मंगलवार, जनवरी 13, 2009

गोल्डन गलोब के हिंदुस्तानी सवाल


हालांकि इसमें मुंबइया फिल्मवालों का कोई योगदान नहीं है कि उन्हें बधाई दी जाए लेकिन वजह बनती है कि रहमान हमारे अपने म्यूजिशियन हैं। पहले भारतीय है जिन्हें लगभग ऑस्कर की ही तरह प्रतिष्ठित गोल्डन गलोब अवार्ड मिला है। इसमें रहमान की अद्भुत प्रतिभा का योगदान है। मुझे लगता है इस खूबी के अलावा फिल्म की खूबी यह है कि इसमें गुलजार के गीत हैं। हमारे इरफान और अनिल कपूर समेत कई भारतीय कलाकारों ने अभिनय किया है। कहानी भी मुम्बई की है, जिसको लेकर बॉलीवुड वाले दावा कर रहे हैं कि दुनिया में मुंबई छा गया है। रहमान की उपलब्धि को बड़ा मानते हुए भी मुझे बेहद अफसोस है कि भारत की इस कहानी की पटकथा-लेखक सीमॉन ब्यूफॉय भारतीय नहीं है, जिसे सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले का अवार्ड मिला है। निर्देशक डैनी बॉयल भी भारतीय नहीं है। और सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनाने वाले इसके प्रोड्यूसर भी भारतीय नहीं है।
सिनेमा के जरिए एक बेहतरीन मानवीय कहानी कहने के बजाय हमारा गर्व यह है कि हमारा सुपरस्टार अपनी फिल्म के प्रचार के लिए लिए एक खास किस्म की कटिंग करते हुए नाई बनता है। उसकी हिंसा और मारधाड़ वाली एक हॉलीवुड फिल्म की नकल के लिए उसे महान करार दिया जाता है और गजनी नाम की फिल्म भारतीय सिनेमा की अब तक की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म बन जाती है।
क्यों स्लमडॉग मिलियनेयर की परिकल्पना से लेकर उसका विपणन करने वाली टीम भारतीय नहीं है। क्योंकि हमारे फिल्मकारों को दूसरों की बनाए हुए सिनेमा को नकल करने से फुर्सत ही नहीं है। यदि वे ऐसा करते हैं तो किस मुंह से यह उम्मीद करते हैं कि उनकी फिल्में लोग पायरेटेड डीवीडी पर ना देखें। आखिर वे भी तो किसी की असली मेहनत को अपनी कमाई का जरिया बनाते हैं। लिहाजा मैं बहुत खुश हूं कि भारतीय कहानी को, भारतीय संगीत और भारतीय कलाकारों को इस फिल्म से नाम और काम मिला लेकिन असली गर्व का दिन तो तब आएगा जब बॉलीवुड के रहमान किसी बॉलीवुड की फिल्म के लिए ही जाने जाएंगे। और जो सिनेमा दुनिया के सिनेमा में इज्जत पाए वो रब ने बना दी जोड़ी और गजनी से कहीं आगे का होता है। सरहदें तोड़ता हुआ, आपकी ही कहानी पर सरहद पार से आपको आइने में देखने का अवसर देता हुआ कि देखों मुम्बई के नकलची फिल्मकारो, मुंबई की कहानी पर फिल्म ऐसे बनती है।
लेकिन शायर की भी सुनिए-फरिश्ते से बेहतर है इंसां होनापर इसमें लगती है मेहनत ज्यादा

