गुरुवार, नवंबर 26, 2009
चाह नहीं कि नेताओं के माइक पर गाया जाऊं
यह तय बात है कि जिंदगी में कभी फिल्म बनाई तो मैं उसमें देशभक्ति का कोई गाना नहीं रखूंगा। इसलिए नहीं कि इस देश का सम्मान नहीं करता, बल्कि इसलिए कि जब भी चुनाव होंंगे, हमारे नेता उन गानों का दुरुपयोग करेंगे। वे हर चुनाव में ऐसा करते हैं और हमारे मरहूम भले गीतकार प्रदीप, साहिर, मजरूह, कैफी की आत्माएं दुखती होंगी।जिन लोगों की बुनियाद ही जोड़-तोड़, बेईमानी पर टिकी हो वे लोग जनता की सेवा का दावा कैसे कर सकते हैं। हर चुनाव की तरह नगर निकायों के चुनाव में भी इन्हीं गानों का दौर लौट आया है।हमारी कला और सिनेमा के बिंबों का यह दुरुपयोग क्यों नहीं रोका जाना चाहिए? अमरीका की जूतों की कोई कंपनी गणेश का प्रतीक इस्तेमाल करती है तो हम इतना हंगामा खड़ा कर सकते हैं। वंदेमातरम कहा जाए या नहीं, यह बहुत बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन सकता है तो क्या हमारी सांगीतिक धरोहरों के दुरुपयोगों पर भी कोई रोक होनी चाहिए। माना कि यह संगीत लोकप्रिय संगीत की श्रेणी में है, लेकिन याद रखें कि जब कांग्रेस ने 'जय होÓ गाने के अधिकार खरीदे थे तो गुलजार साहब ने अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हम सब इस बात से आहत होते हैं कि 'मेरा रंग दे बसंती चोलाÓ जैसा गाना बजना शुरू होने के साथ हमें भगतसिंह का बिंब दिखता है लेकिन दुर्भाग्य से अगले ही क्षण माइक यह बोलता है कि अमुक नाम के अमुक जाति वाले आदमी को आप वोट दें, क्योंकि यह गाना अब अगली बार पांच साल बाद सुनेंगे। भारत-चीन युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी 'हकीकतÓ फिल्म का गाना 'अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोÓ को जब भी मैं अपने म्यूजिक सिस्टम में सुनता हूं, तो मेरी आंखें नम होती हैं, लेकिन यही गाना जब चुनावी मौसम में एक रिक्शे पर बजता है तो मेरी आंखें सवाल पूछती है, ये धूर्त लोग कौन हैं जो एक बार फिर इस बात के लिए झूठ बाले रहे हैं कि वे जान-ओ-तन फिदा कर रहे हैं। ये तो वो लोग हैं जो नामांकन के दिन छह घंटे तक आम लोगों को जाम में फंसा सकते हैं क्योंकि उन्हें शक्ति प्रदर्शन करना है। ये वो लोग हैं जो पैसा खर्च कर पार्टी की टिकट खरीद लाते हैं। इन्हें इस वतन, इस शहर की मिट्टी से क्या लेना देना?देशभक्ति के गीतों के एलबमों की हालत तो यह हो गई है, जैसे ये इन नेताओं के लिए ही खैरात की तरह बनाए गए हैं। ये हमारे महान गीतकारों की विरासत हैं। संगीतकारों की साधना का फल है। उन्होंने इस देश को अपनी साधना से याद किया है।दुर्भाग्य से हमारे यहां कॉपीराइट एक्ट में इतने लोचे हैं कि इन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी नहीं होती।हम सबने बचपन में राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी की एक कविता 'पुष्प की अभिलाषाÓ पढ़ी है, जिसमें फूल यह कहता है कि उसकी इच्छा सुरबाला के गहनों में गूंथे जाने या देवताओं की मूर्तियों पर चढ़ाए जाने की नहीं। उसे तो देश की सेवा में जाने वाले लोगों के रास्ते में फेंक दिया जाए ताकि वह उनके पैरों तले कुचले जाने का सौभाग्य मिले। हमारे इन गानों की खुद जुबान होती तो ये यही कहते, 'चाह नहीं कि नेताओं के माइक पर गाया जाऊं।Ó
