शनिवार, अक्टूबर 23, 2010

लाइट | कैमरा | एक्‍शन … और वो साढ़े सात दिन!


जयपुर से जब हम निकले थे तो वह छह अक्टूबर की सुबह थी। हमारी फिल्म भोभर के लिए आठ की सुबह कैमरा रोल होना था। चौदह की शाम साढ़े चार बजे पैक अप होना था। एक एक शॉट के लिए एक्सेल शीट पर समय तय था। लगभग साठ शॉट रोजाना लेने की जिद थी और मौका लगा तो यह संख्या अस्सी तक ले जाने का जुनून भी। लेकिन सिनेमा में सब कुछ वैसा नहीं होता, जैसा हम सोचते हैं। पहले ही दिन कैमरा रोल होने में डेढ़ घंटे का विलंब हो गया, नतीजा जो काम दिन में तीन बजे खत्म होना था वहां रात के नौ बज गये। नौ बजे लोकेशन शिफ्टिंग हुई और लाइटिंग में ही रात के बारह बज गये, जो कि शिड्यूल के हिसाब से पहले दिन के पैक अप का समय था, पहले दिन का ही काम बहुत बच गया था। लिहाजा सुबह साढे चार बजे तक काम किया गया।

सबने कहा, पहले दिन ऐसा ही होता है। टीम को अपनी गति पकड़ने में समय लगता है लेकिन ज्योंही डायरेक्टर ने अगले दिन का कॉल टाइम साढ़े नौ बजे रख दिया, तो सबके पसीने छूट गये। हालांकि सैट पर पहुंचते पहुंचते सबको साढ़े ग्यारह बज गये और कैमरा रोल हुआ एक बजे। सब नींद में ऊंघ रहे थे और एक दूसरे को कातर निगाहों से देख रहे थे।

हालांकि यह मेरा फील्ड कतई नहीं था कि मैं प्रोडक्शन टीम को हैंडल करुं लेकिन चूंकि पूंछ में आग हमारे लगी थी और जेब से पूंजी फुंकने की जलन भी हो रही थी। गजेंद्र से चर्चा की और हमारी समझ में आ गया कि इस तरह तो पंद्रह-बीस दिन लग जाएंगे। उस दिन पैक अप जल्दी किया गया ताकि सब लोग पूरी नींद ले सकें। अगली सुबह नाश्ते पर गजेंद्र और हमने पूरी टीम से बात की। हमारे कैमरामैन योगेश ने कहा कि क्यों नहीं हम लोग यह संकल्प लें कि अब होटल से निकल रहे हैं तो फिल्म पूरी शूट करके ही वापस लौटेंगे। हमें सुनने में बहुत अच्छा लगा लेकिन इसकी व्यावहारिकता समझ में नहीं आ रही थी।

बहरहाल हमारा पूरा क्रू ही कोई चालीस लोगों का था और एक स्वतंत्र छोटे बजट के लिए यह संख्या काफी थी। गजेंद्र ने पूरे क्रू से बात की। लाइटमैन्स को शुरुआती संदेह था कि इतने काम का उनका मेहनताना क्या होगा? हमने उन्हें आश्वस्त किया कि वे सब लोग अपना समय नोट करते रहें और सबको सबकी मेहनत का पैसा मिलेगा लेकिन यदि शूटिंग आगे खिसकती है और यही धीमी गति रहती है तो हो सकता है हमारी फिल्म रुक जाए और ऐसा कोई नहीं चाहता था। क्योंकि चौदह तारीख के बाद हमारे लीड एक्टर्स और कैमरामैन की भी डेट्स हमारे पास नहीं थी। शूटिंग बीच में रहने का मतलब था कि कोई नहीं जानता कि वह दुबारा कब शुरू होगी। ऐसा बड़ी फिल्मों के साथ भी होता है, तो हम तो बहुत छोटे प्रोड्यूसर हैं।

बहरहाल मैं उस टीम को सलाम करुंगा, उस क्षण को याद करुंगा जब सबने एक स्वर में कहा कि हम सब तब तक काम करेंगे, जब तक फिल्म पूरी नहीं हो जाती। नींद बर्दाश्त करेंगे। पारियों में सो जाएंगे। मिल बांटकर काम करेंगे। लेकिन इस संकल्प के बाद टीम में अब हर आदमी हर काम कर रहा था। लाइट वाले का स्कीमर पकड़े रहने में सैटिंग वाले को परेशानी नहीं थी। कैमरा अटेंडेंट का ट्रायपॉड लेकर चलने में लाइटमैन को परेशानी नहीं थी। सबको पानी पिलाते रहने में मुझे कोई परेशानी नहीं थी। पूरी टीम के प्रति हम कृतज्ञ थे कि उनके चेहरे पर शिकन नहीं थी। हमारा शिड्यूल फिर भी डिले था और पेंडिंग काम धीरे-धीरे कवर हो रहा था। जो लोग बिल्कुल नहीं सो रहे थे, उनमें हमारे डायरेक्टर गजेंद्र और कैमरामैन योगेश थे। मुझे और मेरे सहयोगी आलोक को नींद आ भी नहीं रही थी। मैं तो अब भी वो सारा तनाव, सारी भागदौड़ याद करता हूं तो नींद में ही बिस्तर से उठ जाता हूं। तीन दिन से ठीक से सो नहीं पा रहा हूं।