शुक्रवार, जनवरी 02, 2009

अबके बरस

कैसे मिलेंगे अबके बरस दिन कमाल के,पिछला बरस तो गया कलेजा निकाल केओ मेरे कारवां, मुडक़र ना देख मुझकोमैं आ रहा हूं पांव के कांटे निकाल केमैं भारत का नागरिक हूं और उन तमाम पैँतीस या चालीस करोड़ युवाओं की तरह मैं भी खुशकिस्मत हूं। मेरे पिता गुलाम भारत में पैदा हुए और मैं आजाद भारत में। एक बरस और बीत रहा है। यूं लगता है, जैसे उम्मीदों से भरा मेरा दिल हौले हौले रीत रहा है। पूरे बरस में जख्म देखे हैं। कभी वे जयपुर आए, कभी वे अहमदाबाद गए, मालेगांव गए, मुम्बई के ताज और ओबेरॉय में घुस गए। मैं तख्ती लेकर गेटवे ऑव इंडिया और जयपुर के शहीद स्मारक के सामने तक खड़ा हो गया। तख्ती पर लिखा था-हार नहीं मानेंगे, आतंकवाद का मुंह तोड़ जवाब देंगे। मुझे पूरी आशंका है, जिस तरह हर बात पर हमें तख्ती उठाने की आदत पड़ गई है, एक दिन प्लास्टिक से बनी ये तख्तियां पर्यावरण प्रदूषण का काम करेंगी। इनसे सीवर लाइनें रुक जाएंगी। इसके बावजूद, साल बीत रहा है और मुझमें अकूत उम्मीदें भरी हैं। ये सारी उम्मीदे मुझे विरासत से मिली हैं। सिंधु घाटी सभ्यता से आर्यों तक, गौरी, गजनवी, लोदी, खलजी, बाबर, अकबर, औरंगजेब, डलहौजी, माउंट बेटन, नेहरू, इंदिरा, वाजपेयी, मनमोहन तक इस आर्यावर्त में अपनी पीठ पर उम्मीदों की पोटली लादे सांता क्लॉज बना घूम रहा हूं। मैं लुटा पिटा, युद्ध लड़े, आश्वासन लिए, मार खाई, भूखा रहा, मूक आंखों से भ्रष्टाचार का खुला खेल देखता रहा। अमीर को और अमीर होते, गरीब को और गरीब होते देखता रहा। साल दर साल मैंने वो सब कहानियां भी सुनी हैं जिसमें कई गरीब लोग अमीर हो गए। मसलन किस तरह कलकत्ता में नौकरी करने वाला एक युवक मुम्बई में आकर सुपरस्टार हो गया। किस तरह दसवीं पास एक आदमी इतना अमीर हो गया था कि उसकी संपति को लेकर उसके दोनों बेटों ने सार्वजनिक रूप से झगड़ा गया और तू तू मैं मैं आज भी होती है।़ किस तरह एक दलित की बेटी गरीबी से निकलकर इतने तोहफों के नीचे दब गई कि उसकी संपत्ति करोड़ों में हो गई। वह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बन गई। लोकतंत्र की कुछ ऐसी ही उम्मीदों की पोटली का बोझ नए बरस में मैं अपने बच्चों को देने की कोशिश करूंगा। जबकि मंदी से जूझते हुए मुझ आम आदमी के बैंक खातों में स्कूल से मिले एक सर्कुलर से भूकम्प आया है कि फीस बढऩे वाली है।
नए साल में मुझमें दिख रहे इस आत्म विश्वास की कई वजह हैं। आजादी के साठ साल बीतने के बाद यह अहसास काफी सुखद है कि हत्या, रिश्वतखोरी जैसे अपराधों को हमने आम मान लिया है। उन्हीं में लिप्त आदमी को अपना रहनुमा बना सकते हैं। वे लोग देश को चला सकते हैं। अब मुझे दर्द तब तक नहीं होता है जब तक कोई मेरे ही घर में घुसकर मेरे घरवालों को ना मार दें। अफसोस तो इस बात का है मैं अपने निजी जीवन में घोर मौका परस्त, स्वार्थी, ईष्र्यालु हूं लेकिन मेरे पास देश के लिए जरूर समाधान है। मैं बता सकता हंूं कि भारत को आतंकवादी हमले का समाधान कैसे करना चाहिए? यह काम भी मनमोहन के झोली में नहीं डालना चाहता।
दरअसल यह नया बरस ऐसे समय में आ रहा है जब एक महीने पहले ही मुम्बई आतंक से दहली थी। दहला तो देश का आम आदमी भी था लेकिन दिल्ली में हो रहे चुनाव में विपक्ष की पार्टी ने ऐलान किया आतंकवाद के हमलों के लिए आतंकवादियों से ज्यादा जिम्मेदार केन्द्र की सरकार है। लिहाजा भारतीय जनता पार्टी ने ऐलान किया हम आतंकी हमलों से आपको और देश को बचाएंगे। दिल्ली में चुनाव के ही दिन मुम्बई में एनएसजी के कमाण्डो आतंकियों से लड़ रहे थे और भाजपा कांग्रेस आपस में चुनाव लड़ रही थी। मेरी उम्मीद इसलिए भी कायम है कि जनता ने भाजपा की बात नहीं मानकर अपने दिल की बात मानी। फिर इसी घटना को लेकर गेटवे ऑव इंडिया पर जोर शोर से आने वाली आम जनता-?- ने कहा अब आतंकवाद को खत्म होना पड़ेगा लेकिन भारत को असमय ही अपने देशभक्तों को इसलिए खोना पड़ा कि आदित्य चौपड़ा नाम के मशहूर फिल्मकार ने रब ने बना दी जोड़ी नाम से एक फिल्म बनाई और जनता हमलों ेकी परवाह किए बिना सिनेमाघरों में दौड़ी। रब ने बना दी जोड़ी का बारहवां हुआ कि लोग आमिर खान नाम के एक राष्ट्रीय नायक पर अपना पूरा प्रेम उंडेलने दौड़ पड़े। मल्टीप्लेक्स के कोने में फटेहाल खड़े आदमी से मैंने पूछा, आप कौन हैं, यहां उदास क्यों खड़े हैं? फटेहाल शरीफ आदमी बोला, मेरा नाम भारत है। पाकिस्तान से आए कुछ लोगों ने मेरी पिटाई कर दी है। ये लोग दस दिन पहले तक तो मेरे घावों पर मरहम लगा रहे थे लेकिन अचानक शाहरूख खान और आमिर खान नाम के लोग बीच में आ गए। सारे लोग मुझे अस्पताल में छोड़ आए और खुद फिल्म देखने चले गए।
नए साल में मुझे और भी उम्मीदें हैं। दुनिया का ठेकेदार कहलाने वाला एक राष्ट्र एक नई करवट ले रहा है। पहली बार वहां अश्वेत राष्ट्रपति नए साल में काम संभालेगा और पहली बार वह देश रुपए पैसे की भीषण तंगी में फंस गया है। यहां तक इराक के पत्रकार तक उनके राष्ट्रपति को जूते से मारने की हिम्मत करने लगे हैं। इन सारे घटनाक्रम से प्रभावित होकर भारत में बेईमानी की गैस से पेट फुलाए एक पूरा संप्रदाय बौद्धिक डकारें लेकर कह रहा है कि भारत अब सुपर पावर बन ही गया है। क्योंकि हमने खेती की जमीन पर सेज बना दी है। इसलिए लोगों को अनाज पैदा नहीं करना पड़ेगा। वे अब सीधे कार ही चलाएंगे, क्योंकि मंदी को दूर करने के लिए भारत सरकार ने कारों पर लगने वाला टैक्स कम कर दिया है। रिजर्व बैंक भी अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है