सोमवार, अक्टूबर 19, 2009
हंसो और कहो आल दा बेस्ट
यह तो अब माना ही जा सकता है कि मोहित शेट्टी का कहानी कहने का अपना तरीका है और उसमें वे लोगों को हंसाने की ताकत रखते हैं। दीवाली के मौके पर रिलीज उनकी फिल्म ऑल द बेस्ट में गोलमाल जैसा जादू तो नहीं है लेकिन वह गोलमाल रिटन्र्स के आसपास जरूर ठहरती है। खासकर इंटरवल के बाद कहानी में तेजी आती है और जब आप सिनेमाघर से बाहर निकलते हैं तो मुस्कान आपके चेहरे पर रहती है।ऑल द बेस्ट कॉमेडी ऑव एरर्स जैसा ही मसला है जब एक म्यूजिक बैंड को कामयाब करने के लिए एक स्ट्रगलर भाई ने अपने अमीर एनआरआई भाई को झूठ बोल दिया है कि उसने शादी कर ली है और भाई ने उसकी पॉकेट मनी बढा दी है। एक दिन अचानक भाई की लोशोटो जाने वाली फ्लाइट की इमरजेंसी लेंडिग गोवा हो जाती है और उनका भाई बेवक्त उनके घर पहुंच जाता है। उसने अपने छोटे भाई की पत्नी से मिलने की इच्छा व्यक्त की है, उसे अपराधबोध है कि वो शादी में नहीं आ पाया था। लेकिन गलती है वह दूसरी लड़की को अपने भाई की पत्नी समझ लेता है। जबकि उसने शादी ही नहीं की है और एक लड़की सिर्फ उसकी गर्लफे्रंड है। एक झूठ को छुपाने के लिए सैकड़ों झूठों का सहारा लेना पड़ता है और हर झूठ के साथ लेखक और निर्देशक ने आपके हंसने का मसाला गुण ओर मात्रा के लिहाज से बढ़ा दिया है लिहाजा इंटरवल तक धीमी गति से चलने वाली कामेडी एक्सप्रेस उसके बाद थोड़ी गति पकड़ती है और गंतव्य तक जाती है। बीच बीच में मोहित शेट्टी ने अपनी चिरपरिचित अदा में फिल्म को नॉन लीनियर भी करते हैं, मसलन, एक एक्शन दृश्य की शुरूआत से पहले संजय को गुंडा पूछता है, ए अंकल, कॉमेडी कर रहे हो क्या? तो संजय का जवाब है, बेटा, कॉमेडी तो अब शुरू की है, एक्शन तो तीस साल से कर रहा हूं। कुल मिलाकर ऑल द बेस्ट मोहित शेट्टी की परम्परा की फिल्म है और उस पर लिखने से ज्यादा वह आपको देखने से समझ में आएगी।
ब्लू - समंदर में डूबी कहानी
आपने आज से पहले भारतीय फिल्मों में ऎसे दृश्य नहीं देखे होंगे। फिल्म ब्लू का प्रचार करने वालों ने ऎसा कहा है तो जाहिर है उन्होंने झूठ नहीं बोला है। यह सचमुच रोमांचित करने वाला अनुभव है। खासकर हिंदी फिल्मों में लेकिन सौ करोड़ रूपए को पानी में इस तरह बहाया जाएगा, इसका अंदाजा नहीं था। किसी भी एक्शन भी बिना किसी कहानी या घिसी फिटी एक फार्मूला कहानी के आधार पर यदि आप ज्यादा खींचेंगे तो वह फिल्म को खराब करेगा। ब्लू इसका अपवाद नहीं है।
नए निर्देशक एंथनी डिसूजा की तारीफ करिए कि उन्होंने अपना सिनेमाटोग्राफर पीटर को चुना जो दुनिया में अंडरवाटर स्टंट फिल्माने के लिए जाना माना नाम है। आरव मल्होत्रा यानी अक्षय कुमार एक बिजनेसमैन है और सागर यानी संजय दत्त एक फिशरमैन या गोताखोर है। सिर्फ सागर को पता है कि लेडी इन ब्लू नाम का एक जहाज समंदर में किस जगह डूबा था। उसमें बेशुमार दौलत थी। आरव उस खजाने को हासिल करने के लिए सागर से दोस्ती करता है लेकिन कोई वजह है जो उसे खजाने तक जाने से रोकती है। आखिरकार सागर के छोटे भाई समीर यानी जाएद खान की वजह से सागर को खजाना ढूंढ़ लाने के लिए मजबूर होना पड़ता है और वे इसे ले आते हैं। बीच में एक विलेन भी है और काम चलाऊ टि्वस्ट भी लेकिन ब्लू की तारीफ आपको सिर्फ इसलिए करनी होगी कि उसमें अद्भुत दृश्य है, जिन्हें पानी में फिल्माया गया है। पानी में फिल्माए जाने की थकान के साफ शिकार अभिनेता दिखते हैं और संजय और अक्षय वैसा अभिनय नहीं कर रहे हैं जैसा वे आमतौर पर भी करते हैं। जाएद खान को खैर अभिनय आता ही कहां है। लारा दत्ता ने बिकनी पहनकर पर्याप्त अंग प्रदर्शन किया है लेकिन यह कामयाबी की गारंटी नहीं है। आप ब्लू देखना चाहते हैँं समंदर के बेहतरीन दृश्यों के लिए बेशक देखने जाएं, कहानी से निराश होेगे। दूसरे काइली की चिगी विगी गाना भी आपको अच्छा लग सकता है।
नए निर्देशक एंथनी डिसूजा की तारीफ करिए कि उन्होंने अपना सिनेमाटोग्राफर पीटर को चुना जो दुनिया में अंडरवाटर स्टंट फिल्माने के लिए जाना माना नाम है। आरव मल्होत्रा यानी अक्षय कुमार एक बिजनेसमैन है और सागर यानी संजय दत्त एक फिशरमैन या गोताखोर है। सिर्फ सागर को पता है कि लेडी इन ब्लू नाम का एक जहाज समंदर में किस जगह डूबा था। उसमें बेशुमार दौलत थी। आरव उस खजाने को हासिल करने के लिए सागर से दोस्ती करता है लेकिन कोई वजह है जो उसे खजाने तक जाने से रोकती है। आखिरकार सागर के छोटे भाई समीर यानी जाएद खान की वजह से सागर को खजाना ढूंढ़ लाने के लिए मजबूर होना पड़ता है और वे इसे ले आते हैं। बीच में एक विलेन भी है और काम चलाऊ टि्वस्ट भी लेकिन ब्लू की तारीफ आपको सिर्फ इसलिए करनी होगी कि उसमें अद्भुत दृश्य है, जिन्हें पानी में फिल्माया गया है। पानी में फिल्माए जाने की थकान के साफ शिकार अभिनेता दिखते हैं और संजय और अक्षय वैसा अभिनय नहीं कर रहे हैं जैसा वे आमतौर पर भी करते हैं। जाएद खान को खैर अभिनय आता ही कहां है। लारा दत्ता ने बिकनी पहनकर पर्याप्त अंग प्रदर्शन किया है लेकिन यह कामयाबी की गारंटी नहीं है। आप ब्लू देखना चाहते हैँं समंदर के बेहतरीन दृश्यों के लिए बेशक देखने जाएं, कहानी से निराश होेगे। दूसरे काइली की चिगी विगी गाना भी आपको अच्छा लग सकता है।
