गुरुवार, मई 03, 2012

हमारी फिल्‍में, हमारे दर्शक


हिंदी सिनेमा के लिए आज सौवां साल लग गया है। अब भी ये उतना ही ताजा और जवान लगता है। हमारे सिनेमा और हमारी जिंदगी का रिश्‍ता क्‍या है।


-रामकुमार सिंह
हॉलीवुड की नकल पर बॉलीवुड कहे जाने वाले हमारे हिंदी सिनेमा की लोकप्रियता की कहानी अजब गजब है। फ्रांस के लुमियर बंधुओं की बनाई दुनिया की पहली फिल्‍म के करीब डेढ दशक बाद भारत में दादा फाल्‍के ने भारत की पहली फिल्‍म बनाई। जिस फ्रांस से फिल्‍में बनाना दुनिया ने सीखा, अब वह दुनिया की फिल्‍म इंडस्‍ट्री का केंद्र नहीं है लेकिन जिस मुंबई में भारत की पहली फिल्‍म बनी वह फिल्‍म इंडस्‍ट्री का महत्‍त्‍वपूर्ण केंद्र है। संख्‍यात्‍मक लिहाज से हम हॉलीवुड से भी ज्‍यादा फिल्‍में बनाते हैं। हॉलीवुड ने पूरी दुनिया के सिनेमा पर हमला करते हुए अपना वर्चस्‍व बनाया, लेकिन हमारे यहां आज भी ब्लॉकबस्‍टर होने वाली फिल्‍म तो भारतीय ही होती है।
हम भारतीयों के लिए सिनेमा का मतलब है,‍ कथा ि‍फल्‍में यानी ि‍फक्‍शन। हमारे यहां डॉक्‍यूमेंट्री या सिनेमा की दूसरी विधाएं मुख्‍यधारा में लोकप्रिय हो ही नहीं पाईं। हमारी फिल्‍मों में नाच गाना भी एक मौलिक खोज है। हमारा नायक एक तरफ अन्‍याय के खिलाफ संघर्ष की आवाज बुलंद करता है, दूसरे ही दृश्‍य में वह अभिनेत्री के सामने ठुमके लगाते हुए प्रेम गुहार कर रहा होता है। हॉलीवुड स्‍टार ब्रेड पिट ने अपने एक साक्षात्‍कार में कहा कि मुझे भारतीय अभिनेताओं से ईर्ष्‍या है क्‍योंकि वे इतना सब कुछ एक ही फिल्‍म में कर सकते हैं जो करने में अभिनेता होने के नाते वे खुद को अक्षम महसूस करते हैं।
हिंदी के मशहूर अभिनेता और निर्देशक राजकपूर कहा करते थे कि हिंदी सिनेमा के लिए गीत संगीत जरूरी है क्‍योंकि लोगों के जीवन में इतना रुखापन है कि वे उनके लिए नाच गाना एक बेहतर मनोरंजन का जरिया है।
इसमें सच्‍चाई भी है, हिंदी सिनेमा ने प्रारंभिक दिनों में केवल मौलिक कहानियां रची और बेहद लोकप्रिय हुई। जब बोलती फिल्‍में नहीं आई थीं तब भी थियेटर में संगीतकार लोग दृश्‍य की जरूरत के हिसाब से लाइव संगीत बजाया करते थे। सत्‍तर के दशक में समांतर सिनेमा के दौर के बावजूद बहुसंख्‍यक भारतीय दर्शकों का व्‍यावसायिक सिनेमा के साथ अंतरंग जुड़ाव रहा। साथ ही एक पूरी पीढ़ी सिनेमा को हिकारत के भाव से देखती रही है। वे अपनी संतानों को सिनेमा दिखाने से परहेज करती रही है। प्रारंभिक दिनों में तो लड़कियों का सिनेमा में काम करना तक वर्जित रहा है और महिलाओं के पात्र पुरुष ही अदा करते थे। दरअसल सिनेमा भारतीय समाज के स्‍वयं के अंतरविरोधों का ही प्रतिबिंब है। आईने के सामने माताएं मधुबाला की तरह दिखने की कोशिश करती रहीं और अपनी लड़कियों को सिनेमा देखने से रोकती रहीं। हमारी सरकारों का रवैया तो अब तक भी यही है। जो फिल्‍म श्रेष्‍ठ अभिनय का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार हासिल करती है, उसे टीवी पर दिखाए जाने से रोक देती है। आज भी हमारे स्‍कूली बच्‍चे कक्षाएं बंक करके सिनेमाघरों में स्‍कूल बैग लटकाए पाए जाते हैं क्‍योंकि उनके लिए सिनेमा देखना एक तरह से विद्रोह का प्रतीक है। आज भी हमारे स्‍कूली पाठ्यक्रमों में कविता, कहानी, चित्रकला, संगीत आदि जरूरी हिस्‍से हैं लेकिन फिल्‍म रसास्‍वाद का कोई पाठ्यक्रम नहीं है। नतीजा यह है कि सिनेमा के बारे में आज भी एक पूरी पीढ़ी आधा अधूरा सा ज्ञान रखती है। आज भी हमारे सुपर सितारे अर्थहीन सिनेमा बनाकर करोड़ों कूटते हैं, आज भी सिनेमाघरों की बत्तियां बंद होते ही भारतीय दर्शक यह अपेक्षा करता है कि फिल्‍म में कुछ ऐसा आ जाए कि पिछले छह महीने से महंगाई के दौर में जूझते हुए उसकी यातनाओं को वह भूल जाए। कुछ कॉमेडी हो, कुछ नाच हो, आयटम सॉन्‍ग हो, एक आध धमाकेदार दृश्‍य हों। दो ढाई घंटे बाद थियेटर में जब वापस बत्तियां चालू हों तो उसके चेहरे पर सिर्फ इतनी ही तृप्ति आ जाए कि फिल्‍म पैसा वसूल थी। हालांकि इस भारतीय दर्शक की भीतरी तृप्ति को पकड़ पाने में सौ साल बाद भी हमारा सिनेमा कामयाब नहीं हुआ। पता नहीं वह कौनसा अचूक रामबाण फॉर्मूला है, जिसके मिश्रण से भारतीय दर्शक अपने आपको मनोरंजित और विरेचित महसूस करता है। 

