शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

कड़वी गोली, मिश्री के साथ


फिल्म समीक्षा: पीपली लाइव



आमिर खान प्रॉडक्शन्स की अनुषा रिजवी निर्देशित फिल्म पीपली लाइव में शुरू से अंत तक आप हंसते ज्यादा हैं। लेकिन यह खिसियानी हंसी है। हंसी लगभग वैसी है जैसे शायर ने कहा कि तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो।
कहानी में बुधिया और नत्था नाम के भाई किसान है, जो पुरखों की जमीन बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इलाके के नेता ने उन्हें किसी आत्महत्या की योजना की बारे में बता दिया है कि ऐसा करने से एक लाख रुपए मिलेंगे। बड़ा भाई बुधिया कहता है कि उसका वश चलता तो पुरखों की जमीन बचाने के लिए वह अपनी जान दे देता। उसके बार बार के उलाहने सुनकर छोटे नत्था ने कहा, तुम क्यों दोगे भैया, मैं जान दूंगा। बात एक स्थानीय पत्रकार के कान में पड़ती है, लोकल अखबार में छपती है। नेशनल चैनल में पहुंचती है और भेड़चाल वाले मीडिया के दर्जनों पत्रकार नत्था के गांव पीपली में डेरा जमाते हैं। चुनाव का वक्त है। एक पार्टी को नत्था के मरने से फायदा है, दूसरे को नत्था के जीने से। राजनीति शुरू होती है। गांव में मेला लग गया है। इसी कहानी में सरकारी योजनाओं का खोखलापन भी दिखता है, जब लालबहादुर योजना का हैंडपम्प जिलाधीश की ओर से भेज दिया जाता है, एक स्थानीय नेता की ओर से रंगीन टेलीविजन भेंट किया जाता है। दोनों उस मरते किसान के लिए गैर जरूरी हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री राज्य सरकार पर आरोप लगा रहे हैं और राज्य केंद्र पर। अतिरिक्त सुरक्षा से घिरे, बार बार पाखाने जाते नत्था का क्या होता है, यह फिल्म में देखने की बात है। लगे हाथ मीडिया की टीआरपी की भी खबर निर्ममता से ली गई है, जब अंग्रेजी पत्रकार नंदिता मलिक से राकेश बुनियादी सवाल पूछता है कि मीडिया को नत्था की मौत में ही क्यों दिलचस्पी है? और भी किसान मर रहे हैं, तो नंदिता कहती है, यदि वह इतना सोचता है तो उसे अपने लिए कोई और काम ढूंढऩा चाहिए।
तमाम हास्य के बीच व्यंग्य के तीखे तीर हैं। कृषि भवन में बैठा अंग्रेजीदां बंगाली अफसर दार्जिलिंग की चाय सुड़क रहा है और नत्था की हालत से चिंतित अपने युवा अफसर को कहता है कि तुम बहुत जल्दी घबरा जाते हो। यह गैंडे के खाल वाली नौकरशाही है। नत्था के गायब होने के बाद नौकरशाह, नेता, मीडिया सब अपने ठिकाने पर हैं। किसान के घर की हालत वैसी की वैसी है्र। जो पत्रकार संवेदनशील था, उसकी जान चली गई है। इस क्रूर दौर में संवेदनशील लोगों का यही हश्र हो रहा है। पीपली लाइव एक कड़वी दवा है, जिसमें मिश्री मिली हुई है तो निगलने में आसानी होती है। उस हंसी के पीछे बीमारी का दर्द,्र एक तंत्र की सड़ांध को कब तक छुपाया जा सकता है?
कहानी अच्छी है, संवाद चुटीले हैं। तंज है और शुरू से अंत तक बांधे रखने की क्षमता भी। रघुवीर यादव तो अच्छे अभिनेता हैं ही नत्था की भूमिका में ओंकार दास माणिकपुरी का काम काबिले तारीफ है। संगीत एकदम ताजातरीन है। जिसमें महंगाई डायन तो है ही। देश मेरा रंगरेज में इंडियन ओशियन बैंड का खूबसूरत म्यूजिक है। आमिर खान हैं तो इसका प्रचार भी है, वरना श्याम बेनेगल की फिल्म होती तो इतना स्टारडम कैसे आता? आमिर के बहाने ही सही, फिल्म देखने जरूर जाएं। आप निराश नहीं होंगे। परिवार के साथ जाने के इच्छुक दर्शकों के लिए सूचना है कि फिल्म में गालियां ठीक ठाक हैं, जो गांव की जुबान का ही हिस्सा हैं।

शनिवार, अगस्त 07, 2010

हौले हौले चलती प्रेम कहानी

फिल्‍म समीक्षा-आयशा
अनिल कपूर फिल्म कंपनी की फिल्म आयशा इस हफ्ते रिलीज हुई है। इसमें सोनम कपूर और अभय देओल लीड में हैं। फिल्म प्रेम कहानी है लेकिन इतनी धीमी है कि दो घंटे की फिल्म यूं लगती है, जैसे बहुत लंबी चल रही है।