कि जो लोग कर्ज नहीं लेना चाहते उन्हें भी जैसे तैसे करके कर्ज में फंसाया जाए। इससे उन लोगों को मदद मिल सके जिन्होंने औन पौने दामों पर किसानों से तो जमीनें खरीद ली लेकिन उन पर दोयम दर्जे के लोहे के सरिए और कम सीमेंट लगाकर बनाए गए फ्लैट्स को मुंहमांगे पैसों पर बेच सकें। वो पैसा फिलहाल तो आम आदमी को बहला फुसलाकर बैंक दे दे और जरूरत के मुताबिक ब्याज सहित वापस ले ले। बैंक को ज्यादा जरूरत पड़ जाए तो उसके मकान की कुर्की करवाकर अपना पैसा ले ले। क्योंकि यदि कोई आदमी गर्व से साथ यह कह सकता है कि मैं भारतीय हूं तो उसे अपने ही देश में लुटने में शर्म कैसी? अब अंग्रेज तो लूट नहीं रहे कि शर्म आए। अब तो डेमोक्रेसी है। जनता का राज। जनता में जिसको लूटना आता है वह लूटे और जिसे लुटना आता है, वह लुटे। जिसे दोनों ही नहीं आता वो इस देश में कीड़ा मकौड़ा है। इंजीनियर तिवारी है जिसे बहनजी के एक विधायक ने निपटा दिया है। मुझे पक्का यकीन है कि उसेे लूटना और लुटना नहीं आता था।
इससे आदर्श क्या शासन व्यवस्था हो सकती है कि जिनकी तरफ हमें बंदूक की नली करनी चाहिए, उनकी रक्षा में लगे कमाण्डोज ने जनता की तरफ वो नली कर रखी है। मुझे सरकार के कदमों से, रिजर्व बैंक के कदमों से राहत है कि वे पूरी कोशिश करके शेयर बाजार को गिरने से बचाने में लगे हुए हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि नए साल की पहली तिमाही में वे बाजार को इतना उठाने में कामयाब हो जाएंगे कि फिर से गिरा सकें। मुझे इसलिए बहुत अच्छा लग रहा है दुनियाभर में तेल की कीमतें नीचे गिर रही हैं और सरकार कह रही है कि चुनाव आने तक पर हम भी तेल के दाम कम कर देंगे। चुनाव से इतना पहले दाम कम करने से जनता इस राहत को भूल जाएगी। शायद उन्हें वोट ना दें। इसलिए अभी तेल कंपनियों को फायदा हो रहा है फिर सरकार को होगा। इतनी पारदर्शी जनकल्याणकारी लोकतांत्रिक सरकार जिस देश में काम कर रही है उसे सुपर पावर बनने से कौन रोक सकता है। सरकारी रोडवेज बसों में चलने वाले आम आदमी को सरकार पूरा रईसी सुख देना चाहती है इसलिए ऐलान किया है कि डीजल के दाम घटने के बावजूद किराया नहीं घटाया जाएगा। जबकि पिछले डेढ़ महीने से सरकार पूरा दबाव बनाए है कि हवाई जहाजों के किराए कम कराए जाएं।
सुपर पावर बनने का एक सबूत यह भी है हमारे यहां सबसे ज्यादा डायबिटीज वाले लोग हैं। नए साल में कोशिश करेंगे कि एड्स, हार्ट, अंधता, हैजा, पीलिया, मलेरिया, डेंगू जैसी बीमारियों में भी अव्वल आएं। कैंसर के मरीज हम अमेरिका से ज्यादा करने की कोशिश करेंगे ताकि सुपर पावर बनने में जो बची खुची दिक्कत है वो भी दूर हो सके। दिल्ली इस साल कोहरे से ज्यादा प्रदूषण के धुएं की धुंध रही है, हमारी कोशिशों का और क्या सबूत चाहिए। हमारे पास हेल्थ को लेकर बाबा रामदेव से लेकर श्री श्री और मोरारी बापू और आसाराम जी जैसे लोग हैं जो बोनस हैं। अमेरिका के पास तो ऐसा एक भी बाबा नहीं हैं। जब जरूरत होती है वे हमारे यहीं से बुलाते हैं। हमारे बाबा तो पानी के जहाज में भी योग सिखा सकते हैं। यह बात अलग है कि हम पानी से आने वाले पाकिस्तानी आतंकवादियों को नहीं देख सकते। हमारे डॉक्टर भी इतने प्रोफेशनल हो गए हैं कि जहां लोग मुफ्त में आंख का आपरेशन कराना चाहें उसकी आंख को निपटा दिया जाए। आखिर घोड़ा घास से यारी करेगा तो खाएगा क्या?
एक आखिरी दिक्कत पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देने की है। नए साल में इस दिक्कत को दूर करेंगे। कोशिश करेंगे कि लड़ाई ना हो। हो जाए तो कुछ ऐसा टांका बिठाया जाए कि अगले चुनाव में उसका फायदा सरकार को मिले। हालांकि हमने बंदूकें तान दी हैं। पाकिस्तान को भी कह रखा है कि आप भी तान लो ताकि कुछ बराबरी का मामला लगे। अमेरिका दुबककर देख रहा है और कारखाने वालों को कह दिया है कि हथियार बनाकर तैयार रखो। दोनों ही अपने परिचित हैं। अब लड़ेंगे और हथियारों की मदद मांगेंगे तो मना कैसे कर पाएंगे। आखिर अमेरिका तो लोकतंत्र रक्षक देश है। दोनों ही लोकतंत्रों की रक्षा करने की कोशिश करेगा। जैसी उसने इराक और अफगानिस्तान में की।
तो नए साल से मेरी कुल मिलाकर ये उम्मीदे हैं--शेयर बाजार ऊपर उठेगा-या तो पाकिस्तान पर हमला होगा या नहीं होगा-हवाई जहाज के किराए सस्ते होंगे-रोडवेज का किराया यथावत रहेगा।-चुनाव ना होते तो रेल किराया बढ़ता, शायद अब ना बढ़े-शाहरुख, आमिर, अक्षय कुमार की रद्दी फिल्में भी लोग देखेंगे, दूसरे लोगों की अच्छी फिल्मों के भी पिटने के खतरे हैं-खुदा ना करे पर यदि अमिताभ फिर बीमार हुए तो मीडिया दो दिन तक नानावटी अस्पताल से सीधा कवरेज करेगा। खेद है कि अबकी बार आतंकी हमलों का सीधा कवरेज आप नहीं देख पाएंगे। सरकार ने कानून बनाया है कि आम लोगों के सामने पोल पट्टी ना खोली जाए-भारत के धनकुबेरों की संख्या बढ़ेगी। मलेरिया, डेंगू और भूख से मरने वालों की संख्या बढऩे की पूरी उम्मीद है।
बात खत्म करते हुए खलील धनतेजवी से जयुपर में सुना शेर याद आया है-अब मैं राशन की कतारों में नजर आता हूंअपने खेतों से बिछडऩे की सजा पाता हूं । निस्संदेह मुझे शेर अच्छे लगते है ंलेकिन यह भी लगता है कि कवि और लेखक ही इस देश को पीछे धकेल रहे हैं। इकॉनॉमिस्ट जैसे तैसे कर शेयर ऊपर उठाकर देश को आगे बढ़ाते हैं और जनाव खलील जैसे कई शायर शेर सुनाकर विकास के रथ का पहिए पंक्चर कर देते हैं। लेखकों और कवियों से नए साल में मेरी अपील है कि वे बजाय शेर सुनाने के शेयर खरीदें ताकि देश जल्दी से जल्दी सुपर पावर बन सके। आमीन।