शनिवार, मार्च 03, 2012

पान सिंह तोमर: यह वंचितों और पीडि़तों की कविता है





पान सिंह तोमर के शुरुआती दृश्य में एक पत्रकार को दिखाया गया है जो बागी (डकैत नहीं, क्योंकि बकौल पान सिंह बीहड़ में बागी होते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में होते हैं) पान सिंह से बात कर रहा है। खुद कुर्सी पर बैठा पान सिंह उसे नीचे बैठने का इशारा करता है। वह दीवार का सहारा लेकर बैठता है। एक पत्रकार को इस तरह दिखाए जाने के कारण मुझे शायद खीझ होनी चाहिए लेकिन पता नहीं क्यों, बुरा नहीं लगा। कई बार जख्मी जगह को बार बार छूकर देखना भी अच्छा लगता है। पानसिंह और पत्रकार का इंटरव्यू शुरू होता है। परतें खुलनी शुरू होती हैंं। आप सिनेमा में डूबना शुरू होते हैं।

पान सिंह तोमर सेना में भर्ती हुए और एक दिन स्टीपलचेज दौड़ में राष्ट्रीय रिकॉर्डधारी बने। लेकिन जब अपने गांव लौटे तो उनकी जमीन पर चचेरे भाई ने कब्जा कर लिया था। अनुशासित सैनिक होने के नाते पान ङ्क्षसह नियम कायदों से चक्कर लगाते रहे। उस इलाके का गैर जिम्मेदार और गैर-जरूरी सा सारा प्रशासन उन्हें टरकाता रहा। अंतत: पान सिंह बागी बने। अब सब लोग पान सिंह को ढूंढ़ रहे हैं। पान सिंह की यह पीड़ा भी है कि जब देश के लिए मैडल लाए तो कोई नहीं पूछता था लेकिन बागी बने हैं तो सब नाम ले रहे हैं।

दरअसल फिल्म पान सिंह तोमर तीन स्तर पर ताकतवर है। एक तो सच्ची घटना पर आधारित होना उसे बेहद विश्वसनीय बना देता है। दूसरा, वह बहुत खूबसूरती से लिखी गई है, जिसके लिए संजय चौहान और तिग्मांशु धूलिया जितनी तारीफ की जाए कम है। तीसरे, इरफान की मौजूदगी उसे सम्पूर्ण सिनेमाई अनुभव बनाती है, जो हर हाल में देखी जानी चाहिए।

पान सिंह तोमर सच्ची घटनाओं से लेकर बुना गया जिंदगी का एक रूपक है, जिसे देखते हुए आपका मनोरंजन भी होता है, उसके भीतर एक तंज लगातार चलता है, एक महान त्रासदी भी हम समांतर देखते हैं, जो बागियों के अपराध को महिमामंडित करने से ज्यादा उन सारे चेहरों को रेखांकित करती हैं जो इन बागियों को पैदा करते हैं। पान ङ्क्षसह ने तय कर लिया है कि बागी होना है और बेटा हनुमंता फौज की नौकरी में जाने से मना करता है तो वह चिल्लाता है। पूरी फिल्म में इरफान का कोई दूसरा संवाद इतना लाउड नहीं है। यह अपने आप में संकेत है कि किसी भी नई पीढ़ी के लिए बागी होना कोई समाधान नहीं है। समाधान यह भी नहीं है कि वह उस पुलिस वाले इंसपेक्टर को मार दे जिसने उसकी एफआईआर तक दर्ज करने से मना किया था और उसका जीता हुआ मैडल फेंक दिया था। आप उस इंसपेक्टर से इतनी नफरत कर रहे होते हैं और इच्छा होती है कि पर्दे पर उसे मार दिया जाए लेकिन पान सिंह उसे सिर्फ इतना कहते हैं कि वर्दी के सामने झुककर माफी मांग कि तू इसके लायक नहीं है। इसके बाद कच्छे में भागते हुए वह अपनी जान बचाने का जश्न मना सकता है लेकिन असल में वह मरा हुआ ही है। एक मरा हुआ लोथड़ा पर्दे पर भाग रहा है।