आयशा एक अमीर घर की लड़की है जो मिडिल क्लास टाइप कुछ नहीं करती। उसे चलते फिरते लोगों की जोडियां बनाने में बड़ी दिलचस्पी है। उसकी सबसे खास दोस्त पिंकी उसके साथ है और बहादुरगढ से आई शेफाली के लिए वे लड़का ढूंढ रही हैं। इस भागदौड़ में शेफाली को वे आधुनिक बनाने पर तुली हैं।

अंतत: आयशा के आदतों से ऊब कर उसकी खास दोस्त उसी आदमी को प्यार करने लगती है जिसका वो अक्सर अपमान करती रहती थी। आयशा अब भी कन्फ्यूज्ड है कि वह किससे प्यार करती हैं। सोनम कपूर, इरा दुबे और आरती पुरी ज्यादातर समय स्क्रीन पर मौजूद रहती हैं और इनके बीच अभय देओल, साइरस साहूकार ओर अरूणोदय सिंह जरूरत के हिसाब से आते हैं।

निर्देशक राजश्री ओझा ने जीन ऑस्टिन के उपन्यास ऎम्मा के कथा सूत्रों से प्रेरित यह फिल्म खड़ी करने की कोशिश की है लेकिन अव्वल तो इस किस्म की पारिवारिक फिल्मों की भारतीय दर्शकों को आदत नहीं है। दूसरे, उन्होंने फिल्म को बहुत अच्छा नहीं बनाया है।

देविका भगत के स्क्रीनप्ले में झोल नहीं है लेकिन उसकी गति ही उसे कमजोर कर देती है। खासकर इंटरवल से पहले तक तो कहानी कुछ आगे बढती नहीं है। इंटरवल के बाद घटनाएं कुछ होती हैं तो एक लंबे क्लाइमैक्स ने सारी गड़बड़ कर दी। फिल्मांकन अच्छा किया गया है। जावेद अख्तर के ठीक ठाक से गीतों पर अमित त्रिवेदी का संगीत और पाश्र्व संगीत ज्यादा अच्छा है।

कुछ रूमानी क्षणों को निर्देशक ने बहुत अच्छे से हैंडल किया है लेकिन ओवरआल इसकी धीमी गति सपाट कथानक ही मारक है। आपको पता है कि रिलेशनशिप किस किस में विकसित हो सकती है लेकिन वह विकसित होने के दौरान के दृश्य गायब हैं।

कॉलेज गोइंग यूथ और किशोर यदि इसे पसंद करें तो बेहतर हैं। हमारी फिल्मों की प्रेम कहानियों को कालखंड भी छोटा सा होता है। लड़का लड़की मिलना, तनाव और प्यार हो जाना। सब कुछ सतही सा। सोनम कपूर अच्छी लगी हैं। उनके पिता की भूमिका में एमके रैना को देखना सुखद है। अभय देओल ने अंडरप्ले किया है लेकिन अपने रोल में वे फिट हैं।

और अब एक स्टुपिड बात। खबर प्रचारित की गई थी कि सोनम कूपर ने पहला ऑन स्क्रीन किस दिया है। क्लाइमैक्स से ठीक पहले अभय देओल सोनम के पलकों के ऊपरी हिस्से के चूमते हैं। फिर अपनी चुटकी में पकड़कर उसकी नाक हिलाता है, होठों के करीब आने से पहले कैमरे की आफसाइड अपना मुंह ले जाते हैं। बार बार लॉरेल का मेकअप करती सोनम के होठों पर कोई छुअन तक नहीं हैं। आप इसे किस मानें तो मान लीजिए। एक युवा दर्शक की टिप्पणी सुनिए, यार, इमरान हाशमी और अभय देओल में कुछ तो फर्क होगा ही।

शनिवार, जुलाई 31, 2010

नॉस्‍टेल्जिक असर वाली माफियाओं की मुंबई


इतिहास अपने आपको दोहराता है। कुछ कहानियां आप कभी भी चुनकर अपने ढंग से कह सकते हैं। गैँगस्टर्स की कहानियां भी ऎसी ही हैं। वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई निर्माता एकता कपूर और निर्देशक मिलन लूथरिया की ऎसी ही फिल्म है जिसमें मुंबई में माफिया गिरोहों के पनपने की कहानी है।