फिल्म का सैट गांव में मेरा अपना घर था। उससे लगा खेत था। मम्मी-पापा को इतने मेहमानों की आवभगत को मौका मिला था लिहाजा चूल्हा कभी ठंडा नहीं रहा। रातभर चाय उबलती और दिन में गांव से मटके भरकर छाछ आ जाती। पूरी टीम ने मां से सीधा रिश्ता बनाया और जिसको जिस चीज की जरूरत होती किचन में घुसा पाया जाता। घर में हमारे परिवार के बाकी सब लोग भी टीम की जरूरतों को खास ध्यान रखने लगे और जब देखा कि चौबीसों घंटे सब लोग काम में जुटे हैं, तो गांव वालों ने भी आखिर मान ही लिया कि फिल्म बनाना आसान काम नहीं है।

मेकअप टीम के दोनों लोगों ने समय बांट लिया कि दोनों बारह-बारह घंटे बारी-बारी सैट पर रहेंगे। चार लाइटमैन्स ने तय कर लिया कि एक आदमी आठ घंटे सोएगा बाकी तीन काम करेंगे। सेटिंग तीनों लोगों ने अपना समय बांट लिया। एक्टर्स ने अपने शॉट्स के हिसाब से समय तय कर लिया कि कब सोना है? कैमरे के साथ आये मनोज को हमने आश्वस्त किया जब लाइटिंग हो रही हो शॉट चल रहे हों तो हम सब संभालेंगे। हमारे आश्वासन पर वह बीच बीच में दो तीन घंटे की नींद ले ही लिया करता था। चूंकि हमारी पूरी टीम ही जयपुर की थी और सब एक दूसरे को वैसे भी जानते थे।

राजस्थान में अक्टूबर के दिन काफी गर्म होते हैं और रातें उसी अनुपात में काफी ठंडी। दिन में सब झुलसते और रात को ठिठुरते। घर के जिस कमरे से कंबल, बैडशीट, शॉल, तौलिया जिसको जो मिला लपेट लेते।

डायरेक्शन टीम में आसिफ के पास हर तनाव को एक ही नारा था कि बोलो जय सिया राम, बन गया काम।

डायरेक्शन टीम के ही श्रीकांत और विनय इंजीनियरिंग के फाइनल ईयर के स्टूडेंट थे और अपना कॉलेज छोड़ वहां लगे हुए थे। उनके हाथों में क्लैप और स्क्रिप्ट की फाइलें भरी रहतीं। लगातार जागते रहने से उनके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी। फीचर फिल्म का उनका पहला अनुभव था और वह भी लगातार काम करने का। मैंने उनसे कहा, इस फिल्म के बाद शायद ही तुम लोग अब फिल्मी दुनिया में जाने की सोचो। दोनों ने कहा, सर, हमें लग रहा है कि इंजीनियरिंग ही छूटेगी। इधर तो अब मजा आ रहा है।

तीन दिन लगातार काम करने के बाद तेरह अक्टूबर की सुबह तक हम लगभग आश्वस्त हो रहे थे कि हम शिड्यूल के करीब हैं। बात चौदह की शाम तक काम करने की थी लेकिन चौदह की पूरी रात काम किया। सुबह होते ही योगेश को जाना था लिहाजा जो कुछ काम बचा, वह मनोज ने हैंडल किया। पंद्रह की सुबह ग्यारह बजे क्रू को पैकअप कर दिया गया।