पान सिंह का नायकत्व इस तरह के ग्रे शेड वाले सारे नायकों से ऊपर है। वह एक जिम्मेदार पिता, जिम्मेदार भाई, चाचा, एक अनुशासित सिपाही अपनी टोली के लोगों के लिए समर्पित लीडर। उसके भीतर एक खालीपन है। उसके भीतर एक आग है। उस आग को बुझाने के बाहरी जतन करता है। वह गुलाबजामुन में आइस्क्रीम मिलाकर खाने के स्वाद को नहीं भूला है। वह विदेश का हवाला देता है और जब उसे पता चलता है इतने बरसों बाद अब ग्वालियर में भी वैसी ही आइस्क्रीम मिलने लग गई है तो यह संकेत मात्र है कि समय किस तरह बदल गया है। कर्नल के घर चार मिनट में बिना पिघले आइस्क्रीम पहुंचाने वाले पान सिंह की जिंदगी की आइस्क्रीम इस पूरी यात्रा में पिघल गई है लेकिन वह तब भी फिनिश लाइन तक पहुंचना चाहता है। वह जानता है कि इन लोगों से जीतना उसके लिए नामुमकिन है, तो भी वह अपना सफर नहीं छोड़ता। वह अपने पुराने कोच के घर से ड्राइ फ्रूट्स उठाकर अपनी जेबों में भर लेता है और उसे चंबल किनारे इंतजार कर रहे अपने परिवार में बांट देता है। यह वंचितों और पीडि़तों की कविता है। यह उन सब लोगों के पक्ष में फिल्म है, जो न्याय के लिए लड़ते हैं। जिन्हें पता है कि वे जब तक लड़ेंगे नहीं, तब तक सत्ता उन्हें न्याय नहीं देगी।

जिस चचेरे भाई की वजह से वह बागी बना है, जब वही उसके सामने गिड़गिड़ा रहा है और कह रहा है कि पान सिंह तू मेरा भगवान है तो पान सिंह कहता है, क्या करोगे उस जमीन का अब, जो तुमने दबाई थी।

नए फिल्मकारों की जमात में तिगमांशु एक संवदेनशील फिल्मकार हैं। संजय चौहान की बेहतरीन लेखक हैं ही। हम उन्हें आय एम कलाम, साहब, बीवी और गैंगस्टर समेत दूसरी कई महत्त्वपूर्ण फिल्मों से जानते हैं। फिल्म के संवाद और पटकथा इसे बिना चूके देखने के लायक बनाते हैं। इरफान के साथ तिगमांशु की अंडरस्टेंडिंग इस फिल्म को एक ऊंचाई तक ले जाती है।
और हां, इरफान को भी यह फिल्म नायकत्व की उस श्रेणी में ले जाती है, जिसके नाम से भारतीय बॉक्स आफिस पर टिकट बिके। मुमकिन है यह मेरा और मेरे शहर के दर्शकों का जयपुर प्रेम हो लेकिन कैमरा पैन होते हुए पैरों से ऊपर उठकर धीरे धीरे एक ओट से जब इरफान की पहली झलक दिखाता है तो थियेटर में सीटियां बजती है। यह गैर परम्परागत नायक है। इसके अपने दर्शक हैं और पर्दे पर पहली झलक हीरो की आए और दर्शक सीटी बजाए तो समझिए, इस हीरो में बॉक्स ऑफिस वाली बात है। आरती बजाज के संपादन, अभिषेक रे के संगीत और साथी कलाकारों के अभिनय समेत सिनेमा का जरूरी साजो सामान सब है। आप देखेंगे तो आपको अच्छा लगेगा।

शुक्रवार, नवंबर 11, 2011

फिर वही कहानी लाया हूं, लेकिन संगीत नया है!

