार उपलब्‍ध है। मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि पढाई लिखाई और जागरूकता चीजें ठीक करती हैं और लोग अपने हक के लिए खड़े होने लगे हैं। पूरे पांच साल चुनाव में शक्‍ल ना दिखाने वाले एमएलए या एमपी से वे सीधे जबावतलब करते हैं। अपनी जरूरत के मुताबिक अपने गांव में काम कराते हैं। हालांकि इस प्रक्रिया का बहुत बड़ा नुकसान भी राजनीति ही करती है। अगर आपकी पार्टी का सरपंच नहीं है तो आपके काम होने में जोर आता है ओर आपका सरपंच आ गया तो आप दूसरों को कीड़ा मकोड़ा समझने लगते हैं।
बहरहाल तमाम गुण दोषों के बावजूद मैं याद करता हूं एक ऐसे गांव को जहां सब चेहरे एक दूसरे के जाने पहचाने हैं। जहां जन्‍म, शादी और मरण तक सब आपके साथ खड़े नजर आते हैं। उन लोगों की महत्‍वकांक्षाएं बहुत बड़ी नहीं हुई हैं। हां, मेरे गांव के लोग अब हिरण नहीं है जिनका आसानी से शिकार किया जा सके, लेकिन वे भेडि़ए भी नहीं बन पाएं हैं कि बेगुनाहों का बेहिचक शिकार करें। मेरे जीने का आदर्श और जो सबसे बड़ी इच्‍छा यह है कि उस गांव के लिए कर सकूं, जिसने मुझे पाला पोषा, प्‍यार दिया। मैं उन बड़े होते बच्‍चों को वही मासूमियत बख्‍श सकूं जो मेरे बुजुर्गों ने मुझे बख्‍शी। मैं उनको उसी समर्पण भाव से पढा सकूं जैसे सरकारी स्‍कूल के शिक्षक पढाया करते थे। अब तो पूरे गांव के लोगों में यही भाव आ गया है कि जो ज्‍यादा पैसा लेता है, वह ज्‍यादा अच्‍छा पढाता है, जबकि मैं यह जानता हूं कि यह सच नहीं है। पूरे खराब शिक्षा तंत्र की कीमत मेरा गांव भी चुका रहा है। मैं इतना समर्थ बन सकूं कि मैं अपने गांव को बचा सकूं। हालांकि यह उतना ही मुश्किल है जितना बाजार से खराब हुई दुनिया को बचा पाना। लेकिन उम्‍मीद मेरी टूटी नहीं है, क्‍योंकि करीब दो दशक एक बड़े शहर में रहने के बावजूद मेरी रंगों में मेरा गांव ही बहता है। वह मेरी रूह में बसा हुआ है। मेरी सारी ऊर्जा का स्रोत वही है। वही मेरा सूरज है। वह डूब भी रहा है तो मुझे यकीन है एक दिन फिर उगेगा। आमीन।




गुरुवार, मई 03, 2012

हमारी फिल्‍में, हमारे दर्शक


हिंदी सिनेमा के लिए आज सौवां साल लग गया है। अब भी ये उतना ही ताजा और जवान लगता है। हमारे सिनेमा और हमारी जिंदगी का रिश्‍ता क्‍या है।