पूरी टीम ने कहा – इस बार हम जरा लेट चेते, अगली फिल्म में हम शुरू करेंगे और खत्म करके ही ब्रेक लेंगे। मैंने हाथ जोड़ दिये कि अगली फिल्म के लिए हम ज्यादा बजट रखेंगे और ज्यादा ब्रेक। इतना काम दुबारा करने की कल्पना मात्र से ही सिहरन होती है। तो इस तरह सात दिन के शिड्यूल को हम साढ़े सात दिन में पूरा कर पाये। इस दौरान कितनी समस्याएं कितने समाधान हर घंटे हमसे मुखातिब होते थे। मेरे दिमाग की मेज पर इतनी सारी फाइलें बिखरी थीं, जिनमें खाना पीना, अगली लोकेशन, गाड़‍ियां, डेट्स के अनुसार जयपुर से एक्टर्स का आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था देखना, स्थानीय स्तर पर ऊंटगाड़ी, ट्रैक्टर आदि का इंतजाम आदि। वे सारे किस्से फिर कभी बाद में। लेकिन मुझे अनुराग कश्यप की वो बात हमेशा याद रही कि यदि आप बजट को कम से कम रखोगे फिल्म बनाने में, तो जोखिम भी उसी अनुपात में कम होती जाएगी। यह बजट कम तभी रहा जब हमारी टीम कंधे से कंधा मिलाकर हमारे साथ खड़ी थी। मैं और भी फिल्म क्रू के साथ रहा हूं, लेकिन इतना अपनापा पहली बार देखा। यह जादुई था। आगे क्या होगा देखा जाएगा? फिलहाल फिल्म कल से एडिट टेबल पर जा रही है।

शनिवार, सितंबर 11, 2010

निराश करती फार्मूलों की वापसी


निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप की फिल्म दबंग सलमान खान के प्रशंसक दर्शकों के लिए हैं, जो अपने नायक को भ्रष्ट होने के बावजूद प्यार करते हैं। लुंगी पहने हुए इंस्पेक्टर चुलबुल पांडे अपने जर्जर घर की सीढियों से उतर रहे हैं। वाश बेशिन में मुंह धोना चाहते हैं लेकिन नल में पानी नहीं आ रहा है। यह एक सामान्य दृश्य है लेकिन दर्शक इस पर जोर जोर से हंसते हैं, क्योंकि जिस आदमी को उस नल से पानी चाहिए, वो सलमान खान है, वह नायक है। दबंग एक ऎसे नायक की फिल्म है,जो जो डरता नहीं है। भ्रष्ट तो है ही। नाम रॉबिनहुड से ज्यादा धोखा मत खाइए। वह किसी को भला करने वाला भी नहीं है। वह तो दो मटकों के पांच सौ रूपए एक लड़की को इसलिए देता है कि वह नायिका है और हीरो को उससे प्यार है। पांच सौ का नोट दिखाता सलमान सोनाक्षी से जो कहता है और सोनाक्षी बदले में जो कहती है, वह सब आप ट्रेलर में देख ही चुके हैं।

फिल्म की कहानी में कोई जान नहीं है। यह टिपिकल फार्मूला फिल्म है, जिसमें नायक बीस पचास गुंडों से अकेला ही लड़ लेता है। अगर आप सलमान के सच्चे प्रशंसक नहीं हैं और एक्शन भी आपको पसंद नहीं तो फिल्म में आप परेशान हो जाएंगे। एक मां के दो बेटे हैं। चुलबुल के जन्म के बाद उसके पिता की मौत के बाद उसकी मां ने प्रजापति पांडे से शादी कर ली। एक बेटा और हुआ। एक मां लेकिन दो बाप होने की वजह से दोनों भाइयों में कभी बनी ही नहीं और इसका फायदा लालगंज का उभरता नेतानुमा गंुडा उठाता है। चुलबुल पांडे से बदला लेने के लिए उसके भाई को इस्तेमाल करता है। जैसा कि फार्मूला फिल्मों में होता है, भाई से भाई का मिलन होता है और दोनों मिलकर छेदी सिंह को मारते हैं। तड़पा तड़पा कर।

यह अच्छा दृश्य बन पड़ा है लेकिन सारे नंबर मुन्नी बदनाम हुई गाने और उसके फिल्मांकन को जिससे आम भारतीय दर्शक को पैसा वसूल की अनुभूति होती है। यदि आप दर्शकों का भेद करें तो यह छोटे सेंटर्स और सिंगल स्क्रीन की फिल्म है। मल्टीप्लैक्स दर्शकों को उतना मजा नहीं आता। फिल्म को सलमान खान ही बचाते हैं। निर्देशक अभिनव कश्यप के लिए अच्छी बात यह है कि उनकी फिल्म में सलमान खान हैं। सोनाक्षी सिन्हा ने अपनी भूमिका में ठीक काम किया है। विनोद खन्ना, डिंपल कापडिया भी हैं। ओमपुरी, अनुपम खेर भी। लेकिन सब ठीक ठाक हैं। बहरहाल, फिल्म को मकसद कारोबार करना है, उस मोर्चे पर शायद बाजी मार ही जए। सिनेमा के लिहाज से ऎसी परंपरा की शुरूआत चिंताजनक है कि गजनी की कामयाबी ने हमें वांटेड दी ओर वांटेड की कामयाबी ने दबंग। कुल मिलाकर दबंग सलमान खान परंपरा की फिल्म है और निराश करती है।