रामकुमार सिंह
सोचा ना था और जब वी मेट देखने के बाद मेरे जैसा कोई भी साधारण दर्शक यह अंदाजा लगा सकता है कि इम्तियाज अली के पास पर्दे पर कहानी कहने की एक कला है लेकिन अब उनकी फिल्में देखते हुए अनुमान लगाना आसान हो जाता है कि उनके पास कहानी एक ही है और उसी को आगे-पीछे करके कहते रहते हैं। इस वक्तव्य में दोनों ही चीजें निहित है। आप चाहें तो इम्तियाज को एक ही किस्सा बार-बार कहने के लिए खराब भी कह सकते हैं और यह भी कि एक किस्से को बार बार उसी ताजगी से कहने के लिए तारीफ भी कर सकते हैं।
दिल्ली के जनार्दन जाखड़ उर्फ जोर्डन के एक लड़की से दोस्ती करने, उसकी शादी हो जाने के बाद प्यार करने और हद दर्जे तक प्यार करने के बाद पिटाई खाने और दिल टूटने की आवाज से निकले संगीत के सहारे रॉकस्टार हो जाने, प्राग घूम आने और प्रेमिका को एक गंभीर बीमारी हो जाने और प्रेमी से पुन: मिलने तक की कहानी है रॉकस्टार।
मेरी समझ के हिसाब से रॉकस्टार एक मनोरंजक फिल्म है लेकिन इससे इम्तियाज अली का विस्तार नहीं होता, वे खुद को रिपीट करते हैं। इम्तियाज की फिल्म देखने के लिए मैं थिएटर में घुसने से पहले अंदाजा लगाता हूं कि यह ऐसी फिल्म होगी और वह लगभग वैसी ही लगती है।
खोसला का घोंसला के बाद ओए लकी लकी ओए और लव सेक्स धोखा देखने के बाद एक निर्देशकीय ग्राफ देखने के लिए मैं दिबाकर बनर्जी की ओर देखता हूं। धारावी से लेकर हजारों ख्वाहिशें ऐसी और ये साली जिंदगी के सुधीर मिश्रा को देखता हूं।
बॉक्स ऑफिस के हिसाब से रॉकस्टार की ताकत सितारा रणबीर कपूर और एआर रहमान का दिलकश संगीत है। रणबीर कपूर की सितारा छवि से इतर भी सोचकर कह रहा हूं कि वह चरित्र जिस पृष्ठभूमि से है, उसे उन्होंने ठीक से निभा दिया है। रही बात नरगिस फाखरी की, तो वो हिंदी बोलते हुए अखरती हैं लेकिन अखरती तो मुझे कटरीना कैफ भी है और तमाम वे अभिनेत्रियां, जो अपनी पूरी खानदानी पहचान के साथ अपने अभिनय का कहर ढाती हैं। लिहाजा इसके लिए नरगिस फाखरी और इम्तियाज दोनों को ही दोष देना बेमानी है। यह हमारी सिनेमा परंपरा का ही विस्तार है और सही मानें तो दर्शकों को खास फर्क नहीं पड़ता। वे नरगिस को देखते हुए उतनी ही खुशी महसूस करते हैं।
हजरत निजामुद्दीन दरगाह पर कुन फायाकुन फिल्माया गया है। गीत संगीत, फिल्मांकन और एक सूफियाना रोशनी सब मिल कर विरेचन करते हैं। संगीत के साथ कैमरा पूरी दरगाह से गुजरते हुए गुंबदों तक जाता है। मैं केवल इतना सा हिस्सा देखने के लिए एक बार फिर थिएटर में जा सकता हूं। साड्डा हक एत्थे रख तो जादुई है ही।
शम्मी कपूर फिल्म में एक उस्ताद हैं। शहनाई वादक हैं और शास्त्रीय संगीत को न समझ पाने वाले रॉकस्टार की बातें सुनकर उसके बारे में संगीत कंपनी के मालिक धींगरा कहते हैं – यह बड़ा जानवर है, तुम्हारे पिंजरे में नहीं आएगा। अपना रास्ता खुद बनाएगा। यह संवाद बाहर निकलने के बाद भी याद रहता है। शायद इसलिए भी कि एक दादा अपने पोते को जाते-जाते दुआ ही देकर गया हो।
इम्तियाज अली की लड़कियों के बारे में भी आप पूर्वानुमान लगा सकते हैं। वे बिंदास और खिली-खिली रहती हैं। इस फिल्म वाली फाखरी को एक गंभीर बीमारी देकर इंटरवल के बाद का मामला सीरियस कर दिया लेकिन इंटरवल से ठीक पहले रणबीर और नरगिस का चुंबन याद रहता है। लेटे हुए मालिश करवाता म्यूजिक कंपनी का मालिक ढींगरा (पीयूष मिश्रा) जोर्डन (रणबीर) से बातचीत कर रहा है। यह दृश्य याद रहता है। संपादन के लिहाज से भी फिल्म थोड़ी लंबी लगती है। पता नहीं इसका दोष आरती बजाज को दें या खुद निर्देशक को। एआर रहमान का संगीत फिल्म को ऊपर तक ले जाता है और उसमें इरशाद कामिल के गीत एक नया रंग भरते हैं।
बेशक, रॉकस्टार देखकर मैं खुश हूं लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहता था।

मंगलवार, अक्टूबर 11, 2011

घाव को फाहे से सहलाने वाला

 गजल में शाइर का खयाल महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन जगजीत सिंह ने साबित किया वे जिस गजल को गाते थे उसमें वे खयाल, रुमानियत या दर्द का एक नया रंग भर देते थे। वे हमारे बीच से गए नहीं है बल्कि और अधिक फैल गए हैं। 






