सोमवार, फ़रवरी 15, 2010

प्रेम कि नैया है राम के भरोसे

तपती धूप के बाद हवाओं के साथ तैरते बादल पहाड़ पर टिक जाते हैं। आंखें अभिभूत होती हैं। टिप टिप सी बूंदें बदन को छूती हैं। रोम रोम में सिहरन होती है। बादलों की गरज से कानों में संगीत बजने लगता है। बूंदें तेज होती हैं तो जीभ अनायास बाहर निकलती है। एक बूंद उस पर गिरती है। शुक्रिया कायनात का कि उसमें नमक पूरा है। तड़ातड़ बूंदें मिट्टी पर हैं। वहां खुशबू की फसल उगती हैं। चारों ओर मिट्टी में फैली गंध नाक से घुसकर पूरे जिस्म में घुलती है। सुख देती है, जिसके बखान के लिए शब्द बने ही नहीं हैं। शायद इसी महक से अभिभूत मैं बचपन में मिट्टी खाना सीख गया था। वरना आज उसे चखते हुए ही सोचता हूं कि किसी बच्चे को इतनी फीकी और बेस्वाद चीज खाने में क्या मजा आता होगा? मौसम की पहली बरसात पर हमारी पांचों इंद्रियां बौराई हुई एक अनिर्वचनीय सुख महसूस करती हैं। प्रेम जिंदगी में ऐसे ही आता है। जैसे पहली बारिश आती है।
मुझे लगभग ऐसा ही अहसास होने का था, दो पुलिसवालों ने हमें अपने पास बुला लिया था। वे नाम पता पूछने में जुटे थे। हमारे घरवालों को फोन करने की धमकी देने लगे थे। पुलिसवालों ने पर्स भी निकलवाया। तब उसने हिम्मत दिखाई थी कि हम सिर्फ टहलने आए थे। तुम मेरे बाप को क्या फोन करोगे? तुम्हारा भी तो कोई बाप होगा, मैं उससे जाकर मिलती हूं। उसकी हिम्मत से मुझमें भी हिम्मत थी। मैं उसे दिल की कह नहीं पाया था। आज भी वह दोस्त जरूर है, लेकिन जब उस दिन की बात याद करते हैं तो हंसी थमती नहीं। मन में घुसा हुआ डर निकलता नहीं। मैं उन प्रेमियों को सलाम करता हूं, जिनके मन से यह डर निकल गया। उन्हें देखकर ही मेरा अधूरापन पूरा होता है।
पुलिस और परिजनों ने यह मान लिया है कि बच्चे जवान हो गए तो तय है कि बिगड़ गए हैं। सांस्कृतिक ठेकेदार प्रेमियों को सरेआम पीटकर यह स्थापित करते हैं कि उनके इस धरती पर पैदा होने में प्रेम तत्व की ही कमी रह गई थी। क्या आपने कभी किसी प्रेमी को डकैती के आरोप में पकड़ा है? क्या किसी प्रेमी ने बैंक लूटा है? हां, प्रेमियों के हत्या करने की खबरें यदा कदा आती हैं। क्या वे सचमुच प्रेमी होते हैं? बारिश का फायदा उठाकर वे एक लहलहाती फसल के बीच में उगी खरपतवार हैं। एक ही वक्त में कई साथियों के साथ प्रेम में डूबने की आजादी चाहने वाले लम्पट होते हैं। उन्हें प्रेमियों की दुनिया से बाहर धकेलिए। प्रेम हमारे यहां स्वीकार्य नहीं। कोई उसे कोई संरक्षण नहीं है। उनकी नैया राम के भरोसे है। यहीं क्यों? दुनिया के कई समाजों में प्रेमियों पर बंधन के किस्से यहां करने का क्या औचित्य? सिनेमा के पर्दे पर हम चाहते हैं कि दो हंसों का जोड़ा मिल जाए तो ही कहानी पूरी होती है। असल जिंदगी में हमारे ही घर में ऐसा हो तो उस जोड़े को अलग करने में हम सारा श्रम और दिमाग लगा देते हैं। अच्छी बात है कि हरियाणा पुलिस ने थानों में ऐसे आवास बनाने की पहल की है, जहां घर से भागकर शादी करने वाले लोगों को सुरक्षा और आवास दोनों मिलेगा।
सच तो यह है कि हमें जश्न मनाना चाहिए कि किसी को प्रेम हुआ है। किसी ने यह अहसास किया है, जैसे पहाड़ से टपकती बारिश की बूंदें हमारी इंद्रियों को झंकृत करती हैं। जैसे स्टेशन पर आती हुई रेल अच्छी लगती है। जैसे दूर मरूस्थल में टीले पर उगे रोहिड़े के सुर्ख फूल अच्छे लगते हैं? कोई पूछे ये सब क्यों अच्छा लगता है तो इसका एक ही जवाब है, 'मुझे प्रेम हो गया है।Ó फूल पर बैठी तितली को देखते हुए, पहाड़ पर संतुलन बनाकर चरती हुई बकरी को देखते हुए, आसमान में स्वच्छंद उड़ रही चिडिय़ा को देखते हुए क्या हम उन्हें अपराधी मानते हैं? तो फिर प्रेम में लिप्त कॉफी हाउस की एक मेज पर या पार्क की बेंच पर दुनिया से निर्लिप्त दो प्रेमियों ने क्या अपराध किया है? केदारनाथ सिंह की कविता 'हाथ याद आती है-
'उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए

शुक्रवार, फ़रवरी 12, 2010

हम होंगे कामयाब एक दिन


करण जौहर अपनी प्रेम मुहब्बत, रोने धोने वाले फार्मूले से मुक्ति की छटपटाहट से बाहर आने की कोशिश कर रहे है। उन्हें हमारे हौसले की जरूरत है। माय नेम इज खान के जरिए वे यह बताना चाह रहे हैं कि दुनिया मे सिर्फ दो ही किस्म के इंसान होते हैं, अच्छे और बुरे। यहां नायक सेलफोन भी इस्तेमाल नहीं करता क्योंकि उसके सिगनल से मधुमक्खियों को दिक्कत होती है। तीसरी बात यह कि वह अमेरिका के राष्ट्रपति से मिलना चाहता है। यह कहना चाहता है कि माइ नेम इज खान एंड आय एम नॉट अ टेरेरिस्ट। अमूमन लोग उम्मीद कर रहे हैं कि फिल्म की तुलना आमिर सलमान अक्षय कुमार के अनुपात में हो तो यह निहायत ही गलत तरीका है। यह फिल्म थ्री इडियट नहीं है। यह फिल्म हमारे भीतर छुपे शैतान को पत्थर मारने में हमारी मदद करती है जहां बाल ठाकरे या बजरंग दलियों ने यह मान लिया है कि खान सरनेम का अर्थ ही धोखेबाज और आतंकवादी होना है। यह एसपर्जर सिंड्रोम से पीडित रिजवान खान की कहानी है, जिसे नई जगह, पीले रंग और तेज शोर से डर लगता है लेकिन वह बहुत ही समझदार और ज्ञानी भी है। धुन का पक्का है। मानवीय नजरिया उसे उसकी मां, उसके टीचर वाडिया और इस्लाम से उसे विरासत में मिला है। वह अमेरिका में एक लड़की मंदिरा के सैलून मे अपने ब्यूटी प्रोडक्ट बेचने जाता है और उसी से प्यार कर बैठता है। मंदिरा तलाकशुदा है और उसके पहले से एक बच्चा है। शादी के बाद उसका सरनेम मंदिरा खान और उसके बेटे का नाम समीर खान हो जाता है। 9/11 से पहले सब कुछ ठीक था लेकिन उसके बाद पूरी दुनिया ने करवट ली खान सरनेम की वजह से एक हादसा होता है। दोनों पति पत्नी अलग हो जाते हैं। मंदिरा उसे चुनौती देती है कि किस किस के सामने वह बेगुनाही का सबूत देगा कि तुम्हारा नाम खान है और तुम टेरेरिस्ट नहीं हो। यहां से खान अमेरिका के प्रेसीडेंट से मिलने की यात्रा शुरू करता है। जहां जहां राष्ट्रपति को जाना होता है, वहां वह पहुंचता है, लेकिन मिल नहीं पाता। फिल्म इसी यात्रा को आगे बढाती है और अंजाम तक पहुंचती है। इस यात्रा में रिजवान खान एक नायक बनकर उभरता है। जॉर्जिया में छोटे से गांव के लोगों को बचाने में रिजवान खान अकेला जुटा तो उसके पीछे सैकड़ों लोग राहत सामग्री लेकर आए हैं। जहां वह काउंटर पर कमरे की सिर्फ जानकारी लेने गया था वहां भी होटल मालिक ने बोर्ड टांग लिया है कि यहां खान ठहरा था।