शुक्रवार, अगस्त 13, 2010

कड़वी गोली, मिश्री के साथ


फिल्म समीक्षा: पीपली लाइव



आमिर खान प्रॉडक्शन्स की अनुषा रिजवी निर्देशित फिल्म पीपली लाइव में शुरू से अंत तक आप हंसते ज्यादा हैं। लेकिन यह खिसियानी हंसी है। हंसी लगभग वैसी है जैसे शायर ने कहा कि तुम इतना जो मुस्करा रहे हो, क्या गम है जिसको छुपा रहे हो।
कहानी में बुधिया और नत्था नाम के भाई किसान है, जो पुरखों की जमीन बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इलाके के नेता ने उन्हें किसी आत्महत्या की योजना की बारे में बता दिया है कि ऐसा करने से एक लाख रुपए मिलेंगे। बड़ा भाई बुधिया कहता है कि उसका वश चलता तो पुरखों की जमीन बचाने के लिए वह अपनी जान दे देता। उसके बार बार के उलाहने सुनकर छोटे नत्था ने कहा, तुम क्यों दोगे भैया, मैं जान दूंगा। बात एक स्थानीय पत्रकार के कान में पड़ती है, लोकल अखबार में छपती है। नेशनल चैनल में पहुंचती है और भेड़चाल वाले मीडिया के दर्जनों पत्रकार नत्था के गांव पीपली में डेरा जमाते हैं। चुनाव का वक्त है। एक पार्टी को नत्था के मरने से फायदा है, दूसरे को नत्था के जीने से। राजनीति शुरू होती है। गांव में मेला लग गया है। इसी कहानी में सरकारी योजनाओं का खोखलापन भी दिखता है, जब लालबहादुर योजना का हैंडपम्प जिलाधीश की ओर से भेज दिया जाता है, एक स्थानीय नेता की ओर से रंगीन टेलीविजन भेंट किया जाता है। दोनों उस मरते किसान के लिए गैर जरूरी हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री राज्य सरकार पर आरोप लगा रहे हैं और राज्य केंद्र पर। अतिरिक्त सुरक्षा से घिरे, बार बार पाखाने जाते नत्था का क्या होता है, यह फिल्म में देखने की बात है। लगे हाथ मीडिया की टीआरपी की भी खबर निर्ममता से ली गई है, जब अंग्रेजी पत्रकार नंदिता मलिक से राकेश बुनियादी सवाल पूछता है कि मीडिया को नत्था की मौत में ही क्यों दिलचस्पी है? और भी किसान मर रहे हैं, तो नंदिता कहती है, यदि वह इतना सोचता है तो उसे अपने लिए कोई और काम ढूंढऩा चाहिए।
तमाम हास्य के बीच व्यंग्य के तीखे तीर हैं। कृषि भवन में बैठा अंग्रेजीदां बंगाली अफसर दार्जिलिंग की चाय सुड़क रहा है और नत्था की हालत से चिंतित अपने युवा अफसर को कहता है कि तुम बहुत जल्दी घबरा जाते हो। यह गैंडे के खाल वाली नौकरशाही है। नत्था के गायब होने के बाद नौकरशाह, नेता, मीडिया सब अपने ठिकाने पर हैं। किसान के घर की हालत वैसी की वैसी है्र। जो पत्रकार संवेदनशील था, उसकी जान चली गई है। इस क्रूर दौर में संवेदनशील लोगों का यही हश्र हो रहा है। पीपली लाइव एक कड़वी दवा है, जिसमें मिश्री मिली हुई है तो निगलने में आसानी होती है। उस हंसी के पीछे बीमारी का दर्द,्र एक तंत्र की सड़ांध को कब तक छुपाया जा सकता है?
कहानी अच्छी है, संवाद चुटीले हैं। तंज है और शुरू से अंत तक बांधे रखने की क्षमता भी। रघुवीर यादव तो अच्छे अभिनेता हैं ही नत्था की भूमिका में ओंकार दास माणिकपुरी का काम काबिले तारीफ है। संगीत एकदम ताजातरीन है। जिसमें महंगाई डायन तो है ही। देश मेरा रंगरेज में इंडियन ओशियन बैंड का खूबसूरत म्यूजिक है। आमिर खान हैं तो इसका प्रचार भी है, वरना श्याम बेनेगल की फिल्म होती तो इतना स्टारडम कैसे आता? आमिर के बहाने ही सही, फिल्म देखने जरूर जाएं। आप निराश नहीं होंगे। परिवार के साथ जाने के इच्छुक दर्शकों के लिए सूचना है कि फिल्म में गालियां ठीक ठाक हैं, जो गांव की जुबान का ही हिस्सा हैं।