दुनिया में सब मुसाफिरी पर हैं। सबको जाना है। कोई पहले कोई बाद में जाता है लेकिन जगजीत सिंह जिस तरह गए वो दुख देता है। जिस दिन उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था उसी शाम वे गुलाम अली के साथ मंच से गाने वाले थे।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में पैदा और पले बढ़े जगमोहन को, जो बाद में जगजीत हो गए, मुंबई जाना था और सन १९६५ के बाद कोई एक दशक तक जमकर संघर्ष करना था। वे परम्परागत संगीत घरानों से नहीं थे। उनकी आवाज पेड़ों के इर्द गिर्द नाचने वाले फिल्मी नायकों से मेल नहीं खाती थी और दूसरों की गजलें गाकर या शादी पार्टियों में गाकर आजीविका चलाते थे। उसी दौरान चित्रा दत्ता से विवाह किया और उनका बेटा विवेक उनकी दुनिया में आया तो वे बहुत अमीर नहीं थे। बस उनकी ख्वाहिशें अमीर थी। लेकिन सन १९७५ में उनका पहला एलबम अनफॉर्गेटेबल्स आया और नाम के अनुुरूप इसने कमाल कर दिया। जगजीत ने मुड़कर नहीं देखा।
असल में जगजीत सिंह ने गजल गायकी को जो असाधारण और मौलिक तरीका अपनाया था उसने उन्हें तो स्थापित किया ही। गजल जैसी एक क्लासिकल विधा को आम जनता में लोकप्रिय कर दिया। वे आज भी युवाओं में उतने ही लोकप्रिय रहे हैं जितने बुजुर्गों में। उनकी आवाज चिर युवा रही और आने वाले वर्षों में रहेगी। उनकी गायकी ऐसे काम करती है जैसे कोई गहरे घावों को रूई के फाहे से सहला रहा हो। जैसे आप चांदनी रात में एक शांत नदी में नौकायन कर रहे हों। जैसे बारिश की पहली बूंदों की खुशबू महसूस कर रहे हों।
जयपुर में कितनी ही बार वे आए और पिछले दो दशक में लगभग हर बार उनको लाइव सुनने का अवसर मिला। वो यादगार शाम कोई कैसे भूल सकता है जब जयपुर के अलबर्ट हॉल के सामने खचाखच भरे रामनिवास बाग में जगजीत सिंह अपनी माटी को नमन कर रहे थे। उसी मंच से उस दिन रेशमा और मेहदी हसन भी अपने राजस्थानी होने का गर्व कर रहे थे।
जगजीत सिंह इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि गजल जैसी शास्त्रीय विधा के सांस्कृतिक संस्कार वे कई पीढियों को देकर गए हैं। आप संगीत के तकनीकी पहलुओं को समझते हैं या नहीं, इससे खास फर्क नहीं पड़ता लेकिन अगर आप एक बार जगजीत सिंह को सुन लेते हैं तो आपको संगीत से प्यार हो जाएगा, गजल से प्यार हो जाएगा। कई सारे संस्थान, कई सारी सरकारें पूरी पीढ़ी को संगीत से उतना संस्कारित नहीं कर सकते जितना काम अकेले जगजीत सिंह कर गए।
दरअसल गजल में शाइर का खयाल महत्त्वपूर्ण होता है लेकिन जगजीत सिंह ने साबित किया वे जिस गजल को गाते थे उसमें वे खयाल, रुमानियत या दर्द का एक नया रंग भर देते थे। वे हमारे बीच से गए नहीं है बल्कि और अधिक फैल गए हैं। 

बुधवार, अक्टूबर 05, 2011

क्या राजस्थानी सिनेमा संभव है?



-रामकुमार सिंह-

तीन दिन तक जवाहर कला केंद्र में चले राजस्थानी सिनेमा के जलसे में सबसे अच्छी बात यह थी कि जितनी फिल्में दिखाई गई वे लगभग हाउसफुल रहीं। मुंबई से आए लगभग लुप्त प्राय: राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री के यातनाम कलाकार और झंडाबरदार भी आए लेकिन क्या यह स मेलन करने मात्र से राजस्थानी सिनेमा के पनपने के आसार बनते हैं। मैं क्रूर होकर कहूं तो सच यह है कि ऐसा नहीं होगा। दरअसल पूरा फिल्म उद्योग हर ह ते एक नई करवट लेता है। एक शुक्रवार का बॉक्स ऑफिस का किंग अगले ह ते अपदस्थ होता है और उसे नया राजा मिल जाता है। कई बार एक ही राजा बार बार राज करता है, जैसे पिछले डेढ साल से सलमान खान कर रहे हैं। तो जिस राजस्थान में पिछले दो दशक में कोई महत्त्वपूर्ण फिल्म राजस्थानी भाषा में नहीं बनी तो तो अचानक यह चमत्कार कैसे हो सकता है?

मुझे यह राग कुछ जिस तरह समझ में आ रहा है, उसका उल्लेख मैं करना चाहूंगा। दरअसल राज्य सरकार ने जब यू सर्टिफिकेट वाली राजस्थानी फिल्मों को पांच लाख रुपए तक के अनुदान की घोषणा की तो यह ठहरे हुए पानी में कंकर था। कई पुराने खापट निर्माता कलाकारों और संघर्षरत लोगों के लिए यह एक अवसर की तरह लगा कि फिल्म बना दो, पांच लाख रुपए पक्के हैं।

जबकि यह अनुदान सिनेमा के लिए मजाक है। जिस दौर में गांव में टेलीविजन को व्यापक विस्तार हो चुका है, जहां गांव के लोगों के पास अपना सिनेमा देखने का विकल्प है कि हिंदी से लेकर हॉलीवुड और दुनिया के दूसरे देशों को सिनेमा देख सकती है वहां पांच लाख रुपए के अनुदान के लालच में बनी फिल्म वह क्यों देखेगा? और जो लोग वयस्क हैं, एडल्ट फिल्में देखना चाहते हैं वे छूट के दायरे में क्यों नहीं हैं? समय के साथ एडल्ट सिनेमा की परि ााषा भी बदल गई है। अब एडल्ट फिल्म का मतलब छिछौरी फिल्में नहीं बल्कि उसमें वल्र्ड क्लास सिनेमा भी शामिल है। जाहिर है फिल्म की गुणवत्ता देखकर अनुदान देने का मापदंड वहां भी लागू होता है।