कहानी में ऎसा संकेत भी दिखता है कि यह हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम के चरित्रों से प्रेरित हैं। अनाथ बालक सुल्तान मिर्जा एक दिन मुंबई पर राज करने लगता है और उसके पास काम मांगने आया शोएब खान एक दिन उसका सबसे भरोसेमंद आदमी बन जाता है। सुल्तान एक दरियादिल आदमी है, जिसे आप दीवार और मुकद्दर का सिकंदर के अमिताभ, धर्मात्मा के विनोद खन्ना, दयावान के फिरोज खान आदि से मिला सकते हैं। यहां तक कि वह मां को परेशान करने वाले बेटे को भी पीट देता है। तस्कर है लेकिन उन्हीं चीजों की तस्करी करता है जिनके लिए सरकार मना करती है, उनकी नहीं जिनके लिए जमीर मना करता है।

सुल्तान को भी लाल बत्ती का लालच है और दिल्ली में मंत्री से डील करने के लिए जाते समय मुंबई का काम शोएब खान को सौंप गए। शोएब की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा बड़ी हैं और इसकी कीमत सुल्तान को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। सुल्तान कभी नहीं चाहता था कि शहर में गंदगी फैले। लेकिन शोएब ने खून खराबा आम कर दिया। कहानी एक पुलिस अफसर विल्सन के फ्लैश बैक में चलती है जिसने इस अपराध बोध में आत्महत्या करने की कोशिश की कि वह इस शहर को तबाही तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार बना। वह जानता था कि माफियाओं के गैर कानूनी कामों को रोका जा सकता था लेकिन वह आपसी गैंगवार से उन्हें मारना चाहता था। आज मार्च 93 के दंगों का भगौड़ा हमारी पकड़ में नहीं है।

कुल मिलाकर फिल्म एक पुरानी मुंबई की सैर कराती है और आपको ऊब नहीं होती। लेकिन याद रहे यह सत्या या कंपनी जैसी फिल्म नहीं है। यहां डॉन गंुडा होने के बावजूद मसीहा है। यहां वास्तव का रघु भी नहीं है, जो अपने किए पर एक अंदरूनी यात्रा करता है और पछताता है। प्यार के दृश्यों को भी अच्छा फिल्माया है जब अपनी पसंदीदा अभिनेत्री के लिए सुल्तान मिर्जा एक अमरूद चार सौ रूपए में खरीदकर ले गए। अजय देवगन ने जानदार काम किया है।

इरशाद कामिल के गीत अदभुत हैं और प्रीतम का संगीत भी लोकप्रिय हो ही चुका है। सबसे सुखद अनुभव यही है कि पुरानी सी दिखती मुंबई, पुराने पहनावे, पुराने गहने, सब अच्छे लगते हैं। मिलन लूथरिया की पुरानी फिल्मों से यह बेहतर है लेकिन इसी विषय पर बनी कई और फिल्मों से कमजोर। सत्तर के दशक के डॉयलॉग्स अपने जादू के साथ हैं। जैसे मैं कोयले की खदान में मशाल से रोशनी करने चला था, खदान ही जल उठी। या गुफा में चाहे कितना ही अंधेरा हो किनारे पर रोशनी जरूर होती है। तो एक नॉस्टेल्जिक अनुभव के लिए आप फिल्म देख सकते हैं। यह एक लोकप्रिय मसाला फिल्म है। माफिया पर बनी क्लासिक फिल्म नहीं।

शनिवार, जुलाई 10, 2010

फार्मूला कहानी में किस्मत का छौंक

फिल्‍म समीक्षा मिलेंगे मिलेंगे
‘मिलेंगे मिलेंगे’ इस हफ्ते रिलीज हुई है। फिल्म के निर्देशक सतीश कौशिक हैं और निर्माता बोनी कपूर। शाहिद कपूर और करीना कपूर की ऑफ स्क्रीन प्रेमकहानी खत्म हो चुकी है और यह फिल्म उसी समय बननी शुरू हुई थी जब दोनों के करीबी रिश्ते थे। जाहिर है इस जोड़ी के खत्म हो चुके रोमांस की वजह से फिल्म को कोई फायदा होगा इसकी ज्यादा अपेक्षा नहीं है।
प्रिया नाम की एक लडक़ी को एक टेरोकार्ड रीडर कहती है कि उसे उसके सपनों का राजकुमार विदेश में किसी समंदर के किनारे महीने की सात तारीख को सुबह सुबह सात रंग के कपड़े पहने मिलेगा। यह बातें उसने डायरी में लिखी और गलती से उसके कमरे घुसे लडक़े इम्मी ने वह डायरी चुरा ली। उसी क्रम से वह समंदर किनारे मिला और प्रिया को उससे प्यार हो गया। अचानक ही प्रिया की चुराई हुई डायरी की फोटोकॉपी इम्मी के कमरे से उसे मिल जाती है। वह समझती है कि उसके साथ धोखा हुआ है। बात बिगड़ जाती है। किस्मत ने ही उन्हें मिलाया है तो वह उसे चुनौती देती है, पचास के नोट पर लडक़े के टेलीफोन नंबर लिखकर और उससे किताब खरीदकर उस किताब पर लडक़ी ने अपने नंबर लिख दिए। किताब उसने किसी और शहर में बुकस्टोर को दे दी। ये जिस दिन एक दूसरे को मिल जाएंगे तो मान लेंगे कि किस्मत हमें मिलाएगी। बाद में दोनों एक दूसरे को ढूंढ़ रहे हैं। सूचना संजाल के आज के जमाने में दिल्ली मुंबई में घूम रहे प्रेमी एक दूसरे को ढूंढ नहीं पा रहे हैं, यह बात जरा हजम नहीं होती। लेकिन शाहिद करीना के फैन चाहें तो इस फिल्म को भी देख सकते हैं।
एक पुराने फार्मूला कहानी पर बनी इस औसत प्रेमकथा कोई चामत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद कम ही है। हालांकि फिल्म को संपादन के लिहाज से चुस्त किया गया है लेकिन डबिंग और कथा प्रवाह की अपनी समस्याएं हैं। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर को भी समकालीन करने की कोशिश की गई है लेकिन कमजोर कहानी ने सब गड़बड़ कर दिया है। हां, करीना और शाहिद बहुत खूबसूरत लगे हैं। वे तरोताजा दिख रहे हैं। हिमेश का संगीत अब आउटडेटेड लग रहा है।