कहानी में बीच में कहीं ठहराव और एकरसता आती है लेकिन सारे नंबर शाहरूख खान को इसलिए जाते हैं कि वह अभिनय के एक नए अवतार में सामने है। क क किरण से, राज और राहुल को पछाड़ते हुए आप आने वाले समय में रिजवान को याद रखेंगे। काजोल तो उम्दा है ही। एक मुद्दत बाद हम होंगे कामयाब अपनी पूरी ताकत के साथ सिनेमा में आया है।करण जौहर वैसे भी अपने सिनेमा में खूबसूरत लोेकेशन्स की सैर कराते हैं। यहां भी उनके डीओपी रवि के. चंद्रन कैमरे से कविता लिख रहे हैं। सैन फ्रांसिस्को की एक ऎसी जगह दिखाते हैं कि सिनेमाघर में उस खूबसूरती पर तालियां बजती हैं। माइ नेम इज खान की तारीफ इसलिए करना और भी मौजूं है कि हमारी राजनीति और आदमी की लिप्साओं ने जो भेदभाव का जो अमानवीय चेहरा हमारे सामने बना लिया है उसे चुनौती दी जा सके। गीत तेरे नैना और सजदा पहले से काफी लोकप्रिय हो चुके हैं।

सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

दिल तो बच्चा है जी

बीते सप्ताह के पंाच दिन कब गुजर गए, पता नहीं चला। जयपुर साहित्य उत्सव अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। शुरूआती सालों के तीन-चार आयोजनों में स्थानीय प्रतिनिघित्व की उपेक्षा, शराबनोशी और अंग्रेजी वर्चस्व जैसी टिप्पणी करने वाले ज्यादातर लोग पस्त नजर आए। हालांकि ये तीनों मुद्दे वैसे ही खड़े हैं। मुद्दा उठाने वाले कुछ लोग तो खुद ही फेस्टिवल के पाले में जाकर बैठ गए। उनसे पूछो तो खिसियाकर कहते हैं, यार, अब फेस्टिवल ही चल निकला है, तो समर्पण में भलाई है। बाजार बहुत क्रूर होता है। निजी मुनाफे के जीवन मूल्य हर आंदोलन पर भारी पड़ते हैं। फेस्टिवल की खूबी यह थी कि देशभर से युवा फिल्मकार, पाठक और साहित्य के विद्यार्थी शामिल हुए। किताबों के काउंटर पर भीड़ थी और ठीक-ठाक बिक्री भी। फेसबुक पर मेरी टिप्पणी से कुछ मित्रों को बुरा लगा। राजस्थानी के सत्र में हिंदी और अंग्रेजी ज्यादा बोली जा रही थी। राजस्थानी अपने ही घर में मेहमान की तरह थी। श्रोताओं को आसानी से समझाने के लिए ऎसा किया गया। तो रसूल हमजातोव को अंग्रेजी में क्यों नहीं लिखना चाहिए था। एक छोटी सी जगह "दागिस्तान" की "अवार" जुबान में लिखी उनकी रचना दुनिया की श्रेष्ठ किताबों में शुमार होती है। पाठकों को पढ़नी होती है तो वे उसके उपलब्ध अनुवाद ढूंढ़ लेते हैं या खुद करते हैं। शेक्सपियर की अंग्रेजी या कालिदास की संस्कृत आप नहीं पढ़ सकते, तो दोनों महान लेखकों को रत्तीभर फर्क नहीं पड़ता।हिंदी प्रेमियों के "दंभी" वक्तव्यों से भावुक होकर मैंने अंग्रेजी साहित्य के बजाय हिंदी पढ़ने को प्राथमिकता दी थी। बाजार के नियम के अनुसार मुझे नुकसान हुआ। मुझे पछतावा नहीं है। मुझे हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों से सहानुभूति है। लेकिन ज्यादा सहानुभूति राजस्थानी साहित्य के छात्रों से है जो ऎसे ही किसी मोहपाश में पड़कर इन्हें पढ़ते हैं। वे राजस्थानी का पर्चा इसलिए लेते हैं कि परीक्षा में अंक अच्छे आते हैं। राजस्थानी एक "हाई स्कोरिंग" विषय है। विद्यर्थियों और इसे मान्यता दिलाने वालों के लिए भी। अकादमियों के पुरस्कारों पर बात बेमानी, जहां हरीश भादानी पिछड़ जाते हैं। "मायड़" भाषा का झंडा बुलंद करने वाले आपस में एक मत नहीं है। सांविधानिक मान्यता मिलने से क्या राजस्थानी की चुनौतियां खत्म हो जाएगी? मराठी सिनेमा ऑस्कर तक जाता है। मराठी फिल्मकारों के हौसले की वजह यह है कि एक निश्चित अवघि तक कोई मराठी फिल्म हर सिनेमाघर के लिए चलाना कानूनी अनिवार्यता है। पिछले आठ साल में क्या कोई राजस्थानी फिल्म जयपुर के किसी मल्टीप्लेक्स में चली? वहां तो समोसा बेचने वाला भी अंग्रेजी बोलता है।