मंगलवार, नवंबर 24, 2009
कुर्बान- ऊंची दुकान,सादा पकवान
करण जौहर खेमे के निर्देशक रेन्सिल डिसिल्वा की पहली बहुप्रचारित फिल्म "कुर्बान" की टैगलाइन है कि कुछ प्रेम कहानियां खून से लिखी जाती हैं लेकिन इस फिल्म एक बड़ा हिस्सा "फना" और पिछले साल आई "न्यूयॉर्क" से हूबहू मिलता है। हां, इसमें नया सिर्फ इतना है कि करीना कपूर ने सैफ अली के साथ टॉपलेस अंतरंग दृश्य दिए हैं और फिल्म के प्रचार में इसे भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है। यह कहानी अवंतिका और अहसान की है जो शादी करके अमरीका में काम कर रहे हैं। यह भूमिका करीना और सैफ कर रहे हैं। अचानक अवंतिका को पता लगता है की उसे इस्तेमाल किया जा रहा है। जो रोल "न्यूयॉर्क" में नील नितिन का है, वह यहां रियाज की भूमिका में विवेक ऑबेरॉय का है, जो एक चैनल में रिपोर्टर है। लेकिन सैफ को अधिक दिखाने की गरज में आधी से ज्यादा फिल्म आतंककारियों का न्यूज लेटर सी लगती है,। बच्चा बच्चा जानता है और यहां दुबारा बताया गया है कि किस तरह से गोरों ने तेल के नाम आतंकवाद पैदा कर दिया है। इस तथ्य में कोई बुराई नहीं है लेकिन दूसरा पहलू फिल्म में बहुत ही दबा हुआ चल रहा है। इस विषय पर पहले से ही इससे इतनी बेहतर फिल्में बन चुकी हैं, चाहे वह "खुदा के लिए" हो या "न्यूयॉर्क।" इस क्रम में कुर्बान तीसरे नंबर पर है।कहानी को जिस तरह आगे बढाया गया है वह सहज नहीं है। जब रियाज को यह पता चलता है कि उसकी प्रेमिका रेहाना के कत्ल में आतंकवादियों का हाथ है तो वह बजाय पुलिस को बताने के बजाय खुद ही उनकी गैंग में शामिल होेने का ढोंग करता है। यह अटपटा लगता है। एक जगह उसे अवंतिका मिलती है ओर आग्रह करती है कि वह उसे इन लोगों के दलदल से निकाले तो बजाय उसे बचाने के वह वापस घर भेज देता है। आखिरकार बम भी फट जाते हैं। लोग भी मरते हैं। आधी फिल्म बीत जाने के बाद यदि करीना का टॉपलेस दृश्य नहीं आ जाता, तब तक एक अजीब सा सन्नाटा दर्शकों में महसूस किया जा सकता है, जैसे वे "आतंकवादी कैसे बनते हैं" विषय पर बुलाई गई एक सेमिनार में बिठा दिए गए हों। लिहाजा आप सोचते हैं कि एक प्रेमकहानी देखने जा रहे हैं तो निराश होंगे। हां, एक पिटे पिटाए से कथानक पर आतंकवाद के मुद्दे पर आपको एक औसत सी फिल्म देखनी है, तो बुरी नहीं है। गाने ठीक हैं और फिल्माए ढंग से गए हैं। फिल्म की कहानी के अलावा फिल्मांकन में कोई कमी नहीं है। बहुत अच्छे से फिल्माया गया है और इसे एक हॉलीवुड थ्रिलर की तरह आप देख सकते हैं। बेशक खूबसूरत अमेरिकन लोकेशन्स और करीना-सैफ की पर्दे से बाहर की इश्किया समीकरणों से फिल्म को प्रांरभिक लाभ मिलेगा लेकिन यह आतंकवाद पर एक सतही सी सोच रखने वाली फिल्म है। आतंकवाद पर एक अधूरी कहानी और प्रेम कहानी तो वैसे भी अधूरी है, क्योंकि प्रेम वो नहीं जिसमें आप अपनी पीठ को नंगा दिखाएं। सैफ-करीना ठीक लगे हैं। ओमपुरी उम्दा हैं। किरण खेर सामान्य हैं।