फिल्म: रेड अलर्ट

नक्सलवाद के इर्द गिर्द मानवीय कहानी

खासकर उस समय जब देश के कई जिल नक्सलवाद की समस्या से ग्रस्त है, निर्माता टीपी अग्रवाल और निर्देशक अनंत महादेवन की फिल्म ‘रेड अलर्ट’ नक्सलवाद के भीतर फंसे एक आदमी की कहानी के बहाने उसके मानवीय अमानवीय चेहरे पर बात करते हैं। फिल्म प्रकारांतर से गरीब आदमी के नक्सली बनने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर आशंकित एक पिता की कहानी है। वह पहले ही दिन खाना बनाकर नक्सली कैंप में पहुंचाता है लेकिन पुलिस उसका पीछा करते हुए कैंप पर हमला कर देती है। उसके बाद वह कैंप में फंस जाता है। वहां प्रशिक्षण के दौरान वह लगातार अपने परिवार की चिंता करता रहता है। अतंत: एक दिन वह अपने कैंप कमांडर की हत्या कर वहां से भाग छूटता है। उसके बाद वह सरकारी गवाह बनता है और अपने ही साथियों को मरवाने में सहयोग करता है। इस बहाने निर्देशक ने बताया है कि किस तरह नक्सलियों को पकडऩे के बहाने पुलिस सीधे सादे आम लोगों पर अत्याचार करती है। उन पर दोहरी मार है। प्रकारांतर से नक्सलियों के तरफदारी करते हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन उनके सिस्टम पर भी तंज है। जब उनकी टुकड़ी के सैन्य मुखिया बने आशीष विद्यार्थी एक पत्रकार को यह कहते हैं कि हमने विकास कार्य भी कराएं हैं। लोगों को बेहतर पैसा दे रहे हैं, उसी समय कैंप में आया नया नक्सली आकर यह कहता है कि आपने वादा किया था कि महीने के पंद्रह सौ मिलेंगे और अभी तक नहीं मिले।
नक्सलियों के नियम कायदे और भीतरी अंतद्वंद्व को फिल्म दिखाती है। फिल्म को और बेहतर किया जा सकता था। फिल्म के कुछ हिस्से बहुत ही अच्छे हैं। संवाद चुस्त हैं। लगातार किताबें पढने वाले नक्सली नेता से जब नरसिम्हा पूछता है कि अन्ना आप किताबें क्यों पढ़ते रहते हैं,तो वह कहता है, इनमें गोली से भी ज्यादा ताकत होती है। एक अच्छा दृश्य तब बनता है जब स्कूल में पुलिस के छिपाए हथियारों को लूटने के लिए नक्सली
सुनील शेट्टी ने ठीक काम किया है। आशीष विद्यार्थी, सीमा बिस्वास, विनादे खन्ना, सुनील सिन्हा और भाग्य श्री मुख्य भूमिकाओं में हैं।

शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

अपनों पै करण, गैरों पै सितम



फिल्म समीक्षा: आय हेट लव स्टोरीज

-रामकुमार सिंह
करण जौहर के बैनर से रिलीज इस हफ्ते रिलीज ‘आय हेट लव स्टोरीज’ में लव और स्टोरीज की स्पेलिंग एसएमएस की जुबान वाली है। अंदाजा था कि यह उन दर्शकों के लिए हैं जिन्हें प्यार और भाषा दोनों के ही व्याकरण से खास फर्क नहीं पड़ता। अव्वल तो शीर्षक के बाद ही निर्देशक पुनीत मल्होत्रा सारे इंटरव्यूज में स्पष्टीकरण दे रहे थे कि फिल्म प्यार के खिलाफ नहीं है। उनकी बात सही है यह ना किसी के पक्ष में है ना किसी के खिलाफ। यह करण जौहर ब्रांड इश्किया भावुकताभरे सिनेमा का एक कमजोर ओर सामान्य संस्करण है। निर्देशक पुनीत मल्होत्रा करण के सहायक रहे हैं और वे नामी फैशन डिजायनर मनीष मल्होत्रा के रिश्‍तेदार हैं। जाहिर है, अपनों पर मेहरबान करण दर्शकों का खयाल कैसे रखते?
कहानी की पृष्ठभूमि करण जौहर ओर पुनीत मल्होत्रा के आत्मकथ्य जैसी है जिसमें प्रेम कहानियों पर फिल्म बनाने वाले वीर कपूर नाम के निर्देशक के सहायक जे या जय को प्रेम कहानियों में भरोसा नहीं है। उसकी आर्ट डायरेक्टर सिमरन का बॉयफे्रेंड राज है। सिमरन को बॉलीवुड टाइप प्रेम कहानियों में मजा आता है। वह जिंदगी को भी ऐसे ही रोमांटिक तरीके से देखती है। जय के साथ उल्टा है। जय और सिमरन को साथ काम करते हुए दोस्ती होती है। प्यार में बदलती है। इकतरफा प्यार में। सिमरन की तरफ से। वह राज को छोडऩा चाहती है लेकिन इधर जय ने मना कर दिया कि वह तो प्रेम कहानियों में यकीन ही नहीं करता। इंटरवल के बाद जय को लगता है कि वह सिमरन के बिना नहीं रह सकता और प्रेम प्रस्ताव सिमरन तक ले जाता है। छोटा मोटा चालू टाइप का ट्विस्ट है। यह बताने की जरूरत है नहीं कि सिमरन किसकी हुई? ऑफ कोर्स जय की।
फिल्म के सारे फ्रेम वाइन, बीयर, किताबें, फिल्मी सैट से भरे पूरे दिखते हैं और अच्छे लगते हैं। बहुत ही बोलती हुई फिल्म है। हर पात्र के पास बहुत सारी फालतू बातें हैं। हमारी नई पीढ़ी इतनी फालतू बातें नहीं करती। शॉर्ट एंड स्वीट बातें करती हैं। उनके मैसेज बॉक्स में बड़े शब्दों के भी छोटे रूप हैं। लेकिन इस फिल्म के पात्र लगातार बोलते ही रहते हैं। पूरी फिल्म में पीछे वॉइसओवर ने रही सही कसर पूरी कर दी। अभी तक की फिल्में देखकर इमरान खान की तारीफ सिर्फ इसीलिए नहीं की जा सकती कि वह आमिर का भतीजा है। उसके चेहरे पर अभिनेता वाले भाव ही नहीं आते हैं। सोनम बेशक अच्छी लगी हैं। खिली खिली सी। इतने सारे डायलॉग हैं कि आपको फुरसत ही नहीं है, कि फ्रेम और लोकेशन या एक्टर्स की खूबसूरती देखें।
मुमकिन है यह किशारों और युवाओं के बीच वाले उन सारे दर्शकों के अच्छी लगे, जो हर चीज को लेकर संदेह की स्थिति में रहते हैं। लेकिन कुछेक हिस्सों को छोड़ दें तो फिल्म के संवाद और कहानी जादुई नहीं है। यह एक साधारण सी प्रेम कहानी है। इस पीढ़ी को इससे बेहतर अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली समझ रहे हैं। वे अलग प्रेम कहानियां कह रहे हैं। पुनीत मल्होत्रा में वो बात नहीं। विशाल शेखर के गाने औसत से बेहतर हैं। इनमें भी टाइटल ट्रेक और जब मिला तू ज्यादा अच्छे हैं। सामने कोई बड़ी रिलीज नहीं है, इसका फायदा शायद फिल्म के कारोबार को मिले।