सोमवार, दिसंबर 01, 2008

ग्रासरूट पॉलिटिक्स: कुछ नोट्स

देश के कुछ हिस्सों में चुनाव हो रहे थे, और हम लोकतंत्र में यकीन करने वाले लोग अपने कथित जिम्मेदार नेताओं को चुनने में जुटे थे तो मुम्बई में हमारे जवान आतंकियों से युद्ध लड़ रहे थे। टीवी पर जनता के चेहरे कैमरे में थे और नेताओं को बेशुमार गालियां थी। यह कौनसी जनता थी, मेरे लिए समझना जरा मुश्किल था। ठीक उसी वक्त मैं राजस्थान के कुछ हिस्सों का चुनावी माहौल देखने निकला। एक पत्रकार की हैसियत से नहीं, बस यूं ही लोगों की भावनाओं का समझने के लिए। मैंने लोगों से पूछा कि मुम्बई में हुए हमले से क्या वे प्रभावित होंगे? कुछेक मतदाताओं ने यह अनभिज्ञता जताई कि हमला कितना बड़ा है। कुछ ने कहा, जो हुआ है, वह बहुत बुरा है लेकिन हम वोट उसी को देंगे जिसे पहले देने वाले थे। क्योंकि हमले का सरकार से संबंध ही नहीं है, सब के सब नेता बदमाश हैं। अपनी राजनीति करते हैं। तो फिर वे नेता को चुनने के लिए वोट क्यों डाल रहे हैं? लोग निरीह भाव से कहते हैं, जो सामने हैं, उसमें से किसी एक को चुनना ही होगा। एक सांप है्र, दूसरा नाग है। तो अच्छे लोगों का क्यों नही खड़ा करते? बात लोगों को चुभी और जवाब मिला, चुनाव लडऩे के लिए बेशुमार पैसा चाहिए। क्या आपको लगता है कि इस देश में वैध ढंग से इतना पैसा कोई भी अच्छा आदमी कमा सकता है, कि वह राजनीति कर सके।
बात में सच्चाई थी। करोड़पति लोग चुनाव लड़ सकते हैं, वह जनसेवक नहीं, जनता का बाप बनकर आना चाहते हैं ताकि करोड़ों की संपत्ति को अरबों में तब्दील किया जा सके। मैंने कई प्रत्याशियों के चुनाव कार्यालय देखे और पाया कि वहां हरदम कोई तीस से ज्यादा ऐसी कारें खड़ी हैं जिनमें हरेक की कीमत कम से कम सात लाख से ऊपर ही है। दस साल पहले के चुनाव और आज के चुनाव में फर्क यही आया है कि मतदाता को अब भी चुनाव से ठीक पहले शराब की थैली देकर वोट हासिल किया जा सकता है लेकिन चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी की सम्पत्ति में हर चुनाव के बाद इजाफा हो जाता है। वह जीत रहा है तो कई गुना और यदि हार भी गया तो भी उसके पास धन की कमी नहीं रहती। अचार संहिता कागजी है। मैंने देखा कि एक जगह मतदाताओं ने वोट मांगने गए प्रत्याशी से मांग रखी कि उनके हैण्डपम्प का पानी खारा है, उसने तुरंत इशारा किया। काम शुरू हो गया, मीठे पानी के कुएं से उनकी कॉलोनी तक पाइपलाइन लाने का।मुझे गैर कानूनी होने के बावजूद अच्छा लगा कि किसी स्तर पर हमारा मतदाता भी नेता को ब्लैकमेल कर सकता है। उसे समझ में आ गया है चुनाव के बाद तो वही आश्वासन मिलने हैं लिहाजा चुनाव से पहले ही नेता की जेब ढीली करवा ली जाए। ऐसा मैंने कई गांवों में देखा है कि एक लाख से पचास हजार तक के काम लोग ऐसे निकलवा रहे हैं कि बहती गंगा में हाथ धोने में हर्ज क्या है? नेता वोटों के अनुपात में यह काम सहर्ष करवा रहे हैं, क्योंकि पिछले सात आठ साल में जिस किस्म से बिना मेहनत के धनवानों के और धनवान होने का सिलसिला शुरू हुआ उसमें चुनाव लडऩे के लिए आया पैसा यूं ही लगता है। एक गांव में मैं गया, लोगोंं ने बताया कि हमने प्रत्याशी से कहा, हमारे घरों के रास्ते में मिटïï्टी बहुत है। उनके सहयोगी ने नोट किया, अगले ही दिन चार ट्रक पत्थर के आए और रास्ते में जमा दिए गए। मोहल्ले के कुल सौ वोट अब इकतरफा ट्रकवाले प्रत्याशी को गिरेंगे।
ऐसे कई प्रत्याशी हैं जिनका मूल रूप से भू माफियागिरी से सीधा संबंध है। कुछ के पास अपने रसूखात और ताकत के बल पर हासिल की गई जमीन जायदाद हैं। कोई हवाला कारोबार से जुड़े हैं, स्थानीय पुलिस की कमाई को बड़ा हिस्सा देकर अपने सारे गुनाहों पर पर्दा रखते हैं। कुछ मिलाकर ग्रासरूट लेवल पर निहायत ही निराशाजनक लोकतंत्र का माहौल है। मैं एक पूर्व विधायक से मिला जो आज चुनाव लडऩे की हालत में नहीं हैं। उनके कारोबारी नुकसान और आंशिक ईमानदारी ने उनका राजनीतिक करियर खत्म कर दिया और उनकी पीड़ा हद दर्जे तक यातनाप्रद है। उन्हें अफसोस है कि वे अब निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, और उन्हें यकीन है वे इस चुनाव में हार जाएंगे।मैं विधायक की टिकट के दावेदार एक पूर्व प्रधान से मिला, जिसने गर्व पूर्वक बताया कि उसने प्रधान का चुनाव किस तरह जीता था? किस तरह मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो गया था और मैंने जाटों को जाति के लिए जीत की दुहाई दी और दलित वोटों को जरूरत से ज्यादा शराब वितरित की। उन्हें अफसोस इस बात का था कि उनके सामने जो प्रत्याशी था, वह उनके मुकाबले कम धनवान था। प्रधान कहते हैं, मेरी जीत तय थी लेकिन मैंने फिर भी दलितों और कुछ गांवों एक निश्चित राशि शराब की थैलियों के लिए बढ़ा दी थी। उनके सहयोगियों ने कहा कि क्यों पैसा खराब कर रहे हो? प्रधान ने कहा, मैं ऐसा इसलिए कर रहा हूं कि अगली बार जब कोई इन वोटों को खरीदने जाए तो सिर्फ दो दिन का नहीं बल्कि एक महीने की शराब का को कोटा लेकर आए। इशारा साफ है कि आप अमीर हैं तो चुनाव महंगा करने की कोशिश करो ताकि अगली बार कोई कमजोर प्रत्याशी सामने टिका ही न रह सके। मैंने कुछ दलित बस्तियों के कुछ वोटरोंं से भी बात की कि क्या जिस आदमी की शराब पीते हैं, उसी को वोट डाल सकते हैं, तो उनका कहना था कई बार डालते हैं और कई बार नहीं। हां, उनकी दी हुई शराब पीने में कोई हर्ज नहीं। ज्यादातर वोट अपने मन से ही डालते हैं। कुछेक मतदाता हंसते हुए बोले, अपन तो दोनों ही तरफ से आजकल पहले ही अपने कोटे की पूरी शराब मांग लेते हैं।
कुछेक मजेदार वाकये सुनने को मिले-एक गांव में प्रत्याशी वोट मांगने गया। सभा को संबोधित करते हुए लोगों से कहा, वोट दें और बगल में घंूघट में बैठी महिलाओं की ओर से इशारा करते हुए कहा, इन्हें भी समझाएं कि वोट कहां देना है? अचानक दो महिलाएं खड़ी हुई और बोली, गांव के पुरुषों को एक स्थानीय गाली देकर कहा, इनके कहने से हम वोट नहीं देने वाली। इनके पास कहां वोट हैं, ये तो शराब पीकर दिनभर पड़े रहते हैं, हमारा वोट चाहिए तो सीधे हमसे बात करो। प्रत्याशी ने महिलाओं की तरफ हाथ जोड़ लिए और माफी मांगी। यह घंूघट में छिपी नारी चेतना है जो मेेरे खयाल से अगले दस साल में और मुखर होगी।एक मुस्लिम बहुल गांव में बीजेपी के प्रत्याशी का अप्रत्याशित स्वागत देखकर मैं चकित था। लोगों ने मंच से ही उर्दू में सलामवालेकुम किया। ऐलान किया कि कांग्रेस ने हमें ठगा है। ये हमारे बीजेपी के नेता ने ही गांव में सडक़ बनाई है। हमें विकास का साथ देना है। इनकी ही सरकार ने मदरसों के सरकारी मदद दी है। शिक्षक भर्ती किए हैं आदि कई गुणगान मंचीय वक्ता ने किए। लौटते में मैंने गांव के परिचित एक मुसलमान साथी से पूछा, क्या सच है कि आप अबकी बार बीजेपी को एकतरफा वोट डाल रहे हैं? उसने मुस्कुरा कर कहा, अभी तो डाल रहे हैं लेकिन चुनाव से ठीक पहले ऐलान हो जाए कि इस्लाम खतरे में है और हम गांववाले अपना इरादा बदल दें। मेरे खयाल में किसी निष्कर्ष के बिना आप अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे मतदाता और कितने बदले हैं? और हमारा लोकतंत्र मजबूत क्यों है?