-रामकुमार सिंह
हॉलीवुड की नकल पर बॉलीवुड कहे जाने वाले हमारे हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता की कहानी अजब गजब है। फ्रांस के लुमियर बंधुओं की बनाई दुनिया की पहली फिल्‍म के करीब डेढ दशक बाद भारत में दादा फाल्‍के ने भारत की पहली फिल्‍म बनाई। जिस फ्रांस से फिल्‍में बनाना दुनिया ने सीखा, अब वह दुनिया की फिल्‍म इंडस्‍ट्री का केंद्र नहीं है लेकिन जिस मुंबई में भारत की पहली फिल्‍म बनी वह फिल्‍म इंडस्‍ट्री का महत्‍त्‍वपूर्ण केंद्र है। संख्‍यात्‍मक लिहाज से हम हॉलीवुड से भी ज्‍यादा फिल्‍में बनाते हैं। हॉलीवुड ने पूरी दुनिया के सिनेमा पर हमला करते हुए अपना वर्चस्‍व बनाया, लेकिन हमारे यहां आज भी ब्लॉकबस्‍टर होने वाली फिल्‍म तो भारतीय ही होती है।
हम भारतीयों के लिए सिनेमा का मतलब है,‍ कथा ि‍फल्‍में यानी ि‍फक्‍शन। हमारे यहां डॉक्‍यूमेंट्री या सिनेमा की दूसरी विधाएं मुख्‍यधारा में लोकप्रिय हो ही नहीं पाईं। हमारी फिल्‍मों में नाच गाना भी एक मौलिक खोज है। हमारा नायक एक तरफ अन्‍याय के खिलाफ संघर्ष की आवाज बुलंद करता है, दूसरे ही दृश्‍य में वह अभिनेत्री के सामने ठुमके लगाते हुए प्रेम गुहार कर रहा होता है। हॉलीवुड स्‍टार ब्रेड पिट ने अपने एक साक्षात्‍कार में कहा कि मुझे भारतीय अभिनेताओं से ईर्ष्‍या है क्‍योंकि वे इतना सब कुछ एक ही फिल्‍म में कर सकते हैं जो करने में अभिनेता होने के नाते वे खुद को अक्षम महसूस करते हैं।
हिंदी के मशहूर अभिनेता और निर्देशक राजकपूर कहा करते थे कि हिंदी सिनेमा के लिए गीत संगीत जरूरी है क्‍योंकि लोगों के जीवन में इतना रुखापन है कि वे उनके लिए नाच गाना एक बेहतर मनोरंजन का जरिया है।
इसमें सच्‍चाई भी है, हिंदी सिनेमा ने प्रारंभिक दिनों में केवल मौलिक कहानियां रची और बेहद लोकप्रिय हुई। जब बोलती फिल्‍में नहीं आई थीं तब भी थियेटर में संगीतकार लोग दृश्‍य की जरूरत के हिसाब से लाइव संगीत बजाया करते थे। सत्‍तर के दशक में समांतर सिनेमा के दौर के बावजूद बहुसंख्‍यक भारतीय दर्शकों का व्‍यावसायिक सिनेमा के साथ अंतरंग जुड़ाव रहा। साथ ही एक पूरी पीढ़ी सिनेमा को हिकारत के भाव से देखती रही है। वे अपनी संतानों को सिनेमा दिखाने से परहेज करती रही है। प्रारंभिक दिनों में तो लड़कियों का सिनेमा में काम करना तक वर्जित रहा है और महिलाओं के पात्र पुरुष ही अदा करते थे। दरअसल सिनेमा भारतीय समाज के स्‍वयं के अंतरविरोधों का ही प्रतिबिंब है। आईने के सामने माताएं मधुबाला की तरह दिखने की कोशिश करती रहीं और अपनी लड़कियों को सिनेमा देखने से रोकती रहीं। हमारी सरकारों का रवैया तो अब तक भी यही है। जो फिल्‍म श्रेष्‍ठ अभिनय का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार हासिल करती है, उसे टीवी पर दिखाए जाने से रोक देती है। आज भी हमारे स्‍कूली बच्‍चे कक्षाएं बंक करके सिनेमाघरों में स्‍कूल बैग लटकाए पाए जाते हैं क्‍योंकि उनके लिए सिनेमा देखना एक तरह से विद्रोह का प्रतीक है। आज भी हमारे स्‍कूली पाठ्यक्रमों में कविता, कहानी, चित्रकला, संगीत आदि जरूरी हिस्‍से हैं लेकिन फिल्‍म रसास्‍वाद का कोई पाठ्यक्रम नहीं है। नतीजा यह है कि सिनेमा के बारे में आज भी एक पूरी पीढ़ी आधा अधूरा सा ज्ञान रखती है। आज भी हमारे सुपर सितारे अर्थहीन सिनेमा बनाकर करोड़ों कूटते हैं, आज भी सिनेमाघरों की बत्तियां बंद होते ही भारतीय दर्शक यह अपेक्षा करता है कि फिल्‍म में कुछ ऐसा आ जाए कि पिछले छह महीने से महंगाई के दौर में जूझते हुए उसकी यातनाओं को वह भूल जाए। कुछ कॉमेडी हो, कुछ नाच हो, आयटम सॉन्‍ग हो, एक आध धमाकेदार दृश्‍य हों। दो ढाई घंटे बाद थियेटर में जब वापस बत्तियां चालू हों तो उसके चेहरे पर सिर्फ इतनी ही तृप्ति आ जाए कि फिल्‍म पैसा वसूल थी। हालांकि इस भारतीय दर्शक की भीतरी तृप्ति को पकड़ पाने में सौ साल बाद भी हमारा सिनेमा कामयाब नहीं हुआ। पता नहीं वह कौनसा अचूक रामबाण फॉर्मूला है, जिसके मिश्रण से भारतीय दर्शक अपने आपको मनोरंजित और विरेचित महसूस करता है।