रविवार, जून 20, 2010

पिता से अलग पुत्रों की दुनिया



यह कोई अठारह साल पुरानी बात है, जब पहली बार मैंने कॉलेज की पढाई के लिए गांव छोडक़र शहर का रुख किया था। पिताजी मेेरे साथ थे। वे चाहते थे कि जिस घर मैं रुकने वाला हूं, वहां बस स्टैंड से उतरने के बाद सिटी बस से ही चला जाए। मेरी जिद पर उन्होंने ऑटो वाले को बस के मुकाबले दस गुना किराया दिया। मैं नया था। गलत रास्ते पर ऑटोवाले को ले गया। तय रकम से उसने पांच रुपए ज्यादा लिए। पिताजी ने अनमने भाव से दिए लेकिन ऑटो वाले के जाते ही मेरी खैर नहीं थी। मुझे पांच रुपए की कीमत पर लंबा व्याख्यान सुनना पड़ा कि शहर में घुसते ही यह हाल है, पता नहीं आने वाले दिनों में मेरे खून-पसीने की कमाई को कैसे लुटाओगे?
हर पिता की इच्छा होती है, उसकी काली-सफेद कमाई का उपभोग केवल उसका पुत्र ही करे लेकिन वह कतई नहीं चाहता कि वह उसका दुरुपयोग करे। समस्या यहीं से शुरू होती है। जो पिता की नजर में दुरुपयोग है, वह पुत्र की नजर में नहीं। पिता बस से आकर पचास रुपए काम पांच रुपए में निकाल रहे थे और मैंने ऑटोवाले को पांच रुपए की तो टिप ही दे दी।
अगले दिन पिता गांव लौट गए और पहला पुण्य काम मैंने किया कि उन्हें बस में बिठाते ही लक्ष्मी मंदिर में टिकट खिडक़ी से टिकट खरीदी और घुस गए फिल्मी दुनिया में।
इंजीनियरिंग पढने आए उदयपुर के मेरे मित्र को पहली बार पिता ही छोडऩे आए। तमाम हिदायतें देने के बाद ज्योंही पिताजी वापस गए, उन्होंने तुरंत शराब की दुकान तलाशी और गटका ली एक बीयर। पिताजी की हिदायतों की पोटली चुपके से उनके ही सूटकेस में उन्होंने वापस भेज दी थी।
पिताओं के तमाम प्यार और देखभाल के बावजूद पुत्रों की एक अपनी दुनिया है, जहां एक उम्र के बाद वे पिता की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं करते। कुछ पिता समझदार होते हैं। उस दुनिया से खुद को बाहर कर लेते हैं।
मेरे एक मित्र को किसी ने खबर दी कि उनके बेटे को कल उन्होंने सिगरेट पीते देखा था। उन्हें ताज्जुब नहीं हुआ। अगले दिन उन्होंने नाश्ते की टेबल पर बच्चे को कहा, ‘छोटी उम्र में सिगरेट पीने से फेफड़े खराब हो जाते हैं, बाकी तुम्हारी मर्जी।’ बालक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, उस मित्र ने मुझे बताया कि मैं मान ही नहीं सकता कि उसने सिगरेट पीनी बंद कर दी होगी, मैं भी तो ऐसा ही था उसकी उम्र में।
विख्यात लेखक काफ्का ने अपने पिता के व्यवहार को लेकर उन्हें एक लंबी चिट्ठी लिखी थी किस तरह उनकी हिदायतें उसे नागवार गुजरती थीं और उसे गुस्सा आता था। यह पत्र एक साहित्यिक दस्तावेज है। ज्यादातर पुत्रों के हालात यही हैं।
पिता होने के दुख ही यही हैं कि अपने ही घर में दो पीढियों की मौजूदगी में वह पिसता है। जो उसे सही लगता है, वह बेटा नहीं मानता। वह जो कर रहा होता है, उसे उसके पिता सही नहीं मानते। दादा होने की अवस्था में आदमी पुन: आधुनिक होता है और उसे अपने पोते की बातें अपेक्षाकृत सही लग रही होती हैं। समस्या यह है कि उसे पता होता है कि जो घटित हो रहा है, वो विकास और सोच की सतत प्रक्रिया होती है, यदि वह उसे नहीं भोगेगा तो जिंदगी हाथ से खिसक ही रही है, किसी भी दिन सांसों का चिराग बुझ जाएगा। आज का पिता कल का दादा बनेगा और उसे अपने पोते की बातें ज्यादा ठीक लगेंगी। गांव में इसीलिए लोग कहते हैं, मूलधन से ज्यादा प्यारा ब्याज होता है। दादा के लिए पिता मूलधन है, पोता ब्याज है। पिता पुत्र को हमेशा दूर रखता है, पोते को हमेशा करीब रखना चाहता है। कितनी ही फिल्में, कितने ही स्कॉलर और समाजविज्ञानी यह बात समझा चुके हैं कि पिता को अपनी अपेक्षाओं का बोझ पुत्र पर नहीं लादना चाहिए। पिता के कंधे हमेशा मजबूत होते हैं, वह पूरे परिवार का बोझ उठाता है। पुत्र के कंधे इतने मजबूत नहीं होते, वह बोझ लेकर चल ही नहीं सकता है। अंगुली पकडऩे के दिनों से छुटकारा पाकर वह उच्छृंखल होकर अपने सपनों की एक दुनिया बनाना चाहता है, जहां उसके दोस्त, उनकी प्रेम कहानियां, अलमस्ती और दुनिया को जूते की नोंक पर रखने का रवैया लिए झूमते रहते हैं। पिता बनने के बाद वे भी उसी तरह अपेक्षाओं और जिम्मेदारियों की पोटली का बोझ महसूस करने लगते हैं। ऐसे कितने ही मेरे मित्र हैं जो यूनिवर्सिटी कॉलेज के दिनों में प्रोफेसर्स की नाक में दम किए रहते थे, आज सुबह शाम मंदिरों में सिर नवाते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनका पुत्र वह सब नहीं करे, जो आवारगी उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में छानी। यह कैसे मुमकिन है?
नए जमाने के पिता अपने पुत्रों से मित्रवत व्यवहार की बात करते हैं लेकिन यह तब तक ही संभव है, जब तक उनके बेटे वयस्क नहीं हुए हैं। वयस्क पुत्र स्वयं ही कहते हैं, उनके इतने बुरे दिन नहीं आए कि पिता की उम्र के दोस्त रखने पड़ें। मैं इस पूरे दौर में पुत्रों के साथ हूं। पिताओं से सहाुनभूति दर्शा सकता हूं, उनके लिए दुआ कर सकता हूं कि वे दादा बनने का इंतजार करें ताकि अपने विचारों को आधुनिक बनाने का साहस जुटा सकें। आमीन।