गुरुवार, सितंबर 10, 2009
आगे से राइट- कल्टी मारो निकल भागो
श्रेयस तलपड़े देश के कई शहरों में पुलिस की वर्दी पहनकर घूमे थे और जयपुर के शॉपिंग मॉल्स में लोगों की खूब तलाशी ली थी कि उनकी पिस्तौल खो गई है। श्रेयस यह समझदारी अपनी फिल्म "आगे से राइट" की कहानी ढूढ़ने में लगाते तो शायद लेखक व निर्देशक को कोई सलाह दे पाते। उनकी सारी तलाशी के बावजूद "आगे से राइट" में हंसी और मनोरंजन गायब रहता है। हां, वह है जरूर लेकिन वह सब टीवी के कॉमेडी सीरियल जैसा ही है।
कहानी दिनकर वाघमारे नाम के एक सब इंस्पेक्टर के इर्द गिर्द है, जो बाघ तो दूर किसी को थप्पड़ नहीं मार सकता। डयूटी च्वाइन करने के साथ ही उसकी गन खो गई है। वह उसे ढूंढ़ रहा है। तलाश में वह ऊपरी तौर पर मुसीबतों में फंसता है लेकिन संयोग से वह हीरो बनकर निकलता है। इतना निरीह पुलिस सब-इंस्पेक्टर हिंदी फिल्मों में अब तक शायद नहीं दिखाया गया। कथा का दूसरा सूत्र एक पाकिस्तानी आतंकवादी के इर्द गिर्द है जिसकी भूमिका में केके मेनन हैं। वह भारत में "जंग-ए-आजादी" के नाम पर बम फोड़ने और तबाही मचाने आया है लेकिन उसकी हवा पर्ल नाम की डांसर ने निकाल दी है। उसका दिल खो गया है। उसे उससे प्यार हो गया है। वह नफरत के बजाय मोहब्बत का मसीहा बनने को चला है। यानी एक गन खोए सब इंस्पेक्टर और दिल खोए आतंकवादी की यह कहानी सिर्फ टुकड़ों में अच्छी है। मुंबई को सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और आतंकवादियों का लोकल एजेंट राघव भाई भी एक मामूली सी घटना के बाद भला आदमी बन गया है। सबका आपस में कोई बहुत च्यादा लेना देना नहीं है, सिर्फ इतना सा है कि वह गन अलग अलग मौकों पर इन लोगों के पास से गुजर रही है। फिल्म की कहानी में बीच के हिस्से में इतना लोचा रह गया है कि एक ठीक ठाक क्लाइमेक्स भी लोगों को हंसाने के लिए पात्रों के साथ दर्शकों को रिश्ता जोड़ने में नाकामयाब रहता है, जैसा कि प्रियदर्शन की फिल्मों में अमूमन होता है। निर्देशक इंद्रजीत नटूजी की पहली फिल्म है और निराश करती है। गीत संगीत कामचलाऊ है।
श्रेयस तलपड़े ने ठीक काम किया है। केके मेनन जैसे अच्छे अभिनेता की प्रतिभा जाया की गई है। शेनाज टे्रेजरी वाला को एक्टिंग नहीं आती। देव डी से चमकी माही गिल एक आघ और ऎसे रोल कर लेंगी तो काम खल्लास समझो। विजय मौर्य ने राघव भाई के रोल में अच्छा काम किया है। शिव पंडित बोरिंग है। सीरियल जैसा ही सुख लेना है तो आगे से राइट जाकर हॉल में घुसें। वरना सीघे चलते रहें और अपना एक घंटा तिरेपन मिनट का समय किसी और नेक काम में लगाएं।
कहानी दिनकर वाघमारे नाम के एक सब इंस्पेक्टर के इर्द गिर्द है, जो बाघ तो दूर किसी को थप्पड़ नहीं मार सकता। डयूटी च्वाइन करने के साथ ही उसकी गन खो गई है। वह उसे ढूंढ़ रहा है। तलाश में वह ऊपरी तौर पर मुसीबतों में फंसता है लेकिन संयोग से वह हीरो बनकर निकलता है। इतना निरीह पुलिस सब-इंस्पेक्टर हिंदी फिल्मों में अब तक शायद नहीं दिखाया गया। कथा का दूसरा सूत्र एक पाकिस्तानी आतंकवादी के इर्द गिर्द है जिसकी भूमिका में केके मेनन हैं। वह भारत में "जंग-ए-आजादी" के नाम पर बम फोड़ने और तबाही मचाने आया है लेकिन उसकी हवा पर्ल नाम की डांसर ने निकाल दी है। उसका दिल खो गया है। उसे उससे प्यार हो गया है। वह नफरत के बजाय मोहब्बत का मसीहा बनने को चला है। यानी एक गन खोए सब इंस्पेक्टर और दिल खोए आतंकवादी की यह कहानी सिर्फ टुकड़ों में अच्छी है। मुंबई को सबसे बड़ा हथियार सप्लायर और आतंकवादियों का लोकल एजेंट राघव भाई भी एक मामूली सी घटना के बाद भला आदमी बन गया है। सबका आपस में कोई बहुत च्यादा लेना देना नहीं है, सिर्फ इतना सा है कि वह गन अलग अलग मौकों पर इन लोगों के पास से गुजर रही है। फिल्म की कहानी में बीच के हिस्से में इतना लोचा रह गया है कि एक ठीक ठाक क्लाइमेक्स भी लोगों को हंसाने के लिए पात्रों के साथ दर्शकों को रिश्ता जोड़ने में नाकामयाब रहता है, जैसा कि प्रियदर्शन की फिल्मों में अमूमन होता है। निर्देशक इंद्रजीत नटूजी की पहली फिल्म है और निराश करती है। गीत संगीत कामचलाऊ है।
श्रेयस तलपड़े ने ठीक काम किया है। केके मेनन जैसे अच्छे अभिनेता की प्रतिभा जाया की गई है। शेनाज टे्रेजरी वाला को एक्टिंग नहीं आती। देव डी से चमकी माही गिल एक आघ और ऎसे रोल कर लेंगी तो काम खल्लास समझो। विजय मौर्य ने राघव भाई के रोल में अच्छा काम किया है। शिव पंडित बोरिंग है। सीरियल जैसा ही सुख लेना है तो आगे से राइट जाकर हॉल में घुसें। वरना सीघे चलते रहें और अपना एक घंटा तिरेपन मिनट का समय किसी और नेक काम में लगाएं।
थ्री- लव लायज एंड बिट्रायल