शनिवार, अगस्त 07, 2010

हौले हौले चलती प्रेम कहानी

फिल्‍म समीक्षा-आयशा
अनिल कपूर फिल्म कंपनी की फिल्म आयशा इस हफ्ते रिलीज हुई है। इसमें सोनम कपूर और अभय देओल लीड में हैं। फिल्म प्रेम कहानी है लेकिन इतनी धीमी है कि दो घंटे की फिल्म यूं लगती है, जैसे बहुत लंबी चल रही है।

आयशा एक अमीर घर की लड़की है जो मिडिल क्लास टाइप कुछ नहीं करती। उसे चलते फिरते लोगों की जोडियां बनाने में बड़ी दिलचस्पी है। उसकी सबसे खास दोस्त पिंकी उसके साथ है और बहादुरगढ से आई शेफाली के लिए वे लड़का ढूंढ रही हैं। इस भागदौड़ में शेफाली को वे आधुनिक बनाने पर तुली हैं।

अंतत: आयशा के आदतों से ऊब कर उसकी खास दोस्त उसी आदमी को प्यार करने लगती है जिसका वो अक्सर अपमान करती रहती थी। आयशा अब भी कन्फ्यूज्ड है कि वह किससे प्यार करती हैं। सोनम कपूर, इरा दुबे और आरती पुरी ज्यादातर समय स्क्रीन पर मौजूद रहती हैं और इनके बीच अभय देओल, साइरस साहूकार ओर अरूणोदय सिंह जरूरत के हिसाब से आते हैं।

निर्देशक राजश्री ओझा ने जीन ऑस्टिन के उपन्यास ऎम्मा के कथा सूत्रों से प्रेरित यह फिल्म खड़ी करने की कोशिश की है लेकिन अव्वल तो इस किस्म की पारिवारिक फिल्मों की भारतीय दर्शकों को आदत नहीं है। दूसरे, उन्होंने फिल्म को बहुत अच्छा नहीं बनाया है।

देविका भगत के स्क्रीनप्ले में झोल नहीं है लेकिन उसकी गति ही उसे कमजोर कर देती है। खासकर इंटरवल से पहले तक तो कहानी कुछ आगे बढती नहीं है। इंटरवल के बाद घटनाएं कुछ होती हैं तो एक लंबे क्लाइमैक्स ने सारी गड़बड़ कर दी। फिल्मांकन अच्छा किया गया है। जावेद अख्तर के ठीक ठाक से गीतों पर अमित त्रिवेदी का संगीत और पाश्र्व संगीत ज्यादा अच्छा है।

कुछ रूमानी क्षणों को निर्देशक ने बहुत अच्छे से हैंडल किया है लेकिन ओवरआल इसकी धीमी गति सपाट कथानक ही मारक है। आपको पता है कि रिलेशनशिप किस किस में विकसित हो सकती है लेकिन वह विकसित होने के दौरान के दृश्य गायब हैं।

कॉलेज गोइंग यूथ और किशोर यदि इसे पसंद करें तो बेहतर हैं। हमारी फिल्मों की प्रेम कहानियों को कालखंड भी छोटा सा होता है। लड़का लड़की मिलना, तनाव और प्यार हो जाना। सब कुछ सतही सा। सोनम कपूर अच्छी लगी हैं। उनके पिता की भूमिका में एमके रैना को देखना सुखद है। अभय देओल ने अंडरप्ले किया है लेकिन अपने रोल में वे फिट हैं।

और अब एक स्टुपिड बात। खबर प्रचारित की गई थी कि सोनम कूपर ने पहला ऑन स्क्रीन किस दिया है। क्लाइमैक्स से ठीक पहले अभय देओल सोनम के पलकों के ऊपरी हिस्से के चूमते हैं। फिर अपनी चुटकी में पकड़कर उसकी नाक हिलाता है, होठों के करीब आने से पहले कैमरे की आफसाइड अपना मुंह ले जाते हैं। बार बार लॉरेल का मेकअप करती सोनम के होठों पर कोई छुअन तक नहीं हैं। आप इसे किस मानें तो मान लीजिए। एक युवा दर्शक की टिप्पणी सुनिए, यार, इमरान हाशमी और अभय देओल में कुछ तो फर्क होगा ही।

शनिवार, जुलाई 31, 2010

नॉस्‍टेल्जिक असर वाली माफियाओं की मुंबई


इतिहास अपने आपको दोहराता है। कुछ कहानियां आप कभी भी चुनकर अपने ढंग से कह सकते हैं। गैँगस्टर्स की कहानियां भी ऎसी ही हैं। वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई निर्माता एकता कपूर और निर्देशक मिलन लूथरिया की ऎसी ही फिल्म है जिसमें मुंबई में माफिया गिरोहों के पनपने की कहानी है।