हमारी कला-संस्कृति मंत्री बीना काक खुद फिल्मों से जुड़ी रही हैं। क्या वे समझती नहीं है कि किसी जमाने की भरी-पूरी राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री लगभग खत्म हो गई। जब भोजपुरी फिल्में हिट हो सकती हैं, तो राजस्थानी क्यों नहीं? कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ही शिक्षकों के लिए होने वाली भर्तियां ही क्या राजस्थानी में रोजगार का माध्यम हैं। सिनेमा, संगीत और नाटक में कितनी अकूत संभावनाएं हैं। अनिल मारवाड़ी का नाटक "जयपुर की ज्यौणार" क्या राजस्थानी वालों ने देखा है? ढूंढाड़ी के इस नाटक के सामने जयपुर के रंगकर्मियों का हिंदी नाटक नहीं ठहर सकता। "सफेद ज्वारा" भी उसका ऎसा ही ढूंढाड़ी नाटक है।

हिंदी की चुनौती को गीतकार प्रसून जोशी ने विज्ञापन और फिल्मी दुनिया में महसूस कर कहा कि इस क्षेत्र में लेखकों का घोर अभाव है। इस क्षेत्र में अंग्रेजी पढे-लिखे लचर और छिछले ज्ञान वाले लोग भरे पड़े हैं। मैं खुद भी अंग्रेजी लेखकों को सुनने-समझने ही गया, लेकिन राजस्थानी के सत्र में मंच से जब अंग्रेजी बोली गई, तो मुझे भी बहुत बुरा लगा। दिल तो बच्चा है जी। उसे बुरा लगा, तो लगा।