आपने अंग्रेजी फिल्म "द परफेक्ट मर्डर" देखी है क्या कहा, अंग्रेजी नहीं आती हिंदी में डब की हुई डीवीडी और सीडी बाजार में है। हिंदी में अब्बास मुस्तन की "हमराज" देखिए। विक्रम भट्ट के सहयोगी रहे विशाल पंड्या की निर्देशित फिल्म "थ्री: लव, लाय एंड बिट्रायल" एक खराब नकल है और कमजोर सस्पेंस थ्रिलर है। एक नाकाम सॉफ्टवेयर इंजीनियर राजीव दत्त की अमीर पत्नी अंजनी दत्त का खूबसूरत घर बिकने को आ गया है लेकिन वह अपनी पुश्तैनी सम्पत्ति का हवाला देते हुए उसे बेचने से रोकती है। बच्चों की वायलिन टीचर है और च्यादा कमाई के लिए एक पेइंग गेस्ट रख लिया है। पति पत्नी में बनती नहीं और पेइंग गेस्ट ने यह पहचान लिया है। वह तुरंत घर की मालकिन से जिस्मानी रिश्ते बनाता है। यह सब कहानी में इतना तेजी से होता है, जैसे उस घर की मालकिन इसी बात का इंतजार कर रही है कि कब कोई उनके घर रहने आए और कब उसे प्रेम करने का मौका मिले। पेइंग गेस्ट अब परेशान कर रहा है और पति पत्नी छुटकारा पाना चाहते हैं। लड़की के लिए अब दोनों ही लोग भरोसे के काबिल नहीं है। कुल मिलाकर यहां कहानी सस्पेंस में बदलती है और अंजाम तक पहुंचती है।
कहानी शुरू में तेज चलती है फिर घटनाएं रिपीट सी लगती हैं और फिर सब कुछ जाना पहचाना सा लगता है। संवाद इतने सतही हैँ कि मजा नहीं आता। कहीं कहीं वे नर्सरी राइम्स की तरह लगने लगते हैं। पति के रोल में अक्षय कपूर अपरिपक्व लगते हैं। आशीष चौघरी ओवररिएक्ट कर रहे हैं और नौशीन अपनी पहली ही फिल्म में मोनोटोनस हैं।
फिल्म की एकमात्र खूबी फिल्मांकन है। प्रवीण भट्ट की सिनेमाटोग्राफी की तारीफ कर सकते हैं। यही एक सकारात्मक बात फिल्म में है कि स्कॉटलैंड के खूबसूरत लोकेशन्स दिखाए गए हैं। खासकर जब इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना एक पुल जो मूव करता है। नावों के लिए रास्ता छोड़ता है और फिर पुन: सड़क में तब्दील हो जाता है। फिल्म में सिर्फ स्कॉटलैण्ड अच्छा है, बाकी सब कुछ औसत है।
कहानी शुरू में तेज चलती है फिर घटनाएं रिपीट सी लगती हैं और फिर सब कुछ जाना पहचाना सा लगता है। संवाद इतने सतही हैँ कि मजा नहीं आता। कहीं कहीं वे नर्सरी राइम्स की तरह लगने लगते हैं। पति के रोल में अक्षय कपूर अपरिपक्व लगते हैं। आशीष चौघरी ओवररिएक्ट कर रहे हैं और नौशीन अपनी पहली ही फिल्म में मोनोटोनस हैं।
फिल्म की एकमात्र खूबी फिल्मांकन है। प्रवीण भट्ट की सिनेमाटोग्राफी की तारीफ कर सकते हैं। यही एक सकारात्मक बात फिल्म में है कि स्कॉटलैंड के खूबसूरत लोकेशन्स दिखाए गए हैं। खासकर जब इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना एक पुल जो मूव करता है। नावों के लिए रास्ता छोड़ता है और फिर पुन: सड़क में तब्दील हो जाता है। फिल्म में सिर्फ स्कॉटलैण्ड अच्छा है, बाकी सब कुछ औसत है।
रविवार, अगस्त 23, 2009
हम शहर क्यों आते हैं

जुलाई-अगस्त 1992 में मैं पहली बार जयपुर आया था और ऐसा लगा था, जैसे एक गांव के अनजान से आदमी की आंखों के सामने चमत्कार घटित हो रहा है। इस महीने मैं अठारहवें में प्रवेश कर गया हूं। सत्रह साल मैंने ठेठ ग्रामीण और कस्बाई माहौल में बिताए और बाकी सत्रह साल एक महानगर होते बड़े शहर में।
दो दिन पहले जब गांव गया तो पाया स्कूली बच्चे खुश थे कि आजादी का जश्न मनाया जा रहा और उन्हें मिठाई मिली है। हालांकि गांव का सरकारी स्कूल, जिसमें मैं पढ़ा था, उसकी हालत आजकल खराब है और गांव में हमारे गांव के दो जनों ने मिलकर एक स्कूल खोला है, जिनका दावा है कि उनका स्कूल इंगलिश मीडियम है। जहां तक मैं जानता हूं, दोनों ही पार्टनर्स को अंग्रेजी का खास ज्ञान नहीं है। उनके टीचर भी कोई उम्दा नहीं है, दसवीं पास विद एनी डिवीजन। कोई फर्क नहीं पड़ता। गांव के ज्यादातर बच्चे कथित तौर पर अंग्रेजी मीडियम शिक्षा ले रहे हैं। जो लोग आर्थिक रुप से बहुत ही कमजोर हैं और मिड डे मील का लालच जिन परिवारों को है, वे अब हमारे स्कूल में जा रहे हैं।
अगर आप एल्युमिनी बनाएं तो हमारे स्कूल से एक जज, तीन डॉक्टर, कई इंजीनियर, असंख्य फौजी, एक आध मेरे जैसा कलमघिस्सू पत्रकार, सैकड़ों शिक्षित माताएं, अध्यापक और पता नहीं क्या क्या सूची है, मैं दावे से कह सकता हूं कि जो पढाई हमने सरकारी स्कूल में की थी, उसका रत्ती भर पर उस कथित अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ाया जा रहा है। यह बात मैं गांव में मेरे परिचित उन परिवारों को मौखिक रूप से बता चुका हूं कि इससे बेहतर वे अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में डालें, जहां कम से प्रशिक्षित शिक्षक तो हैं, भले ही कम पढाएं, आप गांव वाले उन पर दबाव बनाएं लेकिन कोई टस से मस नहीं होता। मुझे अफसोस है कि मेरे गांव के छोटे बच्चे ऐसी भाषा पढ़ रहे हैं, जिसके बारे में वे कुछ नहीं जानते और उनके शिक्षक तो और भी कम जानते हैं।