दूसरी बात, सरकार ने जब मनोरंजन कर में छूट दी तो लोगों को लगा कि सरकार का मन है कि सिनेमा को प्रोत्साहन दिया जाए। दरअसल यह सरकार ने अपने पांवों पर कुल्हाड़ी मारी। सिनेमाघरों की दरों में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई। सबने चुपके से दरें बढाई और या कुछ ईनामी योजनाएं चलाई कि ह ते में आप एक दिन सस्ती दरों पर फिल्म देखें बाकी हमें बढ़ी दरों पर फिल्म चलाने दें। आपको मालूम ही होगा कि सुबह के शो में जो टिकट आप पिचहतर रुपए में खरीदते हैं, शाम या रात होते होते वह मल्टीप्लेक्स में डेढ़ सौ रुपए में बिकता है। वह भी तब, जब उसमें मनोरंजन कर शामिल नहीं है। संयोग से इस साल एक के बाद एक हिट फिल्में आई हैं और करोड़ों रुपए का राजस्व सरकार ने गंवाया है (या सिनेमाघरों और निर्माताओं ने कमाया है)। सरकार सचमुच अपने भाषायी सिनेमा को प्रोत्साहन देना चाहती थी तो करोड़ों रुपए के मनोरंजन कर को लेकर एक स्लैब बना सकती थी कि सिर्फ राजस्थानी फिल्मों को मनोरंजन कर में छूट दे। हिंदी या हॉलीवुड सिनेमा से कमाए हुए मनोरंजन कर को हर किस्म की फिल्मों को मनोरंजन कर छोड़ देने के बाद तो भाषायी सिनेमा की चुनौती और बढ गई है। मल्टीप्लैक्स और सिनेमाघर मालिक क्षेत्रीय फिल्मकारों को झांकने तक नहीं देंगे।

मशहूर फिल्मकार ऋत्विक घटक कहा करते थे कि फिल्म बनाना हर आदमी के लिए आसान होना चाहिए। जैसे किसी का मन कहानी या कविता लिखने का होता है, नाटक करने का होता है ठीक उतना ही आसान होना चाहिए क्योंकि यह अंतत: अभिव्यक्ति ही तो है। उस जमाने में फिल्म बनाने की लागत बहुत आती थी। अब डिजीटल कैमरा आने के बाद यह बहुत आसान हो गया है। आपके स्टिल कैमरा की साइज के एक कैमरे से आप फीचर फिल्म बना सकते हैं। हालांकि यह भी इतना आसान और सस्ता भी नहीं है कि हर कोई खड़ा हो जाए और कहे कि अब तक वह पेट्रेाल पंप चलाता था और अब मन हो गया है तो फिल्म बना ले। लेकिन सृजनशील बहुत लोगों के लिए सिनेमा बनाने का रास्त सुगम हुआ है लेकिन देखते ही देखते उसे रिलीज करने का दूसरा रास्ता जटिल हो गया है। जबसे सिनेमा से थियेटर के अलावा सैटेलाइट, रिंग टोन और मल्टीमीडिया से जुड़े दूसरे अन्य लाभ कमाने के अवसर पैदा हुए हैं, तब से बड़ी पूंजी वाले कारपॉरेट ने इस पूरे उद्योग को एक कल्पनातीत ऊंचाई दे दी। फिल्म को बना लेने की आसानी और उसे रिलीज करने के तंत्र के बीच गहरा अंतर है। फिल्मों के निर्माण की लागत से कहीं ज्यादा टेलीविजन और दूसरे माध्यमों से उसे प्रचारित करने का बजट हो गया है। जाहिर है, सिनेमाई दुनिया उतनी ही जटिल और दुर्लभ आज भी बनी है, जैसी ऋत्विक घटक कभी नहीं चाहते थे। 

सोमवार, अगस्त 08, 2011

प्रकाश झा क्‍यों अलग हैं



प्रकाश झा की तकलीफ यही है कि देश में इस तरह का सिनेमा लोग बनाते भी नहीं हैं। यदि बड़ी संख्‍या में फिल्‍में बनने लगें तो इन विरोधियों को पाला भी कमजोर हो लेकिन समस्‍या यही है कि जिन चीजों से हमारे दर्शकों और जनता को समस्‍या नहीं है उनसे इन नेताओं को समस्‍या हो जाती है।








इन दिनों प्रकाश झा के बारे में आप बहुत कुछ पढ सुन रहे हैं। खासकर उनकी फिल्‍म आरक्षण को लेकर देशभर में उत्‍सुकता और उत्‍तेजना है। कुछ विज्ञप्तिबाज नेता तेजी से सक्रिय हो गए हैं और उन्‍हें अचानक से लगने लगा है कि सवर्ण जातियों के खिलाफ फिल्‍म में कुछ खराब टिप्‍पणियां हैं, वैसे ही दलितों को लगता है फिल्‍म आरक्षण उनके खिलाफ है। बकौल राजस्‍थानी नेता कि फिल्‍म यदि आरक्षण के पक्ष में हैं तो दलितों की लड़ाई कमजोर होगी और यदि आरक्षण के विरोध में हैं तो आरक्षण के लिए लड़ रहे लोगों की लड़ाई कमजोर होगी।



रविवार की शाम मैं जयपुर के होटल मैरियट में प्रकाश झा के साथ हूं और वे बताते हैं कि फिल्‍म को प्रोडक्‍शन बजट 52 करोड़ रुपए है और प्रचार के बारह करोड और। यानी कुल जमा 64 करोड़ रुपए दांव पर लगे हैं एक गंभीर किस्‍म के फिल्‍मकार के जो चुम्‍मा चाटी या मर्डर सर्डर या लिजलिजी प्रेम कहानी बनाकर उन सब तनावों से बच सकता था जो उसे राजस्‍थान, महराष्‍ट्र, उत्‍तरप्रदेश या दूसरे राज्‍यों में छुटभैया नेताओं की वजह से मिल रहे हैं। हमारी कमजोर ओर लाचार सी कानून व्‍यवस्‍था सारी जिम्मेदारियां फिल्‍मकार पर ही डालती है कि कुछ पंगा हुआ तो आप ही जिम्‍मेदार होंगे।