शुक्रवार, जनवरी 29, 2010

इश्किया: खुरदरे रोमांस का सिनेमा


विशाल भारद्वाज का सिनेमा करण जौहर के रेशमी सिनेमा से अलग एकदम खुरदरा है। उसी खुरदुरेपन में रोमांस है, ईष्र्या है, लालच है। निर्देशक अभिषेक चौबे की यह पहली फिल्म है और उनके हिस्से की तारीफ बनती है। इश्किया दो ऐसे बदमाशों बब्बन और खालूजान की कहानी है, जो दिल के अच्छे हैं और एक दिन लालच में आकर अपने बॉस मुश्ताक के पैसे चुराकर भाग जाते हैं। शरण अपने पुराने दोस्त के घर पर लेते हैं, जहां पता चलता है कि दोस्त मर चुका है। उसकी बीवी कृष्णाा अकेली रहती है। लेकिन उनके बॉस मुश्ताक को उनकी खबर लग जाती है और अपने भोलेपन में पकड़े जाते हैं। पांच लाख खर्च हो गए हैं। बचे खुच बीस लाख भी चोरी हो गए हैं। अब उनके सामने चुनौती है कि पच्चीस लाख का इंतजाम करें। कृष्णा उन्हें गांव छोड़कर भागने नहीं देती क्योंकि अब वह भी मुश्ताक के गनपॉइन्ट पर है। इस उलझन में बब्बन और खालू दोनों को ही कृष्णा से प्यार हो जाता है। जिस्मानी बाजी बब्बन मार जाता है और खालू जरा इमोशनल ही रहता है। उसे बब्बन पर गुस्सा भी है कि वह जहां भी जाता है, ऐसे काम पहले निपटाता है। इसी दौरान वे पैसा कमाने का प्लान बनाते हैं और कहानी एक रोमांचक अंत की और बढ़ती है।
सिनेमा में यह देहात की मजबूत वापसी है। फिल्म का देशकाल मौजूदा यूपी का नेपाल का सीमावर्ती इलाका है। फिल्म उस गांव को पूरी शिद्दत के साथ दिखाती है। सीमावर्ती गांवों में हो रहे हथियारों के कारोबार और सत्ता की लिप्सा भी दिखाती है लेकिन बिना किसी उपदेश के यह एक थ्रिलर कॉमेडी फिल्म है जिसके चुटीले और बेहतरीन संवाद हंसाते हैं, इसी लड़ाई झगड़े के बीच रोमांस की एक लहर चलती है, जिसमें तीनों पात्र डूबे हुए हैं। फिल्म विशाल भारद्वाज कमीने की ही तरह छाए हैं। वे प्रोड्यूसर, संगीतकार, पटकथा लेखक और संवाद लेखक के रूप में जुड़े हुए हैं लेकिन अभिषेक चौबे के निर्देशन की तारीफ लाजिमी है। अभिनय में नसीरूद्दीन शाह, अरशद वारसी छाए हैं। विद्या एक बोल्ड लेडी के रूप में बेहतरीन अभिनय भी किया है और बेइंतहा खूबसूरत भी लगी है। फिल्म गुरू में माधवन के साथ चुंबन दृश्य के बाद यहां अरशद वारसी के साथ उससे भी बोल्ड दृश्य है। विद्या के पति की भृमिका में आदिल हुसैन और नंदू के रूप में मास्टर आलोक भी याद रहते हैं। गुलजार साहब दिल तो बच्चा है जी के साथ छाए हुए हैं। विशाल का बेहतरीन संगीत है।

रण: कांच के जैसे साफ उसूल


कहानी के मोर्चे पर रामगोपाल वर्मा यहां उपदेशात्मक हो गए हैं। रण हालांकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ब्रेकिंग न्यूज बनाने की प्रक्रिया की पोल खोलती है। ऐसा नहीं है कि वर्मा यह बात झूठ कह रहे हैं क्योंकि हमारे देश में इस तरह खबर बनाने के उदाहरण खूब मिलते हैं। लेकिन वर्मा राजनीति और मीडिया के उस खतरनाक ध्रवीकरण की ओर भी संकेत करते हैं, जहां मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी विश्वसनीयता खोता जा रहा है। तो रण में बुराई क्या है? असल में कहानी को इतना सरलीकृत बना दिया है कि कोई भी खबर कहीं भी खरीदी और बेची जा सकती है?कहानी एक ऐसे आदर्शवादी चैनल मालिक की है कि जिसकी ईमानदारी पर सारा देश यकीन करता है। उसी आदर्श के जुनून में एक नया पत्रकार इस चैनल में भर्ती होता है लेकिन टीआरपी की दौड़ में यह चैनल पिछड़ रहा है और इसी चैनल को छोड़कर गए कर्मचारी ने एक नया चैनल खड़ा कर लिया है जो टीआरपी में टॉप पर है। आदर्शवादी पिता का पुत्र चैनल की टीआरपी बढाने के लिए एक राजनीतिक षड्यंत्र में शामिल होता है और जब तक पोल खुलती है, देश की सत्ता पलट चुकी होती है। ईमानदारी से जीने वाला पत्रकार पत्रकारिता छोडऩे का संकल्प लेता है लेकिन आदर्शवादी चैनल मालिक उसे नई कमान सौंपता है। अमिताभ बच्चन ने चैनल मालिक की भूमिका में जान डाल दी है। रितेश देशमुख पत्रकार के रूप बिल्कुल नए लुक में हैं और बहुत अच्छे लगे हैं। सुदीप की तारीफ होनी चाहिए। जन गण मन विवाद के बाद फिल्म में गाना शामिल हुआ है वंदेमातरम। लेकिन पुराने गाने जैसा जादू इसमें नहीं। एक गाना ठीक है, कांच के जैसे साफ उसूल, कांच के जैसे टूट गए। रामगोपाल वर्मा की कहानी पर सवाल उठाए जा सकते हैं लेकिन उनके निर्देशन और शॉट टेकिंग कमाल की है। फिल्म शुरुआत में बहुत ही धीमी रह गई है, हालांकि इंटरवल के बाद हिस्सा थ्रिलर की तरह चलता है लेकिन यह सच है कि अधिक रिसर्च के आधार पर फिल्म को और बेहतर बनाया जा सकता था।