मुझे यह भी जानकारी मिली कि मेरे गांव में नरेगा के तहत काम करने के लिए बीते साल अठावन लाख रुपए की मंजूरी सरकार ने दी है लेकिन कई काम इसलिए नहीं हो रहे हैं हमारी सरपंच अंगूठाछाप है, उसका पति भी अंगूठाछाप है। यह एक आरक्षित सीट थी, गांव पुराने असरदार लोगों ने उस दलित महिला के पति को भरोसे में लेकर चुनाव लड़ाया था लेकिन जल्दी ही उसने गांव के सवर्ण लोगों से किनारा कर लिया। उसे लगा कि ये लोग उसके हिस्से का माल भी डकार जाएंगे, लेकिन हमारा सौभाग्य यही है कि वह खुद अनपढ है और उसे पैसे खाने के जायज तरीके भी नहीं आते। मेरे माता पिता आज भी गांव में रहते हैं, जब कभी उन्हें मैं मेरे जयपुर वाले घर पर लाता हूं तो कुछेक दिन के बाद पिताजी हर बार कहते हैं कि फलां आदमी को फोन करके पूछना कि गांव में बारिश है या नहीं। मां अक्सर शिकायत करती है कि उसे गाडि़यों की आवाज में नींद नहीं आती। कई बार यह भी कि पंखा बंद करो, बहुत शोर करता है, नींद नहीं आती। लिहाजा पन्द्रह दिन बाद उन्हें वापस गांव छोड़ना होता है। अब तो साल में एक बार तब आते हैं, जब उनकी मजबूरी है। मसलन तीन महीने पहले पिताजी इसलिए आए थे उनकी आंख का मोतियाबिंद का आपरेशन होना था। तीन दिन बाद लौट गए। डॉक्टर ने एक महीने बाद फिर दिखाने को कहा था। मैंने उन्हें आने का पूछा तो बोले, दिखने तो लगा है ही, अब डॉक्टर क्या करेगा।
मेरे बच्चे शहर के कथित प्रतिष्ठित जेब काटने वाले अंग्रेजीदां स्कूलों में जाते हैं, जब मैं पिताजी को उनका फीस स्ट्रक्चर बताता हूं तो वे पहले तो चौंकते हैं कि इतने रुपए का दो रुपए सैकड़ा से ब्याज इतना होता है और तुम लोग गांव में रहकर आराम से अपना काम चला सकते हो। हालांकि बाद में वे चौपाल पर अपने हमउम्र दोस्तों के बीच इस बात पर फख्र भी करते हैं कि हमारे गांव के कई परिवारों की वार्षिक आमदनी और खर्च उतना नहीं है, जितना मेरे पोते पोती अपने स्कूल फीस में उड़ा देते हैं।
जो शहर अच्छा लगता था, अब रोजाना काटने को दौड़ता है। दो दिन पहले गांव में सुबह हुई तो आंगन में दस बारह मोरों का एक परिवार तफरीह कर रहा था। आसमान में हजारों तोते उड़ रहे थे और बेहतरीन सरगम गा रहे थे। कौवे, चिडि़यांएं, कबूतर, कमेड़ी आदि उनकी संगत कर रहे थे। आसमान में बादल छाए थे और इक्की दुक्की बूंदे भी गिर रही थीं। मुझे लगा जैसे स्वर्ग की कल्पना ऐसी ही रही होगी। वरना मेरे जयपुर वाले घर के बाहर पांच बजे से स्कूल बसों के भोंपू बजने शुरू हो जाते हैं। घर के अंदर तक धुंआ भर जाता है। हॉर्न ऐसे बजते रहते हैं, जैसे उनके बिना काम ही नहीं चल सकता।
मुझसे जल्दी बच्चे जाग जाते हैं, उन्हें स्कूल जाने की तैयारी करनी होती है। उनके घर लौटने तक रोजाना उनकी मम्मी एक अजीब से खौफ में रहती है। दुर्घटनाएं, स्वाइन फलू, बच्चों के अपहरण से जुड़ी जो खबरें रोजाना चाय के साथ इस शहर में अखबार हमें परोसता है, इससे उसकी मनोस्थिति ऐसी हो गई है कि किसी दिन पंद्रह मिनट बस या आटो लेट हो जाए तो स्कूल से लेकर मुझ तक टेलीफोन की घंटियां बज जाती हैं कि बच्चे अभी तक क्यों नहीं आए।
मुझे याद है, ना तो हमारी मां, ना ही गांव की आजकल की मम्मियां इस बात की परवाह करती हैं कि बच्चे स्कूल से आने में देरी क्यों कर रहे हैं। वे कहीं भी नई ब्याई कुतिया बच्चों के साथ खेल रहे होते हैं, जैसा कि हम किया करते थे। तितलियों के पीछे भागते हुए एक घंटा बिता देते हैं। कहीं भी चार आड़ी तिरछी लाइने खींचकर लंगड़ी टांग खेलने लगते हैं।
शहर में मेरे घर की बालकनी के ठीक सामने एक स्कूल है, अंग्रेजीदां और महंगा। छुटटी होने से दस मिनट पहले ही वहां माताएं, पिता, दादा, दादी या ड्राइवरों का जमावड़ा लग जाता है। वे अपने बच्चों को एक पल भी अकेले नहीं छोड़ सकते। उनका बचपन देखकर मुझे अपने स्वच्छंद दिन याद आते हैं जब घंटों तक मां हमारी परवाह नहीं करती थी। हम देर रात तक पीपल के भूत को देखने के लिए किसी कोने में दुबककर अंदाजा लगाते थे कि कम से कम आज तो भूत सू सू करने या पानी पीने या खाना जुटाने पीपल से बाहर निकलेगा, जिसके बारे में हमारी दादी से लेकर मां हमें आज तक डराती आई थी और कई गिलास दूध उसी डर में हम पी जाया करते थे। लेकिन कमबख्त भूत कभी बाहर आया ही नहीं। हां इतना जरूर है, जब विलंब से घर पहुंचते थे, मां के पास एक चांटा हमारे लिए आरक्षित रहता था कि इतनी देर से क्यों आए। हम इस चांटे के बारे में वाकिफ होते थे और रोज अपनी ही गलती दोहराते थे।
आज जब मेरी बेटी साना गांव जाती है तो गांव के बच्चे उसे घेर लेते हैं कि वह शहर से आई है। वे उसके बोलने के ढंग को मंत्रमुग्ध होकर देखते हैं, उसका रंग गांव के बच्चों के मुकाबले ज्यादा साफ है। साना भी उनकी कॉपी करती है, आजकल वह हमारे गांव की बोली बोलने लगी है। अपनी दादी और नानी से वह उन्हीं की जुबान में बात करती है। मेरे बेटे को गांव की जुबान बोलनी नहीं आती। हम घर में कोशिश करते हैं ज्यादा से ज्यादा राजस्थानी में बात करें लेकिन वह समझ सब लेता है, बोलता है तो हिंदी और राजस्थानी को गड़ड मडड कर देता है। फोन पर जब वह अपनी दादी या नानी से बात करता है, दोनों तरफ अंदाज से ही हाल चाल पूछे जाते हैं। क्योंकि दादी नानी को हिंदी समझने में परेशानी होती है और पोते दोहिते को मारवाड़ी। साना के दोस्तों को बड़ा संसार गांव में हैं, शहर में अपने मोहल्ले में उसकी किसी बच्चे से नहीं बनती। दो दिन की छुटटी के बाद जब हम जयपुर लौटने को सामान अपनी कार में रख रहे थे तो साना ने मुझसे पूछा, पापा, क्या हमारा शहर में रहना ज्यादा जरूरी है। हम क्यों नहीं अपने गांव में रहते। इतना बड़ा घर, खुली हवा और इतने सारे दोस्त।
मेरे पास मेरी बेटी को जवाब देने के लिए कुछ नहीं थ। आखिर यह सवाल तो मैं कई महीनों से खुद को ही पूछ रहा हूं कि क्या मेरा गांव छोड़कर शहर आना इतना ही जरूरी था।
दो दिन पहले जब गांव गया तो पाया स्कूली बच्चे खुश थे कि आजादी का जश्न मनाया जा रहा और उन्हें मिठाई मिली है। हालांकि गांव का सरकारी स्कूल, जिसमें मैं पढ़ा था, उसकी हालत आजकल खराब है और गांव में हमारे गांव के दो जनों ने मिलकर एक स्कूल खोला है, जिनका दावा है कि उनका स्कूल इंगलिश मीडियम है। जहां तक मैं जानता हूं, दोनों ही पार्टनर्स को अंग्रेजी का खास ज्ञान नहीं है। उनके टीचर भी कोई उम्दा नहीं है, दसवीं पास विद एनी डिवीजन। कोई फर्क नहीं पड़ता। गांव के ज्यादातर बच्चे कथित तौर पर अंग्रेजी मीडियम शिक्षा ले रहे हैं। जो लोग आर्थिक रुप से बहुत ही कमजोर हैं और मिड डे मील का लालच जिन परिवारों को है, वे अब हमारे स्कूल में जा रहे हैं।
अगर आप एल्युमिनी बनाएं तो हमारे स्कूल से एक जज, तीन डॉक्टर, कई इंजीनियर, असंख्य फौजी, एक आध मेरे जैसा कलमघिस्सू पत्रकार, सैकड़ों शिक्षित माताएं, अध्यापक और पता नहीं क्या क्या सूची है, मैं दावे से कह सकता हूं कि जो पढाई हमने सरकारी स्कूल में की थी, उसका रत्ती भर पर उस कथित अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ाया जा रहा है। यह बात मैं गांव में मेरे परिचित उन परिवारों को मौखिक रूप से बता चुका हूं कि इससे बेहतर वे अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में डालें, जहां कम से प्रशिक्षित शिक्षक तो हैं, भले ही कम पढाएं, आप गांव वाले उन पर दबाव बनाएं लेकिन कोई टस से मस नहीं होता। मुझे अफसोस है कि मेरे गांव के छोटे बच्चे ऐसी भाषा पढ़ रहे हैं, जिसके बारे में वे कुछ नहीं जानते और उनके शिक्षक तो और भी कम जानते हैं।
मुझे यह भी जानकारी मिली कि मेरे गांव में नरेगा के तहत काम करने के लिए बीते साल अठावन लाख रुपए की मंजूरी सरकार ने दी है लेकिन कई काम इसलिए नहीं हो रहे हैं हमारी सरपंच अंगूठाछाप है, उसका पति भी अंगूठाछाप है। यह एक आरक्षित सीट थी, गांव पुराने असरदार लोगों ने उस दलित महिला के पति को भरोसे में लेकर चुनाव लड़ाया था लेकिन जल्दी ही उसने गांव के सवर्ण लोगों से किनारा कर लिया। उसे लगा कि ये लोग उसके हिस्से का माल भी डकार जाएंगे, लेकिन हमारा सौभाग्य यही है कि वह खुद अनपढ है और उसे पैसे खाने के जायज तरीके भी नहीं आते। मेरे माता पिता आज भी गांव में रहते हैं, जब कभी उन्हें मैं मेरे जयपुर वाले घर पर लाता हूं तो कुछेक दिन के बाद पिताजी हर बार कहते हैं कि फलां आदमी को फोन करके पूछना कि गांव में बारिश है या नहीं। मां अक्सर शिकायत करती है कि उसे गाडि़यों की आवाज में नींद नहीं आती। कई बार यह भी कि पंखा बंद करो, बहुत शोर करता है, नींद नहीं आती। लिहाजा पन्द्रह दिन बाद उन्हें वापस गांव छोड़ना होता है। अब तो साल में एक बार तब आते हैं, जब उनकी मजबूरी है। मसलन तीन महीने पहले पिताजी इसलिए आए थे उनकी आंख का मोतियाबिंद का आपरेशन होना था। तीन दिन बाद लौट गए। डॉक्टर ने एक महीने बाद फिर दिखाने को कहा था। मैंने उन्हें आने का पूछा तो बोले, दिखने तो लगा है ही, अब डॉक्टर क्या करेगा।
मेरे बच्चे शहर के कथित प्रतिष्ठित जेब काटने वाले अंग्रेजीदां स्कूलों में जाते हैं, जब मैं पिताजी को उनका फीस स्ट्रक्चर बताता हूं तो वे पहले तो चौंकते हैं कि इतने रुपए का दो रुपए सैकड़ा से ब्याज इतना होता है और तुम लोग गांव में रहकर आराम से अपना काम चला सकते हो। हालांकि बाद में वे चौपाल पर अपने हमउम्र दोस्तों के बीच इस बात पर फख्र भी करते हैं कि हमारे गांव के कई परिवारों की वार्षिक आमदनी और खर्च उतना नहीं है, जितना मेरे पोते पोती अपने स्कूल फीस में उड़ा देते हैं।
जो शहर अच्छा लगता था, अब रोजाना काटने को दौड़ता है। दो दिन पहले गांव में सुबह हुई तो आंगन में दस बारह मोरों का एक परिवार तफरीह कर रहा था। आसमान में हजारों तोते उड़ रहे थे और बेहतरीन सरगम गा रहे थे। कौवे, चिडि़यांएं, कबूतर, कमेड़ी आदि उनकी संगत कर रहे थे। आसमान में बादल छाए थे और इक्की दुक्की बूंदे भी गिर रही थीं। मुझे लगा जैसे स्वर्ग की कल्पना ऐसी ही रही होगी। वरना मेरे जयपुर वाले घर के बाहर पांच बजे से स्कूल बसों के भोंपू बजने शुरू हो जाते हैं। घर के अंदर तक धुंआ भर जाता है। हॉर्न ऐसे बजते रहते हैं, जैसे उनके बिना काम ही नहीं चल सकता।
मुझसे जल्दी बच्चे जाग जाते हैं, उन्हें स्कूल जाने की तैयारी करनी होती है। उनके घर लौटने तक रोजाना उनकी मम्मी एक अजीब से खौफ में रहती है। दुर्घटनाएं, स्वाइन फलू, बच्चों के अपहरण से जुड़ी जो खबरें रोजाना चाय के साथ इस शहर में अखबार हमें परोसता है, इससे उसकी मनोस्थिति ऐसी हो गई है कि किसी दिन पंद्रह मिनट बस या आटो लेट हो जाए तो स्कूल से लेकर मुझ तक टेलीफोन की घंटियां बज जाती हैं कि बच्चे अभी तक क्यों नहीं आए।