कहानी में ऎसा संकेत भी दिखता है कि यह हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम के चरित्रों से प्रेरित हैं। अनाथ बालक सुल्तान मिर्जा एक दिन मुंबई पर राज करने लगता है और उसके पास काम मांगने आया शोएब खान एक दिन उसका सबसे भरोसेमंद आदमी बन जाता है। सुल्तान एक दरियादिल आदमी है, जिसे आप दीवार और मुकद्दर का सिकंदर के अमिताभ, धर्मात्मा के विनोद खन्ना, दयावान के फिरोज खान आदि से मिला सकते हैं। यहां तक कि वह मां को परेशान करने वाले बेटे को भी पीट देता है। तस्कर है लेकिन उन्हीं चीजों की तस्करी करता है जिनके लिए सरकार मना करती है, उनकी नहीं जिनके लिए जमीर मना करता है।

सुल्तान को भी लाल बत्ती का लालच है और दिल्ली में मंत्री से डील करने के लिए जाते समय मुंबई का काम शोएब खान को सौंप गए। शोएब की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा बड़ी हैं और इसकी कीमत सुल्तान को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। सुल्तान कभी नहीं चाहता था कि शहर में गंदगी फैले। लेकिन शोएब ने खून खराबा आम कर दिया। कहानी एक पुलिस अफसर विल्सन के फ्लैश बैक में चलती है जिसने इस अपराध बोध में आत्महत्या करने की कोशिश की कि वह इस शहर को तबाही तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार बना। वह जानता था कि माफियाओं के गैर कानूनी कामों को रोका जा सकता था लेकिन वह आपसी गैंगवार से उन्हें मारना चाहता था। आज मार्च 93 के दंगों का भगौड़ा हमारी पकड़ में नहीं है।

कुल मिलाकर फिल्म एक पुरानी मुंबई की सैर कराती है और आपको ऊब नहीं होती। लेकिन याद रहे यह सत्या या कंपनी जैसी फिल्म नहीं है। यहां डॉन गंुडा होने के बावजूद मसीहा है। यहां वास्तव का रघु भी नहीं है, जो अपने किए पर एक अंदरूनी यात्रा करता है और पछताता है। प्यार के दृश्यों को भी अच्छा फिल्माया है जब अपनी पसंदीदा अभिनेत्री के लिए सुल्तान मिर्जा एक अमरूद चार सौ रूपए में खरीदकर ले गए। अजय देवगन ने जानदार काम किया है।

इरशाद कामिल के गीत अदभुत हैं और प्रीतम का संगीत भी लोकप्रिय हो ही चुका है। सबसे सुखद अनुभव यही है कि पुरानी सी दिखती मुंबई, पुराने पहनावे, पुराने गहने, सब अच्छे लगते हैं। मिलन लूथरिया की पुरानी फिल्मों से यह बेहतर है लेकिन इसी विषय पर बनी कई और फिल्मों से कमजोर। सत्तर के दशक के डॉयलॉग्स अपने जादू के साथ हैं। जैसे मैं कोयले की खदान में मशाल से रोशनी करने चला था, खदान ही जल उठी। या गुफा में चाहे कितना ही अंधेरा हो किनारे पर रोशनी जरूर होती है। तो एक नॉस्टेल्जिक अनुभव के लिए आप फिल्म देख सकते हैं। यह एक लोकप्रिय मसाला फिल्म है। माफिया पर बनी क्लासिक फिल्म नहीं।