शनिवार, जून 19, 2010

सियासी साये में पायरेसी





पायरेसी का मतलब है कि किसी आदमी का किसी भी तरह का श्रम कोई उत्पाद को तैयार करने में लगा उस तक उसका हक पहुंचाए बिना उसका उपभोग करना या आनंद उठाना। भाजपा की बाड़ेबंदी में जो लोग फिल्म ‘राजनीति’ का पायरेटेड वर्जन देख रहे थे, उनमें कुछ को तो यह भान ही नहीं था कि वे कानून का उल्लंघन कर रहे हैं, जिन लोगों को हम चुनकर भेजते हैं उनमें ज्यादातर इस गलतफहमी के शिकार हैं कि वे तो कानून बनाते हैं,लिहाजा उनकी कोई भी हरकत गैर-कानूनी कैसे हो सकती है? लेकिन सच यही है कि यही लोग सबसे ज्यादा गैर-जिम्मेदारी से कानून का मखौल उड़ाते हैं। यह कोई चामत्कारिक और नई बात भी नहीं है जो मैं लिख रहा हूं, क्योंकि हम सबने यह मान ही लिया है कि किसी भी बात पर एक बार हंगामा होना, उस पर बयानबाजी होना और मामले की लीपापोती हो जाना हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है, यदि आप इस विशेषता से अनभिज्ञ हैं तो देखते जाइए कि इस मामले पर भी ऐसा ही होगा। और तो और जिस भोपाल गैस त्रासदी पर पूरे देश का मीडिया शोर शराबा कर रहा है, उसकी परिणति भी लीपापोती में ही होगी और उसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
विषयांतर ना करते हुए पायरेसी पर आते हैं। पिछले दिनों की ही एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में कोई 65 फीसदी सॉफ्टवेयर पॉयरेटेड इस्तेमाल होते हैं और इनकी बाजार में कीमत करीब दो अरब डॉलर के आसपास है। दुनिया के कई छोटे देशों की अर्थव्यवस्था भी इतनी बड़ी नहीं है। इंटरनेट के जमाने में इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि कहां कहां इस तरह की चोरी हो रही है लेकिन अभी तक कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं हुई। कारण साफ है। पायरेसी एक कुटीर उद्योग की तरह शुरू होकर एक वृहद उद्योग बन गई है। इसकी आपराधिक शृंखला पूरी दुनिया में फैली है। यहां तक अमेरिका और जापान में जो सबसे कम पायरेसी वाले देश माने जाते हैं, वहां भी पिछले साल कोई बीस इक्कीस प्रतिशत सॉफ्टवेयर पायरेटेड काम लिए जा रहे हैं।
अब सिनेमा पर आइए। आप अपने पड़ोस के किसी भी वीडियो पार्लर में जाइए। आपको तीस रुपए में छह फिल्मों का सैट मिलेगा जिसमें कम से कम तीन या चार फिल्मों के प्रिंट की गुणवत्ता भी ठीकठाक होगी। आप आंख बंद करके किसी भी पार्लर में घुसिए वहां यही दृश्य है। जयपुर में ही कम्प्यूटर और सीडीज के लिए एक विख्याात एक मॉल में आपको क्या नहीं मिलेगा? आप इच्छा व्यक्त करिए। बॉलीवुड हॉलीवुड का ताजा तरीन माल। इस पूरे तंत्र को हिलाने की इच्छाशक्ति किसी में भी इसलिए नहीं है कि वह एक समांतर अर्थव्यवस्था है जिसमें वीडियो पार्लर के मालिक से लेकर, इस माल ढुलाई में लगे लोग और संबंधित इलाके की पुलिस तक शामिल रहती है।