सोमवार, नवंबर 23, 2009
ठिठुरती यादों की गुनगुनी परछाईंयां
अपनी ही सांसों से फंूक मारक हथेलियों को गर्म करने की कोशिश। नाक में जलती हुई लकडिय़ों का धुंआ घुस रहा है। चूल्हे के पास यूं बैठने को तीन चार लोगों की ही जगह दिखती है लेकिन 'थोड़ा और आगे सरक।Ó कहते हुए रसोई के चूल्हे के पास दस लोग जमा हो गए। चाचा दूलसिंह ने एक जलती लकड़ी चूल्हे से उठाई और अपनी बीड़ी के मुंह से टोचन करने लगे। धुएं में बीड़ी का धुंआ भी घुल गया है। मां चूल्हे पर रखी 'राबड़ीÓ को 'चाटुÓ से हिला रही है। गांव में सर्दियों का सबसे बड़ा पेय। जिस राबड़ी को मैं कभी पसंद नहीं करता था। सर्दियों में वह अमृततुल्य लगती थी। चूल्हे से उतरी नहीं कि 'सबड़केÓ मार मार के पूरा कटोरा पी गया। शरीर का तापमान बढ़ा। चूल्हे के सामने मां, बापू, चाचा, मौसी सब जमे हैं। दिसम्बर की सर्द रात है। आग अपनी शक्ल बदल रही है। कभी 'धपड़बोझÓ, कभी 'खीरेÓ तो कभी 'भोभर।Ó चूल्हे की चौपाल लंबी चलेगी। मुझे मेरे चचेरे भाई गोकुल के साथ हिदायत दी जाती है कि चुपचाप जाकर रजाई में घुस जाऊं। हम दस मिनट तक यही बहस करते हैं कि पहले तुम घुसो। रजाई इतनी ठंडी है। बर्फ सी लगती है। जो पहले घुसेगा वो गर्म तो पता नहीं कब होगा लेकिन ठिठुर जरूर जाएगा यह तय है। आखिरकार बीच का रास्ता मां ने तय किया था। एक दिन तुम घुसोगे, एक दिन गोकुल। मैं घर में सबसे छोटा था। मेरी मासूमियत गोकुल को अक्सर पिघलाती थी। वह पूरा पिघल ही नहीं जाए इससे बचने के लिए ठंडी रजाई में राहत पाता था।
सुबह कोहरा है। जैसे रात भर सूरज ने और सारे तारों ने सर्दी से बचने के लिए जैसे गीली लकडिय़ां जलाई हों। उसका फैल गया है। मजा आ गया। हम से मुंह से फूंक मारते हैं, मुंह से भी धुंआ निकल रहा है। जैसे पेट में कुछ सुलग रहा है। रात को चूल्हे में 'भोभरÓ ओटी गई थी। चिंगारी अभी बाकी है। चूल्हा जला है। कोयलों पर बाजरे की रात की बची हुई रोटी 'कुरकुरीÓ सेंक दी गई है। दोनों हथेलियों के बीच 'मरोड़ीÓ देकर उसे कांसे के कटोरे में 'चूराÓ गया है। गाढ़ा सा जमा हुआ हमारी लंबे सींग वाली भैंस का दही डाला गया है। हाथ की चारों अंगुलियां भूख के इशारे समझते हुए एक बड़े चम्मच में तब्दील हो गई हैं। सुबह के 'सबड़केÓ के साथ दही रोटी खा ली गई है। जो मटका पुराना हो गया उसी में पानी भरकर चूल्हे पर रख दिया गया है। गर्म पानी बाल्टी में डालकर चेतावनी के साथ मुझे कच्ची ईंटों से बने बाथरूम में घुसा दिया गया है। मैं मन ही मन उस आदमी को कोसता हूं जिसने मेरी उम्र के बच्चों के लिए स्कूल जाने का रिवाज बनाया।
मैं नंग-धड़ंग ठिठुरता हुआ बाथरूम में हूं। मुंह धोया। आंखें धोयी। 'तागड़ीÓ गीली कर ली है। ताकि मां की जांच में खरा उतरूं कि नहाकर आया हूं। कड़ाके की सर्दी ने हफ्ते में छह दिन सबको धोखा देना सिखा दिया है। संडे को मां खुद मोर्चा संभालती है। ठिठुरते हुए रोना धोना जारी है। पैरों पर जमी मैल की परतें, वो बिना साबुन ही रगड़ रही है। खाल खिंच रही है। ज्यादा शोर मचाना मना है, वरना दो चांटे तैयार हैं।