मुझे याद है, ना तो हमारी मां, ना ही गांव की आजकल की मम्मियां इस बात की परवाह करती हैं कि बच्चे स्कूल से आने में देरी क्यों कर रहे हैं। वे कहीं भी नई ब्याई कुतिया बच्चों के साथ खेल रहे होते हैं, जैसा कि हम किया करते थे। तितलियों के पीछे भागते हुए एक घंटा बिता देते हैं। कहीं भी चार आड़ी तिरछी लाइने खींचकर लंगड़ी टांग खेलने लगते हैं।
शहर में मेरे घर की बालकनी के ठीक सामने एक स्कूल है, अंग्रेजीदां और महंगा। छुटटी होने से दस मिनट पहले ही वहां माताएं, पिता, दादा, दादी या ड्राइवरों का जमावड़ा लग जाता है। वे अपने बच्चों को एक पल भी अकेले नहीं छोड़ सकते। उनका बचपन देखकर मुझे अपने स्वच्छंद दिन याद आते हैं जब घंटों तक मां हमारी परवाह नहीं करती थी। हम देर रात तक पीपल के भूत को देखने के लिए किसी कोने में दुबककर अंदाजा लगाते थे कि कम से कम आज तो भूत सू सू करने या पानी पीने या खाना जुटाने पीपल से बाहर निकलेगा, जिसके बारे में हमारी दादी से लेकर मां हमें आज तक डराती आई थी और कई गिलास दूध उसी डर में हम पी जाया करते थे। लेकिन कमबख्त भूत कभी बाहर आया ही नहीं। हां इतना जरूर है, जब विलंब से घर पहुंचते थे, मां के पास एक चांटा हमारे लिए आरक्षित रहता था कि इतनी देर से क्यों आए। हम इस चांटे के बारे में वाकिफ होते थे और रोज अपनी ही गलती दोहराते थे।
आज जब मेरी बेटी साना गांव जाती है तो गांव के बच्चे उसे घेर लेते हैं कि वह शहर से आई है। वे उसके बोलने के ढंग को मंत्रमुग्ध होकर देखते हैं, उसका रंग गांव के बच्चों के मुकाबले ज्यादा साफ है। साना भी उनकी कॉपी करती है, आजकल वह हमारे गांव की बोली बोलने लगी है। अपनी दादी और नानी से वह उन्हीं की जुबान में बात करती है। मेरे बेटे को गांव की जुबान बोलनी नहीं आती। हम घर में कोशिश करते हैं ज्यादा से ज्यादा राजस्थानी में बात करें लेकिन वह समझ सब लेता है, बोलता है तो हिंदी और राजस्थानी को गड़ड मडड कर देता है। फोन पर जब वह अपनी दादी या नानी से बात करता है, दोनों तरफ अंदाज से ही हाल चाल पूछे जाते हैं। क्योंकि दादी नानी को हिंदी समझने में परेशानी होती है और पोते दोहिते को मारवाड़ी। साना के दोस्तों को बड़ा संसार गांव में हैं, शहर में अपने मोहल्ले में उसकी किसी बच्चे से नहीं बनती। दो दिन की छुटटी के बाद जब हम जयपुर लौटने को सामान अपनी कार में रख रहे थे तो साना ने मुझसे पूछा, पापा, क्या हमारा शहर में रहना ज्यादा जरूरी है। हम क्यों नहीं अपने गांव में रहते। इतना बड़ा घर, खुली हवा और इतने सारे दोस्त।
मेरे पास मेरी बेटी को जवाब देने के लिए कुछ नहीं थ। आखिर यह सवाल तो मैं कई महीनों से खुद को ही पूछ रहा हूं कि क्या मेरा गांव छोड़कर शहर आना इतना ही जरूरी था।
सोमवार, मई 18, 2009
दो कविताएं
पिछले दिनों से कविताएं लिखने का शौक चढा है। फुरसत है तो आप भी भुगतें। खुदा खैर करे। मेरी और मेरे पाठकों की।
स्पर्श
मैं कुछ बोलना चाहता हूं
कि तुम्हारी एक अंगुली,
मेरे होठों पर आकर टिकी है
हटाओ इसे,
इसके बोझ तले दबा जा रहा हूं,
आखिर कितनी बार,
बोलने से रोका है मुझे
कि तुम्हें शक है,
मैं बोला तो यह रिश्ता तार-तार हो जाएगा
मैं तुम्हारे जिस्म के रोम रोम में,
एक जुंबिश चाहता हूं
पर खुद स्पंदनहीन हो गया हूं
कि मेरे होठों पर टिकी एक अंगुली
उन्हें सिल गई है,
एक सन्नाटा
दोनों के बीच पसरा है,
तुम सहलाओ इस सन्नाटे को
अपने मुलायम हाथों से,
मैं तुम्हारे स्पर्श का सुख चाहता हूं
कि
सिर्फ एक बार
अपने मुलायम हाथ
रख दो मेरे माथे पर,
अंगुलियां मेरे बालों में पिरोकर
सहलाओ धीरे धीरे
मैं तुम्हारे स्पर्श का सुख चाहता हूं।
वजूद
अगले बरस पैंतीस का हो जाऊंगा,
जिंदगी का मिड वे,
मुडक़र देखता हूं,
संघर्ष, गरीबी, लाचारी है,
सामने देखता हूं तो
संघर्ष अब भी तरोताजा
तंदुरुस्त है,
गरीबी और लाचारी का हिलता सा अक्स है,
जैसे सदानीरा नदी के किनारे कोई
नार्सिस्ट बैठा है
डर है,
पानी ठहरा
तो चेहरा उभरेगा
वो कैसा होगा?
हालांकि मैं जानता हूं
मेरे जीते जी
नदी नहीं थमेगी,
हिलता हुआ अक्स,
चेहरे में तब्दील नहीं होगा,
फिर भी मुझे चिंता खाए जा रही है
अपने वजूद की।
स्पर्श
मैं कुछ बोलना चाहता हूं
कि तुम्हारी एक अंगुली,
मेरे होठों पर आकर टिकी है
हटाओ इसे,
इसके बोझ तले दबा जा रहा हूं,
आखिर कितनी बार,
बोलने से रोका है मुझे
कि तुम्हें शक है,
मैं बोला तो यह रिश्ता तार-तार हो जाएगा
मैं तुम्हारे जिस्म के रोम रोम में,
एक जुंबिश चाहता हूं
पर खुद स्पंदनहीन हो गया हूं
कि मेरे होठों पर टिकी एक अंगुली
उन्हें सिल गई है,
एक सन्नाटा
दोनों के बीच पसरा है,
तुम सहलाओ इस सन्नाटे को
अपने मुलायम हाथों से,
मैं तुम्हारे स्पर्श का सुख चाहता हूं
कि
सिर्फ एक बार
अपने मुलायम हाथ
रख दो मेरे माथे पर,
अंगुलियां मेरे बालों में पिरोकर
सहलाओ धीरे धीरे
मैं तुम्हारे स्पर्श का सुख चाहता हूं।
वजूद
अगले बरस पैंतीस का हो जाऊंगा,
जिंदगी का मिड वे,
मुडक़र देखता हूं,
संघर्ष, गरीबी, लाचारी है,
सामने देखता हूं तो
संघर्ष अब भी तरोताजा
तंदुरुस्त है,
गरीबी और लाचारी का हिलता सा अक्स है,
जैसे सदानीरा नदी के किनारे कोई
नार्सिस्ट बैठा है
डर है,
पानी ठहरा
तो चेहरा उभरेगा
वो कैसा होगा?