शनिवार, अक्टूबर 11, 2008

यह पतन का सूत्रपात है

यदि आप इंसान हैं और सरेराह चलते हुए कोई भिखारी आपसे कहे, भाई साहब एक रुपए का सिक्का दे दीजिए। आप देंगे। वह आपसे कहे, उसका बच्चा बीमार है, एक हजार रुपए उधार दीजिए तो आप बिदक जाएंगे और आपसे यदि वह यह कह दे कि अपना जमीर मुझे दे दीजिए, तो आप उसे एक थप्पड़ मार देेंगे या समझेंगे ये किसी पागल का प्रलाप है। आप चाय पीते हुए अखबार पढ़ रहे हैं या शाम को टीवी पर खबरों या सीरियल के बीच यह तो बड़ा टोइंग है, पर मुस्कराते हैं और चुपचाप बाजार में उपलब्ध दूसरे सस्ते उत्पादों के बावजूद चुपके से उसी खास ब्रांड की अंडरवियर खरीद लाते हैं। कमोबेश महंगी कीमत पर आप वो तेल खरीद लाते हैं, जिसके बारे में आपको यह बताया जाता है कि उसमें कोलेस्ट्रोल कम है। क्योंंकि आपको जिंदगी को टेक इट ईजी वाले सिद्धांत पर लानी है, यह सिद्धांत आपके बाप दादाओं का नहीं था। उन्हें मेहनत करनी होती थी। ज्यादा मेहनत पर कम पैसा मिलता था। अब कई मामलों एक आइडिया ही आपकी जिंदगी बदल देता है। सबीर भाटिया हॉटमेल से कमा खाते हैं। अभिषेक बच्चन मोबाइल फोन से पूरा स्कूल चला सकते हैं, अपनी पत्नी को प्रताडि़त करने के दो आरोपी, एक गैंगस्टर के साथ फरार हुई बी ग्रेड अभिनेत्री, कामयाबी के लिए संघर्षरत गायक, लगभग खत्म हो चुके करियर वाली आठ बरस पुरानी एक मिस वल्र्ड, अंग प्रदर्शन के लिए बदनाम आयटम गर्ल और एक फूहड़ मंचीय कॉमेडियन समेत पता नहीं कितने चंगू मंगू मिलकर इन दिनों आपका समय चुरा रहे हैं, जमीर चुरा रहे हैं और आपको भ्रम है कि आपका मनोरंजन हो रहा है। बिग बॉस नाम का या इस जैसे लगभग सारे ही रियलिटी शो हमारे सामाजिक मनोरंजन का हिस्सा नहीं रहा। बाजार ने हमारी जमीर पर इस तरह कब्जा किया है कि बाहर हम एक रावण जलाते हैं और घर के भीतर हर कोने में बाजार अपने पूरे दम खम रावण बनकर बैठा है। हमारी सारी नैतिकताएं ताक पर हैं। हम आधुनिक होने के लालच में यह भूल गए है कि एक थर्ड ग्रेड अभिनेत्री और एक मरहूम राजनेता का नशेड़ी और पत्नी को प्रताडि़त करने वाला बिगड़ैल रईसजादा हमारे बेड टाइम मनोरंजन के मुख्य किरदार हैं। उनके फूहड़ संवाद, कहानी में ट्विस्ट लाने के लिहाज से तय की जाने वाली खोखली सी दिनचर्या, शो को अधिक से अधिक बेचने के लिए खास बाजारू ढँग से की गई एडिटिंग। हम उनके मुख्य खरीददार हैं। दरअसल यह पश्चिम के अघाए, पेटू और निखट्टू लोगों के शगल हैं, जो उपभोक्तावाद के चरम पर पहुंचे चुके हैं। जिनके पास करने को कुछ नहीं है और वे सिर्फ पतनोन्मुख हैं। इसलिए रेव पार्टियां हैं, समलैंगिक संबंधों की वकालत है। अपने निजी जीवन में निहायत ही फूहड़, अधकचरे ज्ञान वाले और फ्लॉप दर्जनभर चेहरे बिना किसी विषय के, बिना किसी संवदेना के, बिना किसी मकसद के लिए नब्बे दिन तक एक घर में बैठे हैं। वे तीन महीने के लिए ऐसी जगह रहने को राजी हुए, यही सबूत है कि उनके पास कोई काम नहीं था। उनके जीवन से, उनके संवादोंं से किसी का कोई मनारंजन कैसे हो सकता है लेकिन लोग कह रहे हैं यह अद्भुत मनोरंजन है। क्या आप अपने बच्चों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे इस किस्म के रिलेशनशिप और भाषाई माहौल में रहें तो हम उनके साथ बैठकर इस सीरियल का आनंद कैसे उठा सकते हैं? बाजार का बिग बॉस तो यही चाहता है कि आप बिना कुछ सोचे समझे यह मानते रहे कि आपका मनोरंजन हो रहा है। बिग बॉस अपनी झोली में मुनाफा समेट रहा है। आप भिखारी को अपना पैसा अपना वक्त देने में तौहीन समझते हैं लेकिन बाजार एक सभ्य भिखारी है, वह आपका जमीर भी आपसे छीन लेता है और कुछ नहीं करते। यदि टेक इट ईजी के सिद्धांत में कोई जादू की झप्पी होती तो इसके ठेकेदार अमेरिकी समाज की आर्थिक दुर्गति न हो रही होती जिससे आज पूरी दुनिया हिली हुई है। बाजार अपने चरम पर पतन लेकर आता है और बिग बॉस जैसे रियलिटी शो उसी सिलसिले में हमें अच्छे लग रहे हैं। आर्थिक, सामाजिक और नैतिक विकास के संक्रमण वाले इस दौर में ऐसे कार्यक्रमों की भारतीय समाज में लोकप्रियता पूंजीवाद के उत्थान के बाद पतन की सहज नियति से भी अधिक तेजी से हमें पतन की ओर ले जा रहे हैं लिहाजा यह हमारे दिमागी पतन का सूत्रपात है, हम भले ही इसे व्यक्तिगत आजादी और मनोरंजन जगत में का नया सूत्रपात कहते रहें।