हिंदुस्‍तान में पॉलिटिकल सिनेमा पर ही यह दिक्‍कत क्‍यों होती है? झा कहते हैं, ऐसा किसी भी सिनेमा के साथ हो सकता है। इस देश में कुछ भी हो सकता है। मैं पूछता हूं कि जब आपको पता है आपकी हर फिल्‍म से किसी न किसी को दिक्‍कत होती है, हर बार रिलीज से पहले तनाव होता है, लोग पब्लिसिटी स्‍टंट कहकर काम चला लेते हैं लेकिन एक निर्माता के रुप में हर बार आप तनाव से गुजरते हैं, क्‍यों नहीं दो भाई, दो लड़कियां, मां बेटे कुंभ के मेले में बिछड़ने टाइप मसाला डाल के बेच सकते हैं तो हर बार यह पंगा क्‍यों लेते हैं, तो प्रकाश झा मुस्‍कराते हैं, कहते हैं मैं नहीं बना सकता वो फिल्‍में। मुझे इसी में मजा आता है।

इस बीच मुंबई से कोई फोन आता है, प्रोड़यूसर्स गिल्‍ड, सरकार ओर झा की खीझ को लेकर बात होती है। वे इशारा करते हैं कि इन सबको ना रिकॉर्ड करें लेकिन वो बातचीत सुनकर मैं उनके तनाव का अंदाजा लगा सकता हूं। एक रचनात्‍मक आदमी जो यह कह रहा है कि वो पिछले सात साल से इस विचार के साथ जूझ रहा था और अब जाकर यह मूर्त हुआ है। जो यह कह रहा है कि यदि अमिताभ इस फिल्‍म के लिए हां नहीं कहते तो मैं फिल्‍म शुरू ही नहीं करता। जो यह कह रहा है कि उसकी अगली फिल्‍म की कहानी भी देश के राजनीतिक माहौल के इर्द गिर्द ही होगी तो तनाव के बीच यह हौसला ही साबित करता है कि प्रकाश झा सबसे अलग क्‍यों हैं?

वे उन लोगों से लड़ रहे हैं,‍ जिनसे जब हमने प्रेस कांफ्रेंस में पूछा कि जब सेंसर बोर्ड ने फिल्‍म को प्रमाण पत्र दे दिया है तो उन्‍हें क्‍या आपत्ति है ओर उनका जबाव है कि सेंसर बोर्ड में भी आदमी बैठते हैं, उनसे गलती हो सकती है, और वे उस गलती को सुधारना चाहते हैं। मुझे पता है वे सब ऐसे नेता है जो इस फिराक में रहते हैं कि कोई मुद़दा हडपें। वे कभी सिनेमा नहीं देखते। वे सिनेमा माध्‍यम को रत्‍ती भर भी नहीं समझते।

प्रकाश झा की तकलीफ यही है कि देश में इस तरह का सिनेमा लोग बनाते भी नहीं हैं। यदि बड़ी संख्‍या में फिल्‍में बनने लगें तो इन विरोधियों को पाला भी कमजोर हो लेकिन समस्‍या यही है कि जिन चीजों से हमारे दर्शकों और जनता को समस्‍या नहीं है उनसे इन नेताओं को समस्‍या हो जाती है।

झा एक बात और कह रहे हैं कि मैं दावे से कह सकता हूं कि फिल्‍म रिलीज होने के बाद जब ये लोग देखेंगे तो शायद खुद ही पछताएंगे कि वे क्‍यों‍ बिना किसी आधार के विरोध कर रहे थे क्‍योंकि फिल्‍म में ऐसा कुछ भी नहीं है। वो किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं है। यहां तो हालात ही खलनायक की तरह व्‍यवहार कर रहे हैं। यह एक पूरा तंत्र खड़ा हो गया है, जिसकी ओर फिल्‍म संकेत करती है, बाकी फिल्‍म को मूल तो एक इमोशनल कहानी है। पता नहीं लोग क्‍यों नहीं समझते।



प्रकाश झा पर बौदि़धक तबके का यही आरोप है कि उन्‍होंने स्‍टारडम से अलग एक मौलिक सिनेमा बनाने की कोशिश की तो अब वे सितारों वाले सिनेमा की तरफ कैसे मुड़ गए? झा कहते हैं, क्‍या करूं, जब फिल्‍म बनाने की लागत वही है और अच्‍छी कहानी भी मेरे पास है तो मुझे बॉक्‍स आफिस भी तो देखना है। आप देखिए, अच्‍छी बनी फिल्‍मों के क्‍या हाल हैं। शो कैंसिल हो जाते हैं। तो मैं क्‍या करूं? और वे प्रकारांतर से कहते हैं कि धारा बदलने वाले सिनेमा का खिताब आप लोगो ने दिया है, मैं तो फिल्‍मकार हूं अपने तरह की फिल्‍म बनाता हूं।



भाषा को लेकर वे आश्‍वस्‍त हैं, मैंने कहा, राजनीति में इतनी शुद़ध हिंदी कि लगता नहीं आप इस दौर में इस तरह की भाषा इस्‍तेमाल कर सकते हैं, वे मुस्‍कराते हुए कहते हैं, यह सब आपको आरक्षण में भी मिलेगा। राजनीतिक सामाजिक उथल पुथल वाले डायलॉग की जटिलता के बारे में कहा तो बोले, बार बार सुनिए ना, समझ में आएगा।