हालांकि मैं जानता हूं
मेरे जीते जी
नदी नहीं थमेगी,
हिलता हुआ अक्स,
चेहरे में तब्दील नहीं होगा,
फिर भी मुझे चिंता खाए जा रही है
अपने वजूद की।
गुरुवार, जनवरी 22, 2009
यह लेखक को मीडियोकर बनाने की साजिश है
मुझे बेहद अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि जयपुर में चल रहे साहित्य उत्सव के दौरान विक्रम सेठ ने बातचीत करते हुए वाइन क्या पी ली, जैसे उन्होंने किसी की हत्या कर दी है। खासकर उस चीज की जिसे संस्कृति कहते हैं। संस्कृति को लेकर इतना फिक्रमंद यह अखबार मुझे पहले कभी नजर नहीं आया। अखबार का नाम दैनिक भास्कर है और अब मेरा संदेह पक्के यकीन में तब्दील हो गया है कि उस अखबार को आप सांस्कृतिक दूत के रूप में समझते हैं तो यह आपकी भूल है। यह एक सनसनी है जो मीडियोकर लोगों को अच्छी लगती है। ठीक वैसे ही जैसे इंडिया टीवी और दूसरे बेहूदे चैनल यह दिखाते रहते हैं कि एक आदमी जिंदा सांप को निगल गया, या एक कापालिक शव को लेकर आराधना कर रहा है। दैनिक भास्कर ने विक्रम सेठ के वाइन पीने को मुद्दा बनाते हुए जयपुर में लीड छापा है। ऐसी ही एक बेहूदी सी हरकत इन््होंने पिछले साल भी की थी।
असल में यह पहले से ही तिरस्कृत और असहाय लेखक जगत पर एक मुनाफाखोर अखबार का तमाचा है। मैं साहित्य उत्सव के आयोजकों को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता। मैं उनके किसी आयोजन में प्रतिभागी भी नहीं हूं। मैं अफसोस के साथ उन लेखकों से शिकायत करता हूं जिन्होंने सनसनी के तौर पर मांगे गए एक बयान में भारतीय संस्कृति की व्याख्या कर दी। यदि विक्रम सेठ जैसे एक आदमी के मंच पर वाइन पी लेने से वह खत्म हो रही है और खंडित हो रही है तो मैं चाहता हूं कि यह तुरंत ही खंडित हो जाए। ऐसी संस्कृति के बने रहने का कोई तुक नहीं है। फिर आने दीजिए वही पुराना युग जिसमें जो ताकतवर है वह जीतेगा। इन प्रतिक्रियाओं में मैं उदय प्रकाश जी के वक्तव्य से ही सहमत हो सकता हूं। उन्होंने कहा कि लेखक सबसे अशक्त है। आप चोर उचक्कों के खिलाफ और कॉरपोरेट पार्टियों में शराब पीने वालों के खिलाफ कलम नहीं उठाते।
मेेरे पास सिर्फ तीन उदाहरण हैं। एक रवि बुले, एक संजीव मिश्र और आलोक शर्मा। रवि हिंदी के युवा कथाकारों में सबसे आगे हैं। संजीव दुर्भाग्य से हमारे बीच नहीं रहे और आलोक शर्मा कवि हैं, शायर भी। तीनों ही लेखक पत्रकार भी हैं और तीनों ने ही दैनिक भास्कर में काम किया है। मैं तीनों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं, लिहाजा दावे से कह सकता हूं कि वे पॉलिटिक्स नहीं कर सकते थे इसलिए भास्कर में काम नहीं कर पाए। तीनों को नौकरी देते समय भास्कर ने उम्दा वादे किए और फिर उनको लगभग यातनापूर्ण माहौल में भास्कर छोडऩा पड़ा। क्योंकि वे सिर्फ काम करना जानते थे, चाटुकारिता नहीं। तो लेखकों और संस्कृति के प्रति अचानक यह अखबार इतना हमदर्दी कैसे दिखा रहा है।दूसरी बात मुझे पिछले दिनों ही ज्ञात हुई, भास्कर के जयपुर संस्करण में साल भर पहले स्थानीय रचनाकारों को सम्मान देने का ऐलान करते हुए साहित्य का एक पेज विमर्श नाम से शुरू किया। सालभर तक लेखक छपे भी और अपने विचार भी व्यक्त करते रहे लेकिन अफसोस की बात यह है कि एक भी लेखक को मानदेय या पारिश्रमिक की फूटी कौड़ी नहीं मिली। यानी वे सब साहित्यिक मुद्दों को बेचकर मुनाफा कमाएं और लेखक मुफ्त में बेगारी करें। मुझे शिकायत है उन लेखकों से भी जो मुफ्त में साल भर तक लिखते रहे। लेखन की यह साधना साहित्यिक पत्रिकाओं में लिखकर भी तो पूरी हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से हम उसी बाजार और लोकप्रियता के तकाजों के शिकार हैं। यही इन लोगों की साजिश है कि लेखक भी आम लोगों जैसा ही व्यवहार करने लगे ताकि मीडियोकर लोग मीडिया में हावी रहें और पढ़े लिखे लोग इनसे नफरत करने लगे। इस कड़वी सच्चाई को मानने में कोई बुराई नहीं है कि हिंदी के अखबारों में साहित्य और सांस्कृतिक मुद्दों पर सोचने वाले संजीदा पत्रकारों को दोयम दर्जे का माना जाने लगा है। जी हुजूरी यहां भी सुपरहिट है। तीसरा उदाहरण, जानी मानी लेखिका लवलीन की मौत का है। लवलीन की मौत पर पत्रिका ने सम्मानजनक ढंग से खबर छापी लेकिन भास्कर में इसका उल्लेख ही नहीं था। उस दिन एक भी लेखक ने अपना विरोध जताने के लिए उनके संपादक को चि_ी नहीं लिखी। वह दिन दूर नहीं, जब आपकी हमारी खबरें इसी तरह दबा दी जाएंगे। इमरान हाशमी नाम का एक चवन्नी सितारा एक पेज सिर्फ इसलिए घेर लेता है कि वह कितनी लड़कियों का चुम्बन ले चुका है और आप यह जगह तभी घेर पाते हैं जब आप मंच पर बैठकर शराब पिएं। क्या हम लेखक सिर्फ अपनी तौहीन कराने के लिए ही अखबारों में छपेंगे।
मेरे खयाल में मुझे नाम लेने की जरूरत नहीं है लेकिन हमारे ही दो लेखक मित्रों ने रिश्वतखोरी के आरोप में ऐसी ही यातना झेली है, बार बार अखबार लिखते रहे कि आरोपी एक लेखक भी है। वैसे उस मशहूर कवि की कविताएं छापते हुए भी अखबार कतराते हैं लेकिन आज लेखक पकड़ में आया है तो इसे मार डालो। इस साजिश के खिलाफ खड़े होइए, वरना मंच पर जी भर भाषण देते रहिए। खबर को तैयार करने में आप मुनाफाखोर व्यवसायियों के टूल बन गए हैं। लेखक अपनी सामाजिक नैतिकता खुद तय करता है। विक्रम सेठ ने कोई कानून नहीं तोड़ा, और अपनी नैतिकता वह आपसे उधार नहीं ले सकता। उसकी नैतिकता पर सवाल उठाना बौद्धिक दिवालियापन है।