बुधवार, सितंबर 17, 2008

आग्रह

दिल्ली से प्रकाशित कथादेश के सितम्बर अंक में मेरी कहानी पूर्वसंध्या और पाँच यार प्रकाशित हुई है। आपसे आग्रह है कि पढ़ें । कुछ समय बाद उसे ब्लॉग पर भी प्रकाशित कर दूँगा।

गुरुवार, अगस्त 14, 2008

बाजार का दु:शासन, नैतिकता की निरीह द्रौपदी

तुम चुप रहो दु:शासन, मैं अपने पति से बात कर रही हूं- टीवी पर दिखाई जा रही नई महाभारत में यह संवाद सुनकर कोई भी आसानी से यह अनुमान लगा सकता है कि जिन लोगों ने नई महाभारत को दिखाने का जिम्मा लिया है, उनकी नजर में यह सास बहू जैसा ही ड्रामा है, जहां विवाहेतर संबंध हैं, पारिवारिक षडयंत्र हैं, प्रभुत्व और संपत्ति की लड़ाई है, लिहाजा इसे उसी चाशनी में पिरोकर पेश किया जाए जैसे सास भी कभी बहू थी, या कहानी घर घर की। यह भारतीय साहित्य और धर्म ग्रंथों के साथ क्रूर मजाक है और आश्चर्य की बात यह है कि लोग इस देख भी रहे हैं। वे लोग देख रहे हैं जो गणेशजी को दूध पिलाने भाग निकलते हैं, पपीते में शिवलिंग की आकृति देखकर पूरे सावन उसे घर में रखकर पूजा करते हैं। मुझे ताज्जुब होता है कि इस तरह की कोशिशों का विरोध क्यों नहीं होता?
याद करिए रामायण और महाभारत के प्रसारण के दूरदर्शन के दिन। जब लोग नहा धोकर अगरबत्ती लगाकर पर्दे पर आंख गड़ाते थे। कहीं भी नहीं दिखता था कि इन ग्रंथों के पर्दे पर रुपान्तरण के लिए उनका व्यवसायीकरण किया गया हो। उस जमाने में भी कमर्शियल ब्रेक का रिवाज भी यह था कि सीरियल शुरू होने से पहले ही आकर निपट जाते थे। द्रौपदी और सीता को ग्लैमरस दिखाने की कल्पना भी बीआर चौपड़ा और रामानंद सागर ने नहीं की होगी। एकता मैडम की नई महाभारत का आगाज ही चीरहरण के दृश्य के साथ हुआ। तो क्या एक बार महाभारत या रामायण बन चुके हैं तो कोई उन्हें दुबारा नहीं बना सकताï? बेशक उसे बनाने का हक है लेकिन उसकी आस्था ऐसी होनी चाहिए। उसकी नजर बाजार पर नहीं होनी चाहिए। आपको अपने धार्मिक ग्रंथों को गलत रुपान्तरण के साथ नहीं बेचना चाहिए। यह बहुत बड़ी व्यावसायिक धूर्तता है कि आप अपने फायदे के लिए उन ग्रंथों का अपने ढंग से रूपांतरण करें, जिनमें करोड़ों लोग आस्था रखते हों। सामाजिक दायित्त्वबोध बात छोड़ दीजिए, बाजारू सीरियल बनाने वालों से यह उम्मीद बेमानी है, लेकिन आपको यह नैतिक अधिकार ही नहीं बनता कि आप मर्जी के मुताबिक किसी साहित्यिक और धार्मिक और ऐतिहासिक कलाकृति को अपने मुनाफे लिए इस्तेमाल करें।
रामानंद सागर के वंशजों की ओर से नई रामायण दिखाई जा रही है। वो अपने प्रचार के चलते व्यावसायिक रूप से भले ही कामयाब हुई हो लेकिन वह रत्तीभर वो जादू उत्पन्न नहीं कर पाई जो पहले दिखाई गई रामायण में था। वे शुरुआती ध्वनियां जादुई ढँग कानों में गूंजती हैं- मंगल भवन अमंगल हारी या यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानि भवति भारत:। एक आस्था भाव होता था। अब आप नए भीम का इंटरव्यू पढि़ए, जब वो कहता है कि वह आजकल जिम में ज्यादा एक्सरसाइज करता है ताकि मांसपेशियां दिखा सके। यह समझना कितना मुश्किल है कि भीम को मांसपेशियां दिखाना जरूरी नहीं था। बॉबी बेदी जैसे नामी निर्माता भी महाभारत बनाने की दौड़ में हैं और एकता कपूर के खेमे ने उनके कई पांडव और कौरव तोडक़र अपनी तरफ भर्ती कर लिए हैं। क्या मजाक है? ऐसी महाभारत की या ऐसी रामायण के दूसरे संस्करण बनाने की जरूरत क्या थी? मनोरंजन के इतिहास में विश्वविख्यात कृतियों पर अपने ढंग से काम करने का रिवाज रहा है, जो चलताऊपन एकता कपूर के खेमे की तरफ से महाभारत जैसे महाकाव्य के साथ हुआ है, वैसे ही उदाहरण गिने चुने ही मिलेंगे। संवदेनशील फिल्मकार बहुत ध्यान से एडेप्टेशन करते हैं। जापान के मशहूर फिल्मकार अकीरा कुरोसावा ने शेक्सपीयर के मैकबेथ पर थ्रोन ऑव ब्लड फिल्म बनाई और भारत के विशाल भारद्वाज ने इसके कई बरस बाद मकबूल बनाई। ये बेहतरीन कोशिशें रहीं। कहने का अर्थ है कि दुनियाभर के फिल्मकार और मनोरंंजन उद्योग से जुड़े लोग ये कोशिशें करते रहते हैं और अलग अलग ढंग से तारीफ या आलोचना का शिकार होते हैं लेकिन एकता कपूर नई महाभारत बनाकर बीआर चौपड़ा की बनाई महाभारत के साथ ऐसा ही कर रही हैं जैसा रामगोपाल वर्मा ने शोले के साथ किया। एकता का कसूर रामू से भी ज्यादा इसलिए है कि भारतीय आस्थाओं के इस महाग्रंथ को बाजारू नजरिए से देख रही हैं। उन्हें ये ध्यान रखना चाहिए कि महाभारत के दर्शकों और सास बहू की खिचड़ी में खुश रहनी वाली मध्यवर्गीय महिला दर्शकों में रात दिन का अंतर है। लेकिन नई महाभारत के साथ ऐसा ही हो रहा है।