इस पूरे तनाव के बीच भी उनके पास एक विट है, हास्‍यबोध है। इस बातचीत के बीच भीतर आ गए पत्रकार मित्र ने पूछा कि पर्दे के पीछे से इतना काम किया है, कभी पर्दे पर आने की सोची है। वे कहते हैं, आजकल मैं ही मैं इतना पर्दे पर आया हुआ हूं। लोगों को स्‍पष्‍टीकरण दे रहा हूं कि मेरी फिल्‍म में ऐसा कुछ नहीं है।

फिर वो कहते हैं, राजनीति में भी मैं एक जगह पर्दे पर था और आरक्षण में भी पर्दे पर नजर आउंगा। मैंने धांसू काम किया है और देखना फिल्‍म मेरे ही अभिनय के दम पर सुपर डुपर हिट होगी।

बुधवार, जुलाई 27, 2011

सिंघम: हिंदी सिनेमा की दबंग धारा

निर्देशक रोहित शेट्टी की पहचान कॉमेडी फिल्मों से है और हमेशा यह कहते रहे हैं कि वे असल में एक्शन फिल्में बनाना चाहते थे। सिंघम के जरिए उनकी यह मंशा पूरी हुई है और पर्दे पर दिख रहे क्रेडिट्स के मुताबिक एक्शन डिजायन खुद रोहित ने किए हैं। 

सिंघम हिंदी फिल्मों में इन दिनों चल रही दबंग धारा की फिल्म है और यह एक ईमानदार पुलिस अफसर की कहानी है जो भ्रष्ट नेता से लड़ता है। ऎसी सैकड़ों फिल्में हम कई बार देख चुके हैं जिसमें इंस्पेक्टर विजय ईमानदार होता है लेकिन सिंघम समकालीन फिल्म है और उसमें समकालीन मसाले हैं। उसमें रोहित शेट्टी का कामयाबी वाला स्पर्श है, जहां वे हंसी में एक्शन और एक्शन में हंसी का घालमेल बहुत जोरदार ढंग से करते हैं। 

कहने को यह साउथ की फिल्म सिंगम को रीमेक है लेकिन हिंदी के आम दर्शक इसे देखते हुए अपनी कुर्सी नहीं छोड़ते। यह दरअसल हिंदुस्तानी आम जनता का सिनेमा है, जिसे एक नायक चाहिए जो बुराइयों से लड़ता है। यहां उनका नायक बाजीराव सिंघम है, जो छोटा सा इंस्पेक्टर है लेकिन उसके काम करने के अलग ढंग से एक दिन पूरा पुलिस महकमा उस पर गर्व करता है। इसमें कुछ प्रयोगशील और क्रांतिकारी नहीं है लेकिन जब नायक लाइट का पोल उखाड़ता है और जीप के समांतर दौड़ते हुए गुंडों की पिटाई करता है या जब मंत्री को उसके ही कमरे में घुसकर पिटाई करता है तो आम दर्शक के भीतर भरे गुस्से का विरेचन होता है, मनोरंजन तो खैर होता है ही। 

फिल्म की पटकथा बांधे रखने वाली है। इंटरवल तक नायक और खलनायक की कोई सीधी टक्क्र नहीं है लेकिन वह भूमिका जरूर तैयार हो रही है। बाजीराव अपने ही गांव की चौकी में इंस्पेक्टर है और लगभग एक पंचायत की तरह से ही काम करता है। वह पूरे गांव का चहेता है और गांव के मूल्यों में ईमानदारी और अपनों के काम आने की आदत उसमें हैं लेकिन उसी सिंघम का मुकाबला जब एक भ्रष्ट माफिया से होता है और उसका तबादला दंड स्वरूप जब शहर में कर दिया जाता है तो बाजीराव एक बार टूटता है लेकिन जो एक चेहरा बार बार रोहित पर्दे पर दिखाते हैं, वह उस ईमानदार इंस्पेक्टर का पंाच साल का बच्चा है जिसने माफिया जयकांत शिक्रे के दबाव में आकर आत्महत्या कर ली थी। उसी बच्चे के संवाद पर बाजीराव टिकता है और फिर मुकाबला शुरू होता है। 

अजय देवगन की शुरूआत एक्शन फिल्म से ही हुई थी और यहां वे पूरे रंग में हैं। लेकिन एक अलग चरित्र और जोरदार भूमिका प्रकाश राज की भी है। जयकांत शिक्रे कुछ सनकी, एक ईगोइस्ट नेता कारोबारी के रूप में वे हंसाते भी हैं और थ्रिल भी करते हैं। अभिनेत्री काजल अच्छी ही लगी हैं। बहरहाल रोहित पूरी फिल्म में कॉमेडी का दामन नहीं छोड़ पाए हैं। यहां तक की पूरे क्लाइमेक्स में भी हंसने के पर्याप्त अवसर हैं। पटकथा सचमुच मनोरंजक है और विटी संवादों की वजह से फिल्म पैसा वसूल है। आप एक्शन फिल्मों के शौकीन हैं, अजय देवगन के फैन हैं और सिस्टम पर अपना गुस्सा अंधेरे में बैठे हुए निकालना चाहते हैं तो यह फिल्म आपके लिए है।