शुक्रवार, जनवरी 22, 2010

'वीर: फॉर्मूलों का बड़ा हादसा


साल का पहला महीना बीत रहा है और इंडस्ट्री के लिए एक और बुरी खबर है। निर्देशक अनिल शर्मा की 'वीर भी उसी रास्ते पर भटक गई, जहां बॉलीवुड फिल्में अक्सर भटक जाती हैं। भव्यता के बावजूद लचर कहानी ने 'वीर का बलिदान कर दिया है। गदर में पाकिस्तान को गाली दी गई थी इसलिए एक खराब और लाउड फिल्म होने के बावजूद वह चल गई थी, यहां तो अंग्रेजों को गालियां हैं और वह भी काल्पनिक तरीके से। कहानी में इतिहास मेहमान की तरह आता है, जहां से सिर्फ पिंडारी, माधवगढ़, ब्रिटिश शासन, युवराज, वचन, बदला जैसे शब्द लिए गए हैं। एक प्रेम कहानी बनाई गई है, जिसमें दुश्मन माधवगढ़ की राजकुमारी से पिंडारी सरदार के पुत्र को प्यार हो जाता है। प्यार लंदन में होता है और उसका अंत माधवगढ़ में। एक ट्रेजिक लव स्टोरी है लेकिन उसमें संवेदना ही नहीं है। पूरी फिल्म में नायक और उसका भाई कभी मजाकिया होते हैं तो कभी वे बलवान हो जाते हैं। स्वयंवर जैसे पिटे हुए फार्मूले और उसमें भी पहलवान से लड़ाई में जीतने वाले को राजकुमारी का मिल जाना। हे भगवान, थ्री इडियट देखने के बाद तो हमारे दर्शकों को समझ में आ ही गया होगा कि अच्छी कहानी बिना स्टार के भी चलेगी और खराब कहानी वाली फिल्म में सलमान खान भी कुछ नहीं कर सकते। सलमान के प्रशंसक भी शायद इस फिल्म से निराश हों।
दरअसल इस प्रेम कहानी में यह बहुत ही नाटकीय लगता है कि जंगल में लूटपाट करने वाला पिंडारी रेल में एक राजकुमारी को देखता है। वही अचानक लंदन पढऩे भी चला जाता है, जिसे लॉर्ड मैकाले की नई शिक्षा नीति की मेहरबानी बताया गया है। अगले ही क्षण वह लंदन में है, लंदन में उतरते ही उसे वही राजकुमारी मिल गई जिससे उसको प्यार हुआ था। काश, दुनिया की हर कहानी इतनी ही खूबसूरत होती जितनी इस फिल्म की कहानी बेतरतीब उड़ती तमन्ना।
फिल्म खुलती है तो एक भव्यता लिए हुए हैं। घोड़ों की रोमांचक कर देने वाली दौड़, पिंडारियों की दहाड़ अच्छी लगती है लेकिन यह सब टुकड़ों में है। फिल्म को फायदा इसी बात का है कि इसमें सलमान खान हैं। वरना जरीन खान की सिर्फ शक्ल ही कैटरीना से मिलती है, उसके चेहरे पर तो भाव पूरी फिल्म में एक से ही हैं। वीर की थोड़ी बहुत इज्जत भव्यता ने भी बचाई है। गोपाल शाह की सिनेमाटोग्राफी बेहतरीन है। मोंटी का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, टीनू वर्मा के एक्शन कुछ नए हैं और कुछ पुराने जमाने की यादें ताजा कराते हैं। यानी फिल्म में कुछ भी इतना खराब नहीं है जितनी खराब कहानी है। गीत ठीक ठाक है और वे उतने लोकप्रिय नहीं हो पाए जो कि गुलजार के सामान्य गीत भी हो जाते हैं। संगीत भी औसत ही है। हां, सिंगल स्क्रीन सिनेमा में फिल्म को शायद ठीक कलेक्शन मिलें।