भारतीय टेलीविजन इस समय घोर संक्रमण का शिकार है। अचानक चैनलों की बाढ़ आई है और यदि आप मुम्बई की हकीकत जानते हैं तो आसानी से बता सकते हैं कि वहां किस तरह कम प्रोफेशनल्स और लगभग निपट मूर्खों की टीवी इंडस्ट्री में भरमार हुई है। अचानक बढ़ी इस जरूरत को पूरा करने के लिए अफरा तफरी और प्रतिस्पर्धा में जो जितना तेज दौड़ रहा है, वहीं कामयाब माना जा रहा है। एकता इनकी प्रतिनिधि मानी जा सकती हैं। वरना कसूर कम रामानंद सागर के वंशजों का नहीं है, जो रामायण का भी कमजोर रूप लेकर आए हैं और उसका प्रचार यह कर रहे हैं कि इसे देखकर बच्चों में संस्कार आएंगे। यह आम लोगों को बेवकूफ बनाकर मुनाफा कमाने की साजिश है, विज्ञापन में बच्चों को संस्कार देने की बात कहेंगे और प्रस्तुति में ऐसा गड्ड मड्ड करेंगे कि आपके बच्चे किसी भी महान कृति का ठीक से विश्लेषण कर पाने की स्थिति में नहीं रहेंगे।करीब डेढ़ दशक पहले जो टीवी का चेहरा था, उससे नितांत अलग चेहरा अब बन गया है। यह मत भूलिए कि रामायण और महाभारत सीरियल को बनाने की पहले दूरदर्शन की थी। महाभारत के संवाद राही मासूम राजा ने लिखे थे, और वे आज भी लोगों की जुबान पर हैं। अब जो टीम महाभारत बना रही है, उनमें ज्यादातर तो ऐसे हैं, जब वे उस महाभारत को समझ नहीं सकते थे या टीवी देखना नहीं सीखा था। मुमकिन है बहुतों के घर में टीवी भी नहीं था। जयपुर के आमेर और आस पास के इलाकों में महाभारत की शूटिंग हुई। आप खुद सोचिए महाभारत काल और मुगल स्थापत्य के अंतर को सैट पर कैसे न्यायसंगत कहा जा सकता है। तमाम सरकारी अकर्मण्यता के बावजूद दूरदर्शन ने एक दौर में भारतीय टीवी का चेहरा स्थापित करने में महती भूमिका अदा की। आज भी सिर्फ दूरदर्शन देखकर ही लगता है कि भारत गांवों का देश है, वरना नए चैनल देखकर तो यूं लगता है कि हम एक महानगरीय देश में रह रहे है, जहां कोई दुख दर्द ही नहीं है। सिर्फ इतनी सी तकलीफ बची है कि सास बहुएं आपस में षडयंत्र करती हैं। ये खत्म हो जाएं तो देश विकसित हो जाएगा। दुर्भाग्य से महाभारत को यह घटिया संस्करण भारतीय टीवी इंडस्ट्री की उसे महिला के नेतृत्व में बन रहा है जिसके बारे में देश में विख्यात है कि वह घोर धार्मिक आस्थाओं वाली है। दरअसल आस्था के इस मिथ्या प्रचार में गाफिल रहने वाले लोगों को यह पता नहीं होता कि बाजार की आस्था सिर्फ मुनाफा है, वहां की नैतिकता यही कहती है कि घटिया या अच्छी कैसा भी रूप आए, बाजार में पहले हमारी महाभारत आनी चाहिए। अभिनेताओं के नाम पर वहां मॉडल्स और मसखरों का टोला है। मुकेश खन्ना जैसे भीष्म क्या कभी दुबार पैदा हो सकते हैं लेकिन टीवी के शाहरूख खान या अमिताभ बच्चन कहलाने वाले एक अभिनेता यह रोल कर रहे हैं और एक इंटरव्यू में यह दंभ भी कर चुके हैं कि लोग उन्हें पसंद ना भी करेंगे तो उसमें वो ताकत है कि लोगों का अपना कायल कर लेंगे। अभिनय में यह दंभ नहीं चलता। नाट्य शास्त्र में आचार्य भरत कहते हैं- जियो तो ऐसे कि अभिनय कर रहे हो, अभिनय करो तो ऐसे कि जी रहे हो। यह दंभ ना भीष्म में था,ना मुकेश खन्ना में। लेकिन नए दौर के धार्मिक अभिनेताओं की मंडली में कुछ भी संभव है।

गुरुवार, जुलाई 31, 2008

पॉलिटिक्स अनिलिमिटेड

अहमदाबाद के धमाके से ठीक एक दिन पहले बंगलौर में धमाके हुए और उससे दो दिन पहले भारतीय संसद में एक भयानक धमाका हुआ। विपक्षी पार्टी की एक खास नेता सुषमा स्वराज की तरफ से सोचा समझा बयान भी आया कि धमाके संसद में हुए कांड से ध्यान हटाने कोशिश हो सकते हैं। साठ बरस की आजादी के बाद हम राजनीति के ऐसे दलदल में खड़े हैं, जहां आतंकवाद, जातीय संघर्ष, भ्रष्टाचार जैसी तमाम बुराइयां वर्चस्व की लड़ाई के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं लिहाजा इनसे लड़ने के तौर तरीके और प्राथमिकताएं पिछड़ रही हैं। हम भूल चुके हैं कि हमें एक राष्ट्र के रूप में किस तरह काम करना चाहिए। गौर से देखिए तो यह निष्कर्ष आसानी से निकाले जा सकते हैं, हमारे नेताओं की पिछले साठ बरस से चल रही मूल्यहीन नौटंकी ने हमें इस मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है कि हर साइकिल पर लटके टिफिन बॉक्स में बम ही नजर आता है।
बाईस जुलाई को संसद में जो कुछ हुआ, उसमें हम दिल खोलकर बीजेपी की बुराई कर सकते हैं लेकिन क्या यह सच नहीं कि कुल मिलाकर संसद में दिख रहा राजनीति का वह चेहरा हमारी जनता की सोच और नैतिक मूल्यों का एक प्रतिबिंब था। हम सब कुछ जानते हैं कि सांसद खरीदे और बेचे जा सकते हैं। हमें पता है कि सांसद सवाल पूछने के लिए भी पैसे ले लेते हैं, हम जानते हैं हमारे राजनेता जातीय, क्षेत्रीय और हर उस आधार पर राजनीति करते हैं, जो स्पष्ट तौर पर अनैतिक है। वे हर हाल में वर्चस्व के लिए लड़ते हैं और हम अपना कीमती वोट उन्हें देते हैं। हर बार लोग कहते हैं, जनता सुधार चाहती है? अपने गिरेबान में झांकिए, अपने तबादले के लिए, अपने रिश्तेदार की पोस्टिंग के लिए, मुकदमे में फंसे अपने परिचितों के लिए हम सब नेताओं के मार्फत यथासंभव सत्ता का उपभोग करने की कोशिश करते हैं। यदि हमारे पास वो जुगाड नहीं है तो हम पैसे के बल पर अपने काम निकलवाना चाहते हैं। कुछेक आबादी को छोड़ दें तो कुल मिलाकर यह मान लिया गया है कि आपके पास सत्ता है तो आप सुखी हैं, अन्यथा आपके पास सिस्टम से लड़ने का कोई ठोस उपाय नहीं है।