प्रकाश झा जयपुर में स्क्रीनिंग से इतने दुखी हो रहे हैं। उन्हें चार कदम चलकर अंधेरी स्टेशन पहुंचना चाहिए। वहां एक के बाद एक कतार से ठेले लगे हैं, जिन पर आपकी मनचाही फिल्म आपके मनचाहे दामों पर मिल जाएगी। मैंने मेरे एक मित्र को फोन करके सुनिश्चित किया है, वहां राजनीति की डीवीडी भी उपलब्ध है। अंधेरी, गोरेगांव और मलाड के इन ठेलों के आसपास ही पुलिस की चौकियां रहती हैं। लोग सब्जियों की तरह विश्व और भारतीय सिनेमा का मोलभाव करते हैं,जिसका रत्तीभर भी निर्माता तक नहीं पहुंचता। इंडस्ट्री से जुड़े लोग सांगठनिक रूप से इसका विरोध करते रहे हैं लेकिन कई ऐसे भी हैं, जिनके घर यही पायरेटेड डीवीडी का मालवाहक आदमी भरा हुआ बैग लेकर पहुंंचता है और होम डिलीवरी करता है। तो सबसे बड़ा अड्डा तो मुंबई में ही है। तमाम सुरक्षा कवचों के बीच देश की प्रतिष्ठित लैब का जनरल मैनेजर ही एक फिल्म की पायरेसी के लिए जिम्मेदार माना गया था। अब यह बड़ी पूंजी का बाजार हो गया है। मोटे तौर पर देखें तो यूं लगता है कि आम आदमी के पास पहुंचने वाली यह सस्ती चीजें उसके लिए कम से कम फायदेमंद हैं लेकिन समस्या यह है बहुत सारे असामाजिक तत्त्वों के हाथ में इस फर्जी और कुटिल उद्योग की चाबी है। यह केवल निर्माता का ही नुकसान नहीं बल्कि हमें यह भी नहीं पता कि इस अवैध कारोबार की यह बेनामी पूंजी आखिर कहां जाकर किस काम आ रही है?
कुछ कंपनियों ने सस्ती डीवीडी निकालकर पायरेसी उद्योग को ढीला करने की कोशिश भी की लेकिन वे उससे भी सस्ते उत्पाद लेकर आ गए। कंपनी ने जब एक फिल्म की डीवीडी पैंंतीस रुपए में देना शुरू किया तो पायरेटेड आपको पच्चीस से तीस रुपए में मिलने लगी और उसमें छह फिल्में शामिल हैं। आखिर बाजार की इस प्रतिस्पर्धा में कोई कब तक लड़ सकता है, जब हमारे प्रशासनिक तंत्र के पास पायरेसी रोकने की कोई इच्छाशक्ति और सख्त कानून का अभाव हो।
ना केवल सॉफ्टवेयर और सिनेमा बल्कि किताबें भी भीषण रूप से पायरेसी की शिकार हैं। कितनी ही बेस्ट सेलर आपको दिल्ली और मुंबई में मूल किताब की बीस प्रतिशत कीमत पर आसानी से उपलब्ध हैं। अरुंधति रॉय, विक्रम सेठ, किरण देसाई, अरविंद अडिगा, जेके रॉलिंग, चेतन भगत सबकी किताबें आपको यूं की यूं फोटोकॉपी की हुई खुलेआम बिकती मिल जाएंगी।
तो पायरेटेड फिल्म देखने वाले नेताओं का अपराध इसीलिए बहुत बड़ा है कि जब पूरे बाजार में इस कदर पायरेसी छाई है। इन्हें रोकने की कोशिश करनी चाहिए, उस समय ये भी उसी भीड़ और उस फर्जी उद्योग का हिस्सा बन रहे हैं, जिसका अंतत: नुकसान हमारी अर्थव्यवस्था को है। प्रकाश झा कह ही चुके हैं कि उनसे कहा जाता तो वे वैसे ही स्पेशल स्क्रीनिंग करवा देते, पायरेटेड फिल्म देखकर नेताओं ने ठीक नहीं किया। इसलिए मुझे लगता है इन्हें माफ कर देना कतई सही नहीं है। लेकिन इनको सजा मिलने का भी क्या कोई अर्थ है जब इतने बड़े पायरेसी उद्योग को हिलाने में ये रत्तीभर भी मददगार नहीं होगी। आखिर बुराई की जड़ों पर प्रहार करना कब सीखेंगे? आखिर इन नेताओं को इतनी आसानी से डीवीडी ना मिल पाए, यह व्यवस्था कब होगी?

(राजस्‍थान पत्रिका में संपादकीय पेज पर 19 जून 2010 को प्रकाशित)