शनिवार, जुलाई 10, 2010

फार्मूला कहानी में किस्मत का छौंक

फिल्‍म समीक्षा मिलेंगे मिलेंगे
‘मिलेंगे मिलेंगे’ इस हफ्ते रिलीज हुई है। फिल्म के निर्देशक सतीश कौशिक हैं और निर्माता बोनी कपूर। शाहिद कपूर और करीना कपूर की ऑफ स्क्रीन प्रेमकहानी खत्म हो चुकी है और यह फिल्म उसी समय बननी शुरू हुई थी जब दोनों के करीबी रिश्ते थे। जाहिर है इस जोड़ी के खत्म हो चुके रोमांस की वजह से फिल्म को कोई फायदा होगा इसकी ज्यादा अपेक्षा नहीं है।
प्रिया नाम की एक लडक़ी को एक टेरोकार्ड रीडर कहती है कि उसे उसके सपनों का राजकुमार विदेश में किसी समंदर के किनारे महीने की सात तारीख को सुबह सुबह सात रंग के कपड़े पहने मिलेगा। यह बातें उसने डायरी में लिखी और गलती से उसके कमरे घुसे लडक़े इम्मी ने वह डायरी चुरा ली। उसी क्रम से वह समंदर किनारे मिला और प्रिया को उससे प्यार हो गया। अचानक ही प्रिया की चुराई हुई डायरी की फोटोकॉपी इम्मी के कमरे से उसे मिल जाती है। वह समझती है कि उसके साथ धोखा हुआ है। बात बिगड़ जाती है। किस्मत ने ही उन्हें मिलाया है तो वह उसे चुनौती देती है, पचास के नोट पर लडक़े के टेलीफोन नंबर लिखकर और उससे किताब खरीदकर उस किताब पर लडक़ी ने अपने नंबर लिख दिए। किताब उसने किसी और शहर में बुकस्टोर को दे दी। ये जिस दिन एक दूसरे को मिल जाएंगे तो मान लेंगे कि किस्मत हमें मिलाएगी। बाद में दोनों एक दूसरे को ढूंढ़ रहे हैं। सूचना संजाल के आज के जमाने में दिल्ली मुंबई में घूम रहे प्रेमी एक दूसरे को ढूंढ नहीं पा रहे हैं, यह बात जरा हजम नहीं होती। लेकिन शाहिद करीना के फैन चाहें तो इस फिल्म को भी देख सकते हैं।
एक पुराने फार्मूला कहानी पर बनी इस औसत प्रेमकथा कोई चामत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद कम ही है। हालांकि फिल्म को संपादन के लिहाज से चुस्त किया गया है लेकिन डबिंग और कथा प्रवाह की अपनी समस्याएं हैं। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर को भी समकालीन करने की कोशिश की गई है लेकिन कमजोर कहानी ने सब गड़बड़ कर दिया है। हां, करीना और शाहिद बहुत खूबसूरत लगे हैं। वे तरोताजा दिख रहे हैं। हिमेश का संगीत अब आउटडेटेड लग रहा है।

फिल्म: रेड अलर्ट

नक्सलवाद के इर्द गिर्द मानवीय कहानी

खासकर उस समय जब देश के कई जिल नक्सलवाद की समस्या से ग्रस्त है, निर्माता टीपी अग्रवाल और निर्देशक अनंत महादेवन की फिल्म ‘रेड अलर्ट’ नक्सलवाद के भीतर फंसे एक आदमी की कहानी के बहाने उसके मानवीय अमानवीय चेहरे पर बात करते हैं। फिल्म प्रकारांतर से गरीब आदमी के नक्सली बनने और अपने बच्चों के भविष्य को लेकर आशंकित एक पिता की कहानी है। वह पहले ही दिन खाना बनाकर नक्सली कैंप में पहुंचाता है लेकिन पुलिस उसका पीछा करते हुए कैंप पर हमला कर देती है। उसके बाद वह कैंप में फंस जाता है। वहां प्रशिक्षण के दौरान वह लगातार अपने परिवार की चिंता करता रहता है। अतंत: एक दिन वह अपने कैंप कमांडर की हत्या कर वहां से भाग छूटता है। उसके बाद वह सरकारी गवाह बनता है और अपने ही साथियों को मरवाने में सहयोग करता है। इस बहाने निर्देशक ने बताया है कि किस तरह नक्सलियों को पकडऩे के बहाने पुलिस सीधे सादे आम लोगों पर अत्याचार करती है। उन पर दोहरी मार है। प्रकारांतर से नक्सलियों के तरफदारी करते हुए प्रतीत होते हैं, लेकिन उनके सिस्टम पर भी तंज है। जब उनकी टुकड़ी के सैन्य मुखिया बने आशीष विद्यार्थी एक पत्रकार को यह कहते हैं कि हमने विकास कार्य भी कराएं हैं। लोगों को बेहतर पैसा दे रहे हैं, उसी समय कैंप में आया नया नक्सली आकर यह कहता है कि आपने वादा किया था कि महीने के पंद्रह सौ मिलेंगे और अभी तक नहीं मिले।
नक्सलियों के नियम कायदे और भीतरी अंतद्वंद्व को फिल्म दिखाती है। फिल्म को और बेहतर किया जा सकता था। फिल्म के कुछ हिस्से बहुत ही अच्छे हैं। संवाद चुस्त हैं। लगातार किताबें पढने वाले नक्सली नेता से जब नरसिम्हा पूछता है कि अन्ना आप किताबें क्यों पढ़ते रहते हैं,तो वह कहता है, इनमें गोली से भी ज्यादा ताकत होती है। एक अच्छा दृश्य तब बनता है जब स्कूल में पुलिस के छिपाए हथियारों को लूटने के लिए नक्सली
सुनील शेट्टी ने ठीक काम किया है। आशीष विद्यार्थी, सीमा बिस्वास, विनादे खन्ना, सुनील सिन्हा और भाग्य श्री मुख्य भूमिकाओं में हैं।