यह निहायत बचकाना लग सकता है कि बम धमाकों, राजनीतिक भ्रष्टाचार और आम आदमी के चरित्र के अंतर्सबंध क्या हैं? लेकिन मुझे अक्सर यह लगता है कि पूरे तंत्र को खोखला करने में हम सामूहिक रूप से काम कर रहे हैं और उसका सर्वाधिक फायदा अलगावादी ताकतें उठाती हैं, अन्यथा सौ करोड़ आबादी में मुट्ठी भर अलगाववादियों की बिसात नहीं कि वे एक दो महीनों और एक दो दिनों के अंतराल के बाद जहां चाहें वहां धमाके कर दें। उससे ठीक पहले उसका वीडियो भी बना लें और फिर धमकी भरा ई मेल भी भेज दें कि अभी और किन शहरों में वे धमाके करने वाले हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा खुफिया तंत्र और पुलिस की विफलता की उठाया जाता है। आप पुलिस की हालत देखिए। उनके काम करने के तौर तरीके देखिए। उनके आधुनिकीकरणा की गति देखिए। सब कुछ जर्जर है। इसे जर्जर करने वाला कौन है? हमारा राजनीतिक तंत्र। आप जैड प्लस में चलेंगे। आप गुजरेंगे तो आम जनता चौराहों पर जाम में फंसी खड़ी रहेगी। उसके साथ आपकी सुरक्षा में लगी पुलिस का व्यवहार इस तरह होगा जैसे जनता ही हत्यारी है और उसने आपको मारने की सुपारी ली है। फिर पुलिस तंत्र में पोस्टिंग का मामला मलाईदार और ठंड का है। राजनीतिक मुंहलगे अफसर और पुलिसवाले मलाईदार पद पाएंगे। मलाईदार पद का अर्थ साफ है कि आप उन्हें बेशुमार रिशवत और भ्रष्टाचार से कमाने का खुला अवसर देते हैं। जिन पुलिसवालों पर रिशवत और हरामखोरी की चर्बी बुरी तरह चढ़ चुकी हो, उनसे आप क्या उममीद करेंगे कि वे बम धमाकों या दूसरे समाजकंटकों से अपने नागरिकों की रक्षा करेंगे। यही हाल आपकी खुफियागिरी का है। वे लोग इस बात की रिपोर्ट ज्यादा करते हैं कि इस बार कौनसी पार्टी चुनाव जीतेगी। सरकारी तंत्र उसे पूरी तरह अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए इस्तेमाल करता है।

फिल्मकार गुलजार ने 1975 में फिल्म बनाई थी- आंधी। राजनीतिक रूप से महत़वाकांक्षी पिता अपनी बेटी को सत्ता में देखना चाहता था और इसी वजह से उसके पति से उसके संबंध खराब हुए लेकिन जब चुनाव में लोग उस पर कीचड़ उछालने लगे तो पति नैतिकता की लड़ाई में उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हुआ। वहां सत्ता पाने की राजनीतिक उठापटक तो थी लेकिन नैतिकता के प्रति यह आग्रह उस दौर की राजनीति में लगता था। गुलजार ने ही 1995 में माचिस बनाई। आतंकवादियों को पकड़ने में पुलिस तंत्र के अत्याचार और नए बदमाश पैदा करने में पुलिस की भूमिका साफ दिखती है। 1999 में वही फिल्मकार हु तु तु बनाता है। कहानी का ताना बाना आंधी जैसा ही है लेकिन वहां वर्चस्व की लड़ाई में नैतिकता खत्म हो गई है। हत्या, भ्रष्टाचार और निजी स्वार्थ केंद्र में आ गए हैं। लिहाजा यहां जब नायिका सत्ता का निणायक लड़ाई लड़ रही होती है तो उसका पति उसे छोड़कर गांव चला गया है। उसकी बेटी ही उसकी हत्या में भागीदार बनती है। हालांकि यह गुलजार का फिल्मी इंटरप्रेटेशन कमजोर था लेकिन इस रूपान्तरण के भी दस बरस बाद आज नेताओं की अगली पीढ़ी को देखिए। उनकी संतानें दलालों की तरह काम करने लगी हैं। यह हम देख ही चुके हैं कि अर्थव्यवस्था के उभरते क्षेत्रों में नेताओं की संतानें किस तरह अपने पिताओं और आकाओं की सत्ता का इस्तेमाल करते हुए एक भ्रष्ट तंत्र की जड़ें सींच रहे हैं। पेट्रोल पंप, रियल एस्टेट, शॉपिंग मॉल्स, एजेंसियां, सरकारी ठेके मुनाफे के बड़े कारोबारों में मंत्रियों, सांसदों, विधायकों और उनकी संतानों या रिश्तेदारों की भागीदारी मिलेगी।

सत्ता का दुरुपयोग कर आप एक पूरे तंत्र को खोखला करने में जुटे हैं। संस्थानों की विश्वसनीयता खत्म कर रहे हैं। आप विश्वसनीय नहीं है, आपकी पुलिस विश्वसनीय नहीं है, आपका खुफिया तंत्र भरोसे के काबिल नहीं है, आपकी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं स्वहित पोषक हैं। इन सबसे बचने की कोशिश करती हुई जनता हरेक चुनाव में संसद या विधानसभाओं में आपराधिक छवि वाले नेताओं की तादाद बढ़ा देती है। अपने मानवीय होने का सबूत देती है कि देखो, बम धमाके में लोग मरे हैं और रक्तदान करने वालों की तादाद इतनी बढ़ गई है। यह छदम राष्ट्रप्रेम बहुत दिन नहीं चलेगा। मुसीबतें देखकर आंख मूंदने से वे खत्म नहीं होती। इस देश के दर्द को महसूस कजिए। राजनेतओं को जवाबदेह बनाइए।