सोमवार, जनवरी 18, 2010

रेत में, रेल का सफर





मैंने सुना कि एक टिकट जांचने वाला भी ट्रेन के साथ चलता है। बस के कंडक्टर की तरह उससे टिकट लेकर आप रेल का सफर कर सकते हैं। खूब देखने की कोशिश की लेकिन वह दिखाई नहीं दिया। ज्यादातर यात्री मेरी ही तरह इसी उम्मीद में यात्रा पूरी कर गए कि
टिकटवाला दिखे तो टिकट खरीदें। बहुत से ऎसे भी थे जो दुआ कर रहे थे कि वो दिखे ही
नहीं, ताकि टिकट खरीदना ही ना पड़े।


चूरू जिले में सरदारशहर में रेलवे पटरी का आखिरी छोर है। यह रतनगढ़ से जुड़ा है। चूरू-रतनगढ़-जोधपुर मार्ग पर ब्रॉडगेज का काम चल रहा है। लिहाजा इन दिनों एक टे्रन सरदारशहर और रतनगढ़ के बीच ही फंसी है। यानी यह रेल भारतीय रेल के विशाल नेटवर्क के एकदम कटी हुई है। एक तरफ रतनगढ़, एक तरफ सरदारशहर। पिछले कई महीनों से एक रेल और तीन इंजन उस पटरी पर ही बंद हैं। अगले कई महीने वे ऎसे ही रहेंगे। चार डिब्बों की वाली यह रेल दिन में तीन बार रतनगढ़ से सरदारशहर जाती है और वहां से वापस आती है। तीन इंजन बारी बारी रेल को लाते, ले जाते हैं। रात को पूरी रेल रतनगढ़ रेलवे स्टेशन पर अकेले रहती है। रतनगढ़ रेलवे स्टेशन के सामने एक मित्र के घर में तीन दिन तक रहा। इसी दौरान सरदारशहर की यात्रा भी की। खूबसूरत मरूस्थलीय लैंडस्कैप जादुई लगे। डीजल के इंजन से छुक-छुक की आवाज तो नहीं आती, लेकिन डिब्ब्ाों के पहियों से आने वाली "घड़मच्च, घड़मच्च" आवाज वैसी ही है। मार्ग में ग्रामीण स्टेशनों से लोग चढ़ते उतरते रहते हैं।

मैंने सुना कि एक टिकट जांचने वाला भी ट्रेन के साथ चलता है। बस के कंडक्टर की तरह उससे टिकट लेकर आप रेल का सफर कर सकते हैं। खूब देखने की कोशिश की, लेकिन वह दिखाई नहीं दिया। ज्यादातर यात्री मेरी ही तरह इसी उम्मीद में यात्रा पूरी कर गए कि टिकटवाला दिखे तो टिकट खरीदें। बहुत से ऎसे भी थे जो दुआ कर रहे थे कि वो दिखे ही नहीं, ताकि टिकट खरीदना ही ना पड़े। करीब पैंतीस किलोमीटर लंबी इस पटरी पर सिर्फ एक ही रेल है। उस रेल में आप इस भरोसे के साथ बैठ सकते हैं कि वह सामने आने वाली किसी रेल से टकराएगी नहीं, ना ही पीछे से आ रही कोई रेल उसे टक्कर मार सकती है। कम टिकटों की बिक्री की वजह से हो रहे घाटे के कारण रेलवे ने यह गाड़ी बंद कर दी थी और एक डिब्बे वाली रेल बस चलाई थी। लोगों ने धरना दिया, आंदोलन किया तो इस रेल को फिर से शुरू किया गया।