कोई चार साल पहले प्रेस क्लब की बार में मैं एक बार अपनी नन्हीं बेटी को साथ ले गया था, लोगों ने कहा, आपको इसको यहां नहीं लाना चाहिए था, मैंने कहा, मैं जो कर रहा हूं उसके लिए अपनी बेटी से आंख मिलाने की हिम्मत रखता हूं, इसलिए मेरे परिवार और मेरे बीच कोई पर्दा नहीं है। तो कोई दूसरा वो पर्दा तय नहीं कर सकता। विक्रम सेठ बनने के लिए और मंच पर बैठकर वाइन पीने के लिए बहुत साधना की जरूरत है। संस्कृति की चौकीदारी करते हुए आप मीडियोकर हो सकते हैं, साधक नहीं। यह लेखक को मीडियोकर बनाने की साजिश है। मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूं, यही आंच कल हम तक पहुंचेगी, लिहाजा विरोध करिए कि मीडियोकर ढँग से सोचने वाले पत्रकार लेखक की मर्यादा तय नहीं कर सकते।
असल में यह पहले से ही तिरस्कृत और असहाय लेखक जगत पर एक मुनाफाखोर अखबार का तमाचा है। मैं साहित्य उत्सव के आयोजकों को व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता। मैं उनके किसी आयोजन में प्रतिभागी भी नहीं हूं। मैं अफसोस के साथ उन लेखकों से शिकायत करता हूं जिन्होंने सनसनी के तौर पर मांगे गए एक बयान में भारतीय संस्कृति की व्याख्या कर दी। यदि विक्रम सेठ जैसे एक आदमी के मंच पर वाइन पी लेने से वह खत्म हो रही है और खंडित हो रही है तो मैं चाहता हूं कि यह तुरंत ही खंडित हो जाए। ऐसी संस्कृति के बने रहने का कोई तुक नहीं है। फिर आने दीजिए वही पुराना युग जिसमें जो ताकतवर है वह जीतेगा। इन प्रतिक्रियाओं में मैं उदय प्रकाश जी के वक्तव्य से ही सहमत हो सकता हूं। उन्होंने कहा कि लेखक सबसे अशक्त है। आप चोर उचक्कों के खिलाफ और कॉरपोरेट पार्टियों में शराब पीने वालों के खिलाफ कलम नहीं उठाते।
मेेरे पास सिर्फ तीन उदाहरण हैं। एक रवि बुले, एक संजीव मिश्र और आलोक शर्मा। रवि हिंदी के युवा कथाकारों में सबसे आगे हैं। संजीव दुर्भाग्य से हमारे बीच नहीं रहे और आलोक शर्मा कवि हैं, शायर भी। तीनों ही लेखक पत्रकार भी हैं और तीनों ने ही दैनिक भास्कर में काम किया है। मैं तीनों को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं, लिहाजा दावे से कह सकता हूं कि वे पॉलिटिक्स नहीं कर सकते थे इसलिए भास्कर में काम नहीं कर पाए। तीनों को नौकरी देते समय भास्कर ने उम्दा वादे किए और फिर उनको लगभग यातनापूर्ण माहौल में भास्कर छोडऩा पड़ा। क्योंकि वे सिर्फ काम करना जानते थे, चाटुकारिता नहीं। तो लेखकों और संस्कृति के प्रति अचानक यह अखबार इतना हमदर्दी कैसे दिखा रहा है।दूसरी बात मुझे पिछले दिनों ही ज्ञात हुई, भास्कर के जयपुर संस्करण में साल भर पहले स्थानीय रचनाकारों को सम्मान देने का ऐलान करते हुए साहित्य का एक पेज विमर्श नाम से शुरू किया। सालभर तक लेखक छपे भी और अपने विचार भी व्यक्त करते रहे लेकिन अफसोस की बात यह है कि एक भी लेखक को मानदेय या पारिश्रमिक की फूटी कौड़ी नहीं मिली। यानी वे सब साहित्यिक मुद्दों को बेचकर मुनाफा कमाएं और लेखक मुफ्त में बेगारी करें। मुझे शिकायत है उन लेखकों से भी जो मुफ्त में साल भर तक लिखते रहे। लेखन की यह साधना साहित्यिक पत्रिकाओं में लिखकर भी तो पूरी हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से हम उसी बाजार और लोकप्रियता के तकाजों के शिकार हैं। यही इन लोगों की साजिश है कि लेखक भी आम लोगों जैसा ही व्यवहार करने लगे ताकि मीडियोकर लोग मीडिया में हावी रहें और पढ़े लिखे लोग इनसे नफरत करने लगे। इस कड़वी सच्चाई को मानने में कोई बुराई नहीं है कि हिंदी के अखबारों में साहित्य और सांस्कृतिक मुद्दों पर सोचने वाले संजीदा पत्रकारों को दोयम दर्जे का माना जाने लगा है। जी हुजूरी यहां भी सुपरहिट है। तीसरा उदाहरण, जानी मानी लेखिका लवलीन की मौत का है। लवलीन की मौत पर पत्रिका ने सम्मानजनक ढंग से खबर छापी लेकिन भास्कर में इसका उल्लेख ही नहीं था। उस दिन एक भी लेखक ने अपना विरोध जताने के लिए उनके संपादक को चि_ी नहीं लिखी। वह दिन दूर नहीं, जब आपकी हमारी खबरें इसी तरह दबा दी जाएंगे। इमरान हाशमी नाम का एक चवन्नी सितारा एक पेज सिर्फ इसलिए घेर लेता है कि वह कितनी लड़कियों का चुम्बन ले चुका है और आप यह जगह तभी घेर पाते हैं जब आप मंच पर बैठकर शराब पिएं। क्या हम लेखक सिर्फ अपनी तौहीन कराने के लिए ही अखबारों में छपेंगे।
मेरे खयाल में मुझे नाम लेने की जरूरत नहीं है लेकिन हमारे ही दो लेखक मित्रों ने रिश्वतखोरी के आरोप में ऐसी ही यातना झेली है, बार बार अखबार लिखते रहे कि आरोपी एक लेखक भी है। वैसे उस मशहूर कवि की कविताएं छापते हुए भी अखबार कतराते हैं लेकिन आज लेखक पकड़ में आया है तो इसे मार डालो। इस साजिश के खिलाफ खड़े होइए, वरना मंच पर जी भर भाषण देते रहिए। खबर को तैयार करने में आप मुनाफाखोर व्यवसायियों के टूल बन गए हैं। लेखक अपनी सामाजिक नैतिकता खुद तय करता है। विक्रम सेठ ने कोई कानून नहीं तोड़ा, और अपनी नैतिकता वह आपसे उधार नहीं ले सकता। उसकी नैतिकता पर सवाल उठाना बौद्धिक दिवालियापन है।
कोई चार साल पहले प्रेस क्लब की बार में मैं एक बार अपनी नन्हीं बेटी को साथ ले गया था, लोगों ने कहा, आपको इसको यहां नहीं लाना चाहिए था, मैंने कहा, मैं जो कर रहा हूं उसके लिए अपनी बेटी से आंख मिलाने की हिम्मत रखता हूं, इसलिए मेरे परिवार और मेरे बीच कोई पर्दा नहीं है। तो कोई दूसरा वो पर्दा तय नहीं कर सकता। विक्रम सेठ बनने के लिए और मंच पर बैठकर वाइन पीने के लिए बहुत साधना की जरूरत है। संस्कृति की चौकीदारी करते हुए आप मीडियोकर हो सकते हैं, साधक नहीं। यह लेखक को मीडियोकर बनाने की साजिश है। मैं इसका पुरजोर विरोध करता हूं, यही आंच कल हम तक पहुंचेगी, लिहाजा विरोध करिए कि मीडियोकर ढँग से सोचने वाले पत्रकार लेखक की मर्यादा तय नहीं कर सकते।
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