शुक्रवार, जुलाई 02, 2010

अपनों पै करण, गैरों पै सितम



फिल्म समीक्षा: आय हेट लव स्टोरीज

-रामकुमार सिंह
करण जौहर के बैनर से रिलीज इस हफ्ते रिलीज ‘आय हेट लव स्टोरीज’ में लव और स्टोरीज की स्पेलिंग एसएमएस की जुबान वाली है। अंदाजा था कि यह उन दर्शकों के लिए हैं जिन्हें प्यार और भाषा दोनों के ही व्याकरण से खास फर्क नहीं पड़ता। अव्वल तो शीर्षक के बाद ही निर्देशक पुनीत मल्होत्रा सारे इंटरव्यूज में स्पष्टीकरण दे रहे थे कि फिल्म प्यार के खिलाफ नहीं है। उनकी बात सही है यह ना किसी के पक्ष में है ना किसी के खिलाफ। यह करण जौहर ब्रांड इश्किया भावुकताभरे सिनेमा का एक कमजोर ओर सामान्य संस्करण है। निर्देशक पुनीत मल्होत्रा करण के सहायक रहे हैं और वे नामी फैशन डिजायनर मनीष मल्होत्रा के रिश्‍तेदार हैं। जाहिर है, अपनों पर मेहरबान करण दर्शकों का खयाल कैसे रखते?
कहानी की पृष्ठभूमि करण जौहर ओर पुनीत मल्होत्रा के आत्मकथ्य जैसी है जिसमें प्रेम कहानियों पर फिल्म बनाने वाले वीर कपूर नाम के निर्देशक के सहायक जे या जय को प्रेम कहानियों में भरोसा नहीं है। उसकी आर्ट डायरेक्टर सिमरन का बॉयफे्रेंड राज है। सिमरन को बॉलीवुड टाइप प्रेम कहानियों में मजा आता है। वह जिंदगी को भी ऐसे ही रोमांटिक तरीके से देखती है। जय के साथ उल्टा है। जय और सिमरन को साथ काम करते हुए दोस्ती होती है। प्यार में बदलती है। इकतरफा प्यार में। सिमरन की तरफ से। वह राज को छोडऩा चाहती है लेकिन इधर जय ने मना कर दिया कि वह तो प्रेम कहानियों में यकीन ही नहीं करता। इंटरवल के बाद जय को लगता है कि वह सिमरन के बिना नहीं रह सकता और प्रेम प्रस्ताव सिमरन तक ले जाता है। छोटा मोटा चालू टाइप का ट्विस्ट है। यह बताने की जरूरत है नहीं कि सिमरन किसकी हुई? ऑफ कोर्स जय की।
फिल्म के सारे फ्रेम वाइन, बीयर, किताबें, फिल्मी सैट से भरे पूरे दिखते हैं और अच्छे लगते हैं। बहुत ही बोलती हुई फिल्म है। हर पात्र के पास बहुत सारी फालतू बातें हैं। हमारी नई पीढ़ी इतनी फालतू बातें नहीं करती। शॉर्ट एंड स्वीट बातें करती हैं। उनके मैसेज बॉक्स में बड़े शब्दों के भी छोटे रूप हैं। लेकिन इस फिल्म के पात्र लगातार बोलते ही रहते हैं। पूरी फिल्म में पीछे वॉइसओवर ने रही सही कसर पूरी कर दी। अभी तक की फिल्में देखकर इमरान खान की तारीफ सिर्फ इसीलिए नहीं की जा सकती कि वह आमिर का भतीजा है। उसके चेहरे पर अभिनेता वाले भाव ही नहीं आते हैं। सोनम बेशक अच्छी लगी हैं। खिली खिली सी। इतने सारे डायलॉग हैं कि आपको फुरसत ही नहीं है, कि फ्रेम और लोकेशन या एक्टर्स की खूबसूरती देखें।
मुमकिन है यह किशारों और युवाओं के बीच वाले उन सारे दर्शकों के अच्छी लगे, जो हर चीज को लेकर संदेह की स्थिति में रहते हैं। लेकिन कुछेक हिस्सों को छोड़ दें तो फिल्म के संवाद और कहानी जादुई नहीं है। यह एक साधारण सी प्रेम कहानी है। इस पीढ़ी को इससे बेहतर अनुराग कश्यप और इम्तियाज अली समझ रहे हैं। वे अलग प्रेम कहानियां कह रहे हैं। पुनीत मल्होत्रा में वो बात नहीं। विशाल शेखर के गाने औसत से बेहतर हैं। इनमें भी टाइटल ट्रेक और जब मिला तू ज्यादा अच्छे हैं। सामने कोई बड़ी रिलीज नहीं है, इसका फायदा शायद फिल्म के कारोबार को मिले।