रेल बचपन से आकर्षित करती रही है। ननिहाल के पास से गुजरती रेलवे लाइन पर हम अक्सर खेलते रहे हैं। दस पैसे के सिक्के को रेल आने से ठीक पहले पटरी पर रख दिया करते थे ताकि पहियों के भारी भरकम बोझ से वह फैल जाए। अक्सर थरथराती पटरियों पर वह पहियों के नीचे आने से पहले ही लुढ़क जाता। लेई, गोंद, फेविकोल चुराकर हम उसे पटरी से चिपकाए रखने का जतन करते थे। हमारी पॉकेटमनी के कई दस पैसे रेल से कुचलकर हादसे के शिकार हुए। मेरी पहली रेल यात्रा के समय मैं छह साल का था और मेरे कान में पहना सोने का "बाला" पड़ोस में बैठी महिला की "लुगड़ी" में उलझ गया था। मेरा कान खून से रंग गया था। मैंने दो तीन मुक्के उस महिला को जमा दिए थे। मेरी इस हरकत पर मां ने मुझे डांटा था। आज भी रेल की यात्रा के दौरान वो दर्द याद आता है। रतनगढ़ से सरदारशहर वाली रेल एक दिन तो खूबसूरत लगती है लेकिन फिर उतनी ही भयावह। एक ऎसा सफर जिसमें सब कुछ तय हो, फेरे, स्टेशन, डिब्बे, लोग, ड्राइवर, टीटीई, गार्ड, थमना, चलना तो वह उबाऊ हो जाता है। क्या हम इतना एकाकी जीवन जीते हुए खुश रह सकते हैं? मेरी उस रेल से सहानुभूति है कि जल्दी से ब्रॉडगेज का काम पूरा हो और दो स्टेशनों के बीच फंस चुकी उस रेल और उसके तीन इंजनों को मुक्ति मिले।

एक पीढ़ी को बदलते हुए

जयपुर के क्रिस्टल पाम मॉल में सबसे महंगे मल्टीप्लेक्स आइनॉक्स में लगभग हर शुक्रवार मैं फिल्म का पहला शो देखता हूं। मुझे सुखद आश्चर्य होता है कि वहां सबसे उम्रदराज दर्शक मैं ही होता हूं। वहां लड़के-लड़कियां समूह में होते हैं। हर समूह का खर्च लगभग दो हजार के आसपास हो जाता है। वे टिकट के अलावा कोल्ड ड्रिंक्स, पॉपकॉर्न आदि पर उतना ही खर्च कर देते हैं, बिना किसी हिचक के। उनके अपने पीयर ग्रुप्स के साथ सपनीली दुनिया के कुछ खूबसूरत ख्वाब भी। अंदाजा करता हूं कि इनमें कोई तीस फीसदी युवक-युवतियां अपने घरवालों को बताकर आते हैं कि वे अपने फ्रेंड्स के साथ फिल्म देखने जा रहे हैं। जब भी टीवी कैमरे पर फिल्म के बारे में दर्शकों की राय लेने की बारी आती है तो वे कैमरे के सामने आने से बचते हैं। डर यही होता है कि शाम को सिटी न्यूज बुलेटिन में मम्मी पापा उनकी शक्ल न देखलें।

इसके बावजूद वे अपने दोस्तों के समूह में सर्वाघिक खुश और आत्मविश्वास से लबरेज नजर आते हैं। लेकिन आने वाले वक्त में वे अपने दोस्तों के साथ फिल्म देखने में अपराधबोध का बोझा उठाकर नहीं जाएंगे। मेरे यकीन का आधार यह है कि तीस से चालीस की उम्र के मेरे ज्यादातर दोस्त इस पीढ़ी को देखकर यह अफसोस जाहिर करते हैं कि वे इस पीढ़ी से एक दशक बड़े हैं। उनमें ज्यादातर अपने बच्चों की परवरिश खुले दिमाग से कर रहे हैं।

डेली न्यूज़ के हमलोग में १७ जनवरी को प्रकाशित कॉलम तमाशा मेरे आगे