'टोपलाÓ लगाए गांव के सरकारी स्कूल में बैठा हूं। दरी बिछी है। आधे से ज्यादा बच्चों की नाक तार-सप्तक की तरह बज रही है। बीच में छींक और खांसी की लगातार आवाजें पूरी कक्षा में 'फ्यूजनÓ पैदा कर रहे हैं। आज बाहर धूप भी नहीं है। स्कूल की बिना किवाड़ वाली खिड़कियों पर दरी के ही पर्दे लटकाए हैं लेकिन छन छन के शीत लहर आ रही है। समवेत ध्वनियां हैं, जोर जोर से, 'एक एक ग्यारहा, एक दो बारहा, एक तीन तेरहा, एक चार चौदह, एक पांच पन्द्रह।Ó बहाना है कि रटा लगा रहे हैं। सच्चाई है कि जोर-जोर से बोलने में सर्दी कम लग रही है।
सुबह कोहरा है। जैसे रात भर सूरज ने और सारे तारों ने सर्दी से बचने के लिए जैसे गीली लकडिय़ां जलाई हों। उसका फैल गया है। मजा आ गया। हम से मुंह से फूंक मारते हैं, मुंह से भी धुंआ निकल रहा है। जैसे पेट में कुछ सुलग रहा है। रात को चूल्हे में 'भोभरÓ ओटी गई थी। चिंगारी अभी बाकी है। चूल्हा जला है। कोयलों पर बाजरे की रात की बची हुई रोटी 'कुरकुरीÓ सेंक दी गई है। दोनों हथेलियों के बीच 'मरोड़ीÓ देकर उसे कांसे के कटोरे में 'चूराÓ गया है। गाढ़ा सा जमा हुआ हमारी लंबे सींग वाली भैंस का दही डाला गया है। हाथ की चारों अंगुलियां भूख के इशारे समझते हुए एक बड़े चम्मच में तब्दील हो गई हैं। सुबह के 'सबड़केÓ के साथ दही रोटी खा ली गई है। जो मटका पुराना हो गया उसी में पानी भरकर चूल्हे पर रख दिया गया है। गर्म पानी बाल्टी में डालकर चेतावनी के साथ मुझे कच्ची ईंटों से बने बाथरूम में घुसा दिया गया है। मैं मन ही मन उस आदमी को कोसता हूं जिसने मेरी उम्र के बच्चों के लिए स्कूल जाने का रिवाज बनाया।
मैं नंग-धड़ंग ठिठुरता हुआ बाथरूम में हूं। मुंह धोया। आंखें धोयी। 'तागड़ीÓ गीली कर ली है। ताकि मां की जांच में खरा उतरूं कि नहाकर आया हूं। कड़ाके की सर्दी ने हफ्ते में छह दिन सबको धोखा देना सिखा दिया है। संडे को मां खुद मोर्चा संभालती है। ठिठुरते हुए रोना धोना जारी है। पैरों पर जमी मैल की परतें, वो बिना साबुन ही रगड़ रही है। खाल खिंच रही है। ज्यादा शोर मचाना मना है, वरना दो चांटे तैयार हैं।
'टोपलाÓ लगाए गांव के सरकारी स्कूल में बैठा हूं। दरी बिछी है। आधे से ज्यादा बच्चों की नाक तार-सप्तक की तरह बज रही है। बीच में छींक और खांसी की लगातार आवाजें पूरी कक्षा में 'फ्यूजनÓ पैदा कर रहे हैं। आज बाहर धूप भी नहीं है। स्कूल की बिना किवाड़ वाली खिड़कियों पर दरी के ही पर्दे लटकाए हैं लेकिन छन छन के शीत लहर आ रही है। समवेत ध्वनियां हैं, जोर जोर से, 'एक एक ग्यारहा, एक दो बारहा, एक तीन तेरहा, एक चार चौदह, एक पांच पन्द्रह।Ó बहाना है कि रटा लगा रहे हैं। सच्चाई है कि जोर-जोर से बोलने में सर्दी कम लग रही है।
सोमवार, अक्टूबर 19, 2009
हंसो और कहो आल दा बेस्ट
यह तो अब माना ही जा सकता है कि मोहित शेट्टी का कहानी कहने का अपना तरीका है और उसमें वे लोगों को हंसाने की ताकत रखते हैं। दीवाली के मौके पर रिलीज उनकी फिल्म ऑल द बेस्ट में गोलमाल जैसा जादू तो नहीं है लेकिन वह गोलमाल रिटन्र्स के आसपास जरूर ठहरती है। खासकर इंटरवल के बाद कहानी में तेजी आती है और जब आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो मुस्कान आपके चेहरे पर रहती है।ऑल द बेस्ट कॉमेडी ऑव एरर्स जैसा ही मसला है जब एक म्यूजिक बैंड को कामयाब करने के लिए एक स्ट्रगलर भाई ने अपने अमीर एनआरआई भाई को झूठ बोल दिया है कि उसने शादी कर ली है और भाई ने उसकी पॉकेट मनी बढा दी है। एक दिन अचानक भाई की लोशोटो जाने वाली फ्लाइट की इमरजेंसी लेंडिग गोवा हो जाती है और उनका भाई बेवक्त उनके घर पहुंच जाता है। उसने अपने छोटे भाई की पत्नी से मिलने की इच्छा व्यक्त की है, उसे अपराधबोध है कि वो शादी में नहीं आ पाया था। लेकिन गलती है वह दूसरी लड़की को अपने भाई की पत्नी समझ लेता है। जबकि उसने शादी ही नहीं की है और एक लड़की सिर्फ उसकी गर्लफे्रंड है। एक झूठ को छुपाने के लिए सैकड़ों झूठों का सहारा लेना पड़ता है और हर झूठ के साथ लेखक और निर्देशक ने आपके हंसने का मसाला गुण ओर मात्रा के लिहाज से बढ़ा दिया है लिहाजा इंटरवल तक धीमी गति से चलने वाली कामेडी एक्सप्रेस उसके बाद थोड़ी गति पकड़ती है और गंतव्य तक जाती है। बीच बीच में मोहित शेट्टी ने अपनी चिरपरिचित अदा में फिल्म को नॉन लीनियर भी करते हैं, मसलन, एक एक्शन दृश्य की शुरूआत से पहले संजय को गुंडा पूछता है, ए अंकल, कॉमेडी कर रहे हो क्या? तो संजय का जवाब है, बेटा, कॉमेडी तो अब शुरू की है, एक्शन तो तीस साल से कर रहा हूं। कुल मिलाकर ऑल द बेस्ट मोहित शेट्टी की परम्परा की फिल्म है और उस पर लिखने से ज्यादा वह आपको देखने से समझ में आएगी।
ब्लू - समंदर में डूबी कहानी
आपने आज से पहले भारतीय फिल्मों में ऎसे दृश्य नहीं देखे होंगे। फिल्म ब्लू का प्रचार करने वालों ने ऎसा कहा है तो जाहिर है उन्होंने झूठ नहीं बोला है। यह सचमुच रोमांचित करने वाला अनुभव है। खासकर हिंदी फिल्मों में लेकिन सौ करोड़ रूपए को पानी में इस तरह बहाया जाएगा, इसका अंदाजा नहीं था। किसी भी एक्शन भी बिना किसी कहानी या घिसी फिटी एक फार्मूला कहानी के आधार पर यदि आप ज्यादा खींचेंगे तो वह फिल्म को खराब करेगा। ब्लू इसका अपवाद नहीं है।
नए निर्देशक एंथनी डिसूजा की तारीफ करिए कि उन्होंने अपना सिनेमाटोग्राफर पीटर को चुना जो दुनिया में अंडरवाटर स्टंट फिल्माने के लिए जाना माना नाम है। आरव मल्होत्रा यानी अक्षय कुमार एक बिजनेसमैन है और सागर यानी संजय दत्त एक फिशरमैन या गोताखोर है। सिर्फ सागर को पता है कि लेडी इन ब्लू नाम का एक जहाज समंदर में किस जगह डूबा था। उसमें बेशुमार दौलत थी। आरव उस खजाने को हासिल करने के लिए सागर से दोस्ती करता है लेकिन कोई वजह है जो उसे खजाने तक जाने से रोकती है। आखिरकार सागर के छोटे भाई समीर यानी जाएद खान की वजह से सागर को खजाना ढूंढ़ लाने के लिए मजबूर होना पड़ता है और वे इसे ले आते हैं। बीच में एक विलेन भी है और काम चलाऊ टि्वस्ट भी लेकिन ब्लू की तारीफ आपको सिर्फ इसलिए करनी होगी कि उसमें अद्भुत दृश्य है, जिन्हें पानी में फिल्माया गया है। पानी में फिल्माए जाने की थकान के साफ शिकार अभिनेता दिखते हैं और संजय और अक्षय वैसा अभिनय नहीं कर रहे हैं जैसा वे आमतौर पर भी करते हैं। जाएद खान को खैर अभिनय आता ही कहां है। लारा दत्ता ने बिकनी पहनकर पर्याप्त अंग प्रदर्शन किया है लेकिन यह कामयाबी की गारंटी नहीं है। आप ब्लू देखना चाहते हैँं समंदर के बेहतरीन दृश्यों के लिए बेशक देखने जाएं, कहानी से निराश होेगे। दूसरे काइली की चिगी विगी गाना भी आपको अच्छा लग सकता है।
नए निर्देशक एंथनी डिसूजा की तारीफ करिए कि उन्होंने अपना सिनेमाटोग्राफर पीटर को चुना जो दुनिया में अंडरवाटर स्टंट फिल्माने के लिए जाना माना नाम है। आरव मल्होत्रा यानी अक्षय कुमार एक बिजनेसमैन है और सागर यानी संजय दत्त एक फिशरमैन या गोताखोर है। सिर्फ सागर को पता है कि लेडी इन ब्लू नाम का एक जहाज समंदर में किस जगह डूबा था। उसमें बेशुमार दौलत थी। आरव उस खजाने को हासिल करने के लिए सागर से दोस्ती करता है लेकिन कोई वजह है जो उसे खजाने तक जाने से रोकती है। आखिरकार सागर के छोटे भाई समीर यानी जाएद खान की वजह से सागर को खजाना ढूंढ़ लाने के लिए मजबूर होना पड़ता है और वे इसे ले आते हैं। बीच में एक विलेन भी है और काम चलाऊ टि्वस्ट भी लेकिन ब्लू की तारीफ आपको सिर्फ इसलिए करनी होगी कि उसमें अद्भुत दृश्य है, जिन्हें पानी में फिल्माया गया है। पानी में फिल्माए जाने की थकान के साफ शिकार अभिनेता दिखते हैं और संजय और अक्षय वैसा अभिनय नहीं कर रहे हैं जैसा वे आमतौर पर भी करते हैं। जाएद खान को खैर अभिनय आता ही कहां है। लारा दत्ता ने बिकनी पहनकर पर्याप्त अंग प्रदर्शन किया है लेकिन यह कामयाबी की गारंटी नहीं है। आप ब्लू देखना चाहते हैँं समंदर के बेहतरीन दृश्यों के लिए बेशक देखने जाएं, कहानी से निराश होेगे। दूसरे काइली की चिगी विगी गाना भी आपको अच्छा लग सकता है।
गुरुवार, सितंबर 10, 2009
आगे से राइट- कल्टी मारो निकल भागो
श्रेयस तलपड़े देश के कई शहरों में पुलिस की वर्दी पहनकर घूमे थे और जयपुर के शॉपिंग मॉल्स में लोगों की खूब तलाशी ली थी कि उनकी पिस्तौल खो गई है। श्रेयस यह समझदारी अपनी फिल्म "आगे से राइट" की कहानी ढूढ़ने में लगाते तो शायद लेखक व निर्देशक को कोई सलाह दे पाते। उनकी सारी तलाशी के बावजूद "आगे से राइट" में हंसी और मनोरंजन गायब रहता है। हां, वह है जरूर लेकिन वह सब टीवी के कॉमेडी सीरियल जैसा ही है।
कहानी दिनकर वाघमारे नाम के एक सब इंस्पेक्टर के इर्द गिर्द है, जो बाघ तो दूर किसी को थप्पड़ नहीं मार सकता। डयूटी च्वाइन करने के साथ ही उसकी गन खो गई है। वह उसे ढूंढ़ रहा है। तलाश में वह ऊपरी तौर पर मुसीबतों में फंसता है लेकिन संयोग से वह हीरो बनकर निकलता है। इतना निरीह पुलिस सब-इंस्पेक्टर हिंदी फिल्मों में अब तक शायद नहीं दिखाया गया। कथा का दूसरा सूत्र एक पाकिस्तानी आतंकवादी के इर्द गिर्द है जिसकी भूमिका में केके मेनन हैं। वह भारत में "जंग-ए-आजादी" के नाम पर बम फोड़ने और तबाही मचाने आया है लेकिन उसकी हवा पर्ल नाम की डांसर ने निकाल दी है। उसका दिल खो गया है। उसे उससे प्यार हो गया है। वह नफरत के बजाय मोहब्बत का मसीहा बनने को चला है। यानी एक गन खोए सब इंस्पेक्टर और दिल खोए आतंकवादी की यह कहानी सिर्फ टुकड़ों में अच्छी है। मुंबई को सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और आतंकवादियों का लोकल एजेंट राघव भाई भी एक मामूली सी घटना के बाद भला आदमी बन गया है। सबका आपस में कोई बहुत च्यादा लेना देना नहीं है, सिर्फ इतना सा है कि वह गन अलग अलग मौकों पर इन लोगों के पास से गुजर रही है। फिल्म की कहानी में बीच के हिस्से में इतना लोचा रह गया है कि एक ठीक ठाक क्लाइमेक्स भी लोगों को हंसाने के लिए पात्रों के साथ दर्शकों को रिश्ता जोड़ने में नाकामयाब रहता है, जैसा कि प्रियदर्शन की फिल्मों में अमूमन होता है। निर्देशक इंद्रजीत नटूजी की पहली फिल्म है और निराश करती है। गीत संगीत कामचलाऊ है।
श्रेयस तलपड़े ने ठीक काम किया है। केके मेनन जैसे अच्छे अभिनेता की प्रतिभा जाया की गई है। शेनाज टे्रेजरी वाला को एक्टिंग नहीं आती। देव डी से चमकी माही गिल एक आघ और ऎसे रोल कर लेंगी तो काम खल्लास समझो। विजय मौर्य ने राघव भाई के रोल में अच्छा काम किया है। शिव पंडित बोरिंग है। सीरियल जैसा ही सुख लेना है तो आगे से राइट जाकर हॉल में घुसें। वरना सीघे चलते रहें और अपना एक घंटा तिरेपन मिनट का समय किसी और नेक काम में लगाएं।
कहानी दिनकर वाघमारे नाम के एक सब इंस्पेक्टर के इर्द गिर्द है, जो बाघ तो दूर किसी को थप्पड़ नहीं मार सकता। डयूटी च्वाइन करने के साथ ही उसकी गन खो गई है। वह उसे ढूंढ़ रहा है। तलाश में वह ऊपरी तौर पर मुसीबतों में फंसता है लेकिन संयोग से वह हीरो बनकर निकलता है। इतना निरीह पुलिस सब-इंस्पेक्टर हिंदी फिल्मों में अब तक शायद नहीं दिखाया गया। कथा का दूसरा सूत्र एक पाकिस्तानी आतंकवादी के इर्द गिर्द है जिसकी भूमिका में केके मेनन हैं। वह भारत में "जंग-ए-आजादी" के नाम पर बम फोड़ने और तबाही मचाने आया है लेकिन उसकी हवा पर्ल नाम की डांसर ने निकाल दी है। उसका दिल खो गया है। उसे उससे प्यार हो गया है। वह नफरत के बजाय मोहब्बत का मसीहा बनने को चला है। यानी एक गन खोए सब इंस्पेक्टर और दिल खोए आतंकवादी की यह कहानी सिर्फ टुकड़ों में अच्छी है। मुंबई को सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और आतंकवादियों का लोकल एजेंट राघव भाई भी एक मामूली सी घटना के बाद भला आदमी बन गया है। सबका आपस में कोई बहुत च्यादा लेना देना नहीं है, सिर्फ इतना सा है कि वह गन अलग अलग मौकों पर इन लोगों के पास से गुजर रही है। फिल्म की कहानी में बीच के हिस्से में इतना लोचा रह गया है कि एक ठीक ठाक क्लाइमेक्स भी लोगों को हंसाने के लिए पात्रों के साथ दर्शकों को रिश्ता जोड़ने में नाकामयाब रहता है, जैसा कि प्रियदर्शन की फिल्मों में अमूमन होता है। निर्देशक इंद्रजीत नटूजी की पहली फिल्म है और निराश करती है। गीत संगीत कामचलाऊ है।
श्रेयस तलपड़े ने ठीक काम किया है। केके मेनन जैसे अच्छे अभिनेता की प्रतिभा जाया की गई है। शेनाज टे्रेजरी वाला को एक्टिंग नहीं आती। देव डी से चमकी माही गिल एक आघ और ऎसे रोल कर लेंगी तो काम खल्लास समझो। विजय मौर्य ने राघव भाई के रोल में अच्छा काम किया है। शिव पंडित बोरिंग है। सीरियल जैसा ही सुख लेना है तो आगे से राइट जाकर हॉल में घुसें। वरना सीघे चलते रहें और अपना एक घंटा तिरेपन मिनट का समय किसी और नेक काम में लगाएं।
थ्री- लव लायज एंड बिट्रायल
आपने अंग्रेजी फिल्म "द परफेक्ट मर्डर" देखी है क्या कहा, अंग्रेजी नहीं आती हिंदी में डब की हुई डीवीडी और सीडी बाजार में है। हिंदी में अब्बास मुस्तन की "हमराज" देखिए। विक्रम भट्ट के सहयोगी रहे विशाल पंड्या की निर्देशित फिल्म "थ्री: लव, लाय एंड बिट्रायल" एक खराब नकल है और कमजोर सस्पेंस थ्रिलर है। एक नाकाम सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजीव दत्त की अमीर पत्नी अंजनी दत्त का खूबसूरत घर बिकने को आ गया है लेकिन वह अपनी पुश्तैनी सम्पत्ति का हवाला देते हुए उसे बेचने से रोकती है। बच्चों की वायलिन टीचर है और च्यादा कमाई के लिए एक पेइंग गेस्ट रख लिया है। पति पत्नी में बनती नहीं और पेइंग गेस्ट ने यह पहचान लिया है। वह तुरंत घर की मालकिन से जिस्मानी रिश्ते बनाता है। यह सब कहानी में इतना तेजी से होता है, जैसे उस घर की मालकिन इसी बात का इंतजार कर रही है कि कब कोई उनके घर रहने आए और कब उसे प्रेम करने का मौका मिले। पेइंग गेस्ट अब परेशान कर रहा है और पति पत्नी छुटकारा पाना चाहते हैं। लड़की के लिए अब दोनों ही लोग भरोसे के काबिल नहीं है। कुल मिलाकर यहां कहानी सस्पेंस में बदलती है और अंजाम तक पहुंचती है।
कहानी शुरू में तेज चलती है फिर घटनाएं रिपीट सी लगती हैं और फिर सब कुछ जाना पहचाना सा लगता है। संवाद इतने सतही हैँ कि मजा नहीं आता। कहीं कहीं वे नर्सरी राइम्स की तरह लगने लगते हैं। पति के रोल में अक्षय कपूर अपरिपक्व लगते हैं। आशीष चौघरी ओवररिएक्ट कर रहे हैं और नौशीन अपनी पहली ही फिल्म में मोनोटोनस हैं।
फिल्म की एकमात्र खूबी फिल्मांकन है। प्रवीण भट्ट की सिनेमाटोग्राफी की तारीफ कर सकते हैं। यही एक सकारात्मक बात फिल्म में है कि स्कॉटलैंड के खूबसूरत लोकेशन्स दिखाए गए हैं। खासकर जब इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना एक पुल जो मूव करता है। नावों के लिए रास्ता छोड़ता है और फिर पुन: सड़क में तब्दील हो जाता है। फिल्म में सिर्फ स्कॉटलैण्ड अच्छा है, बाकी सब कुछ औसत है।
कहानी शुरू में तेज चलती है फिर घटनाएं रिपीट सी लगती हैं और फिर सब कुछ जाना पहचाना सा लगता है। संवाद इतने सतही हैँ कि मजा नहीं आता। कहीं कहीं वे नर्सरी राइम्स की तरह लगने लगते हैं। पति के रोल में अक्षय कपूर अपरिपक्व लगते हैं। आशीष चौघरी ओवररिएक्ट कर रहे हैं और नौशीन अपनी पहली ही फिल्म में मोनोटोनस हैं।
फिल्म की एकमात्र खूबी फिल्मांकन है। प्रवीण भट्ट की सिनेमाटोग्राफी की तारीफ कर सकते हैं। यही एक सकारात्मक बात फिल्म में है कि स्कॉटलैंड के खूबसूरत लोकेशन्स दिखाए गए हैं। खासकर जब इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना एक पुल जो मूव करता है। नावों के लिए रास्ता छोड़ता है और फिर पुन: सड़क में तब्दील हो जाता है। फिल्म में सिर्फ स्कॉटलैण्ड अच्छा है, बाकी सब कुछ